अमर उजाला, देहरादून आफिस के बाहर ढोलनाद आंदोलन करेगा जनमंच

देहरादून : आक्रामक क्षेत्रवाद पर यकीन रखने वाले उत्तराखंड के एक क्षेत्रवादी संगठन उत्तराखंड जनमंच ने अमर उजाला पर स्थानीय पत्रकारों के साथ भेदभाव बरतने का आरोप लगाते हुए इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जनमंच ने ऐलान किया है कि वह अमर उजाला में गड़बड़ियों की तरफ जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए अमर उजाला देहरादून के दफ्तर के बाहर पचास जोड़ी ढ़ोलों के साथ ढोलनाद आंदोलन करेगा। उधर, अमर उजाला के प्रबंधन ने पत्रकारों पर पाबंदियों की नई फेहरिस्त जारी कर दी है। इनमें पत्रकारों के कैंटीन जाकर चाय पीने पर पाबंदी से लेकर उनके काम के घंटे बढ़ाए जाने तक कई फैसले शामिल हैं।

यह वही उत्तराखंड है जहां एक समय अमर उजाला के लिए लोगों में छीनाझपटी होती थी। तब अमर उजाला एक आदत की तरह लोगों के खून में दौड़ा करता था। सुबह होते ही पाठकों को उसकी तलब सताने लगती थी। यह अमर उजाला के स्वर्णिम दौर का वह हिस्सा था जब सारे अखबार मिलकर अमर उजाला के प्रसार के आधे भी नहीं होते थे। उन दिनों अखबार का मतलब अमर उजाला हुआ करता था। उसी उत्तराखंड में अमर उजाला संकट में फंसा हुआ है। खबरों के नजरिये से पहले ही दैनिक जागरण से कड़ा मुकाबला झेल रहे इस अखबार के लिए अब पहाड़ की जमीन पर पैर टिकाए रखना मुश्किल होता जा रहा है। पहाड़ के कई कस्बों में अमर उजाला का प्रसार गिर रहा है।

अमर उजाला ने पहले उत्तराखंड के मैदानी शहरों में अपनी पकड़ खोयी और अब वह पहाड़ के कई कस्बों में पिछड़ रहा है। अमर उजाला का यह संकट प्राकृतिक आपदा से नहीं आया है बल्कि उसके उच्च प्रबंधन तंत्र की नीतियों से आया है। सन् 2002 के बाद अमर उजाला के स्तर में जो गिरावट आनी शुरु हुई थी वह अब और भी तेज हो गई है। उत्तराखंड को आमतौर पर बौद्धिकों का राज्य माना जाता है। कंटेट के स्तर पर आई गिरावट और स्थानीय पत्रकारों के खिलाफ नियोजित दुराग्रह के कारण अमर उजाला के पास न तो लोगों की बौद्धिक भूख मिटाने वाला कंटेट रहा और न ही उसके पास जनता की नब्ज जानने वाले स्थानीय पत्रकार। अमर उजाला के उतार का यह प्रमुख कारण था। लेकिन पिछले एक साल में अमर उजाला के भीतर जो कुछ घटा उसके कारण अखबार विवादों के केंद्र में आ गया।

दरअसल अमर उजाला प्रबंधन ने यह फैसला किया कि अखबार में कार्यरत स्थानीय पत्रकारों को या तो बाहर किया जाय या उन्हे इधर-उधर कर दिया जाय। इसके चलते अमर उजाला के देहरादून संस्करण में पूर्वी यूपी और बिहार लाबी का पूरी तरह सें कब्जा हो गया। यह प्रबंधन की रणनीति का ही हिस्सा था। इसी रणनीति के तहत देहरादून संस्करण में सभी महत्वपूर्ण स्थानों से स्थानीय पत्रकारों को हटाकर डेस्क प्रभारी और रिपोर्टिंग हैड के सभी पदों पर बाहर से आए पत्रकारों को तैनात कर दिया गया।

