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अमर उजाला, बहराइच की नजर में ये महाशय हैं जंगल का हीरो!

: कानाफूसी : अखबारों के जिला कार्यालयों में कार्यरत पत्रकारों द्वारा किसी अपने खास परिचित के पक्ष में खबर लगवा लेना तो आम हो ही चुका है और जब यह खास परिचित कुछ खास तरह की सुविधाएं पत्रकारों को मुहैया कराता हो तब तो इसकी जमकर चरण वंदना की ही जायेगी. मामला है बहराइच जनपद के अमर उजाला अखबार का. यहाँ के लोकल पेज पर जब भी बहराइच में स्थित प्रसिद्ध कतर्नियाघाट जंगलों की खबर की जायेगी तो उसमे वन्य जीवों के लिए काम करने वाली संस्था डब्लूडब्लूएफ के एक तथाकथित प्रोजेक्ट आफिसर के वर्जन का होना एक अनिवार्य तत्व के रूप में जरूर मौजूद होगा.

: कानाफूसी : अखबारों के जिला कार्यालयों में कार्यरत पत्रकारों द्वारा किसी अपने खास परिचित के पक्ष में खबर लगवा लेना तो आम हो ही चुका है और जब यह खास परिचित कुछ खास तरह की सुविधाएं पत्रकारों को मुहैया कराता हो तब तो इसकी जमकर चरण वंदना की ही जायेगी. मामला है बहराइच जनपद के अमर उजाला अखबार का. यहाँ के लोकल पेज पर जब भी बहराइच में स्थित प्रसिद्ध कतर्नियाघाट जंगलों की खबर की जायेगी तो उसमे वन्य जीवों के लिए काम करने वाली संस्था डब्लूडब्लूएफ के एक तथाकथित प्रोजेक्ट आफिसर के वर्जन का होना एक अनिवार्य तत्व के रूप में जरूर मौजूद होगा.

अभी पिछले दो दिनों से लगातार कतर्नियाघाट में घडियालों के बच्चों के घोंसलें से निकलने की खबर छपती रही है उसमे बार बार यह दिखाया गया कि कैसे डब्लूडब्लूएफ के यह तथाकथित प्रोजेक्ट आफिसर मौके पर पहुंचे और कैसे उन्होंने यह बचाव किया और वह राहत