अमर उजाला प्रबंधन ने बनियागिरी दिखाई, रिपोर्टर पर हमले की खबर नहीं छपी

अमर उजाला में काम करने वाले पत्रकारों-मीडियाकर्मियों के लिए आज का दिन काला दिन की तरह है. एक अमरउजालाकर्मी को एक आईपीएस अधिकारी सड़क पर गिराकर पीटता है और इसकी एक लाइन खबर किसी एडिशन में प्रकाशित नहीं होती है. किसी आम आदमी को भी अगर कोई आईपीएस इस तरह सड़क पर गिराकर पीटता है तो खबर बनती है और छपती है लेकिन अमर उजाला जैसे जनपक्षधर माने जाने वाले अखबार ने अपने ही कर्मी की बुरी तरह पिटाई की खबर नहीं छापी. बताया जाता है कि गोरखपुर के एसएसपी आशुतोष कल शाम अमर उजाला गोरखपुर के आफिस पहुंचे. उन्हें कई दलाल पत्रकार अपने साथ समझौता कराने के लिए ले गए.

स्थानीय संपादक मृत्युंजय और एसएसपी आशुतोष की मौजूदगी में पीड़ित पत्रकार धर्मवीर को एक कमरे में बुलाया गया. वहां एसएसपी आशुतोष ने धर्मवीर को भाई संबोधित करते हुए कहा- ''मैंने ओवर रिएक्ट कर दिया, ऐसा नहीं करना चाहिए था''. और, उनके इतना कहते ही मामला खत्म मान लिया गया. हालांकि धर्मवीर ने खुद को भाई संबोधित किए जाने का प्रतिवाद किया और कहा कि मुझे भाई मत कहो. काफी देर तक लल्लो-चप्पो होती रही और सबने मान लिया कि समझौता हो गया.

ये हैं आज के पत्रकार, संपादक और अखबार. पीड़ित पत्रकार धर्मवीर निजी तौर पर बहुत आहत हैं. वे संस्थान द्वारा साथ न दिए जाने से भी परेशान हैं. वे अपनी लड़ाई अब निजी स्तर पर लड़ने का प्रयास करेंगे, ऐसा उन्होंने अपने करीबियों से कहा है. धर्मवीर की लड़ाई में भड़ास4मीडिया पूरा साथ देगा और इस मसले के बारे में जल्द ही एक जांच रिपोर्ट बनाकर लखनऊ में मुख्यमंत्री अखिलेश से प्रतिनिधिमंडल मिलेगा. साथ ही शिवपाल से भी प्रतिनिधि मंडल मिलकर मीडिया वालों के उत्पीड़न की घटनाओं पर तुरंत एक्शन लेने का अनुरोध करेगा. अगर इसके बाद भी कार्रवाई न हुई तो लखनऊ व दिल्ली में आमरण अनशन शुरू किया जाएगा.

अमर उजाला के तेजतर्रार मालिक अतुल माहेश्वरी के निधन के बाद अमर उजाला प्रबंधन द्वारा बनियागिरी दिखाने का यह जो घटनाक्रम हुआ है, उसमें कई लोगों को अतुल माहेश्वरी व उनके तेवर की याद आ गई. अगर अतुल माहेश्वरी जिंदा होते तो समझौता होने के बावजूद घटना की एक खबर पहले पन्ने पर सिंगल कालम में या पेज नंबर दो पर तीन कालम में आल एडिशन प्रकाशित कराते ताकि शासन प्रशासन तक यह संदेश जाता कि जो कुछ हुआ है वह गलत है और दोषी के खिलाफ न्यूनतम कार्रवाई तो होनी ही चाहिए.

पर दुर्भाग्य यह कि अतुल जी इस दुनिया में नहीं हैं और उनके भाई राजुल माहेश्वरी को अखबार से बहुत मतलब नहीं. मतलब होता तो वह अपने कर्मी की इस कदर पिटाई पर जरूर स्टैंड लेते और एक निर्देश जारी करते. कहने वाले यह भी कहते हैं कि सारा पैचअप, समझौता और खबर न छापे जाने की कवायद राजुल माहेश्वरी के ही निर्देश पर हुई है. अगर यह सच है तो राजुल माहेश्वरी की हम निंदा करते हैं और उन्हें सदबुद्धि आए, ऐसी कामना करते हैं. दरअसल राजुल माहेश्वरी का यह स्टैंड भले ही तात्कालिक तौर पर उन्हें किसी विवाद में न पड़ने देने के झमेले से मुक्त करता हो लेकिन लांग टर्म में यह अमर उजाला के लिए काफी घातक सिद्ध होगा. इस अखबार में काम करने वाले कर्मी अब सोचेंगे कि उनके मुश्किल में उनका ही अखबार व मालिक नहीं खड़ा होगा, वह सत्ता के लोगों के प्रति सदभावना दिखाते हुए समझौता कर लेगा.

इस प्रकरण पर अगर आपके पास कोई जानकारी हो तो भड़ास तक जरूर मेल करें ताकि इस लड़ाई को आगे बढ़ाया जा सके और दोषी अफसर को दंडित कराया जा सके. हमारा पता है- bhadas4media@gmail.com

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