अमर उजाला प्रबंधन का संदेश साफ था कि अ बवह उत्तराखंड में स्थानीय पत्रकारों पर भरोसा करने के बजाय पूर्वी यूपी ओर बिहार से आए पत्रकारों पर भरोसा करेगा। लेकिन मैनेजमेंट का यह संदेश जब सार्वजनिक हुआ तो स्थानीय स्तर पर इसके खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया होने लगी। अमर उजाला के इस संस्करण पर हावी यूपी-बिहार की लाबी ने खुलेआम पूर्वी यूपी और बिहार के भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देना शुरु कर दिया। इसका एक उदाहरण यह है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे पूर्वी यूपी के दो कुलपतियों के खिलाफ लगातार आरोप लगाए जाते रहे लेकिन अमर उजाला में इसकी एक खबर नहीं छपी। इस तरह के कई प्रकरण हुए जिनसे पूरे राज्य में साफ संदेश गया कि बाहरी राज्यों से आए भ्रष्ट अफसरों को अखबार के प्रबंधन का अघोषित समर्थन प्राप्त है। लेकिन आम नेता और राजनीतिक कार्यकर्ता अमर उजाला की मुखालफत करने से डरते रहे।

एक ताकतवर अखबार के खिलाफ कुछ बोलने की हिम्मत भले ही आम राजनीतिक नेताओं और काय्रकर्ताओं में न रही हो पर अमर उजाला में व्याप्त पहाड़ विरोधी क्षेत्रवाद शहरों और कस्बों में चर्चा का विषय बना रहा। इन चर्चाओं से अमर उजाला की उस पुरानी प्रतिष्ठा और साख को जबरदस्त नुकसान पहुंचा जो उसने उत्तराखंड आंदोलन के दौर में कमाई थी। इसी बीच उत्तराखंड में तेजी से उभर रहे आक्रामक क्षेत्रवादी संगठन उत्तराखंड जनमंच ने अमर उजाला के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया। यह दुर्लभ घटना थी। क्योंकि जब सारे नेता अखबारों की खुशामद कर रहे हों तब एक संगठन ने अमर उजाला में व्याप्त क्षेत्रवाद पर हमला कर दिया।

जनमंच की इस मुहिम को बुद्धिजीवियों के बीच खासा समर्थन मिला। इससे उत्साहित जनमंच ने जहां अमर उजाला के देहरादून कार्यालय में सत्तर प्रतिशत स्थानों पर स्थानीय पत्रकारों की नियुक्ति करने की मांग करनी शुरु कर दी वहीं अमर उजाला के प्रबंधन तंत्र ने जनमंच की खबरों पर अघोषित प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ जनमंच के नाम से एक और संगठन बनाकर उत्तराखंड जनमंच पर जवाबी हमला कर दिया। इस जंग का दिलचस्प पहलू यह है कि पहली बार अमर उजाला अखबार बनने के बजाय एक पक्ष बन गया हैं। इसका लाभ जनमंच उठा रहा है। जनमंच के नेता और कार्यकर्ता प्रचार कर रहे हें कि अमर उजाला पहाड़ के लोगों के खिलाफ क्षेत्रवाद भड़का रहा है।

इसी प्रचार के साथ जनमंच ने अमर उजाला अखबार बंद कराने की मुहिम छेड़ दी है। इसका असर होने लगा है। बुद्धिजीवियों का एक मुखर तबका अमर उजाला के खिलाफ जाता दिख रहा है। अमर उजाला के रवैये के खिलाफ जनमत तैयार करने के लिए जनमंच देहरादून में अमर उजाला दफ्तर के बाहर पचास जोड़ी ढ़ोलों के साथ ढ़ोलनाद करने की तैयारियों में जुटा है। इसके साथ वह स्थानीय लोगों से अमर उजाला में विज्ञापन न देने की अपील कर रहा है साथ ही अमर उजाला में सरकारी विज्ञापन देने वाले अफसरों के खिलाफ मोर्चा खोलने की धमकी भी दे रहा है।उसने साफ कर दिया है कि वह अमर उजाला में विज्ञापन देने वाली कंपनियों के उत्पादों का बहिष्कार करने की मुहिम भी चलाएगा।

उत्तराखंड जनमंच द्वारा अमर उजाला की आर्थिक नाकेबंदी करने की यह मुहिम अपने आप में अनोखी तो है ही साथ ही यह पहली बार है कि कोई संगठन किसी अखबार के खिलाफ जनता की अदालत में जा रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि जनमंच की इस अनूठी मुहिम के नतीजे क्या होने वाले हैं। जनमंच के मीडिया प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार शिवानंद पांडे का कहना है कि हमारी मुहिम तब तक जारी रहेगी जब तक अमर उजाला में हर स्तर पर सत्तर प्रतिशत स्थानीय लोग नियुक्त नहीं कर दिए जाते। उन्होने कहा कि हम राज्य सरकार और सूचना विभाग से मांग कर रहे हैं कि राज्य सरकार द्वारा जारी होने वाले विज्ञापन केवल उन्ही समाचार संस्थानों को दिए जांय जो हर स्तर पर सत्तर फीसदी स्थानीय पत्रकार नियुक्त करने की शर्त स्वीकार करें।

इस विवाद का दिलचस्प पहलू यह भी है कि अमर उजाला का टकराव जिस संगठन से हो रहा है उसके प्रमुख भी वही व्यक्ति है जो कभी गढ़वाल में अमर उजाला को स्थापित करने वाले लोगों में अग्रणी था। अमर उजाला में कई महत्वपूर्ण पदों पर सत्रह साल तक काम कर चुके राजेन टोडरिया अब उत्तराखंड जनमंच की बागडोर संभाल रहे हैं। उन्होने कहा कि अमर उजाला के खिलाफ चल रही इस मुहिम से वह भी भावनात्मक रुप से उद्वेलित हैं पर यह निजी भावनाओं का सवाल नहीं है। उनका कहना है कि उनकी मुहिम का मकसद मीडिया लोकतंत्रीकरण करना भी है और उसे सामाजिक रुप से जिम्मेदार व जवाबदेह बनाना भी है। टोडरिया कहते हैं कि समाचार संस्थानों को स्थानीय समाजों और उनकी प्रतिभा का सम्मान करना सीखना होगा। उन्होने कहा कि स्थानीय समाज से नफरत कर या उन्हे हेय दृष्टि से देखकर पत्रकारिता नहीं की जा सकती। यदि अमर उजाला को यह अहंकार है तो लोग उसे जवाब देगे। टोडरिया ने कहा कि हम कोई जल्दी में नहीं हैं पर आने वाले एक-दो सालों में अमर उजाला को जनता की ताकत पता चल जाएगी।

जनमंच के इस तेवर से अमर उजाला के देहरादून संस्करण में खलबली है। अमर उजाला का प्रबंधन तंत्र इस मुहिम के नतीजों पर नजर रखे हुए है। लेकिन मुहिम का असर अमर उजाला के भीतर दिखने लगा है। स्थानीय पत्रकारों पर नजर रखी जा रही हैं। पत्रकारों के कैंटीन में जाकर चाय पीने पर पाबंदी लगा दी गई है। काम के घंटे आठ से बढ़ाकर साढ़े आठ घंटे कर दिए गए हैं ताकि स्थानीय पत्रकार इन पाबंदियों से घबराकर अखबार छोड़ दें। जबकि ट्रेड यूनियन और पत्रकारों के लिए बनाए गए कानूनों में आठ घंटे ही काम लेने का कानून है पर न तो राज्य सरकार का श्रमविभाग और न ही मजदूरों की पार्टी होने का दावा करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां पत्रकारों को गुलाम बनाए जाने वाले इन तालिबानी फैसलों का विरोध करने की हिम्मत जुटा पा रही हैं।

लेखक विमल घिल्डियाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं.

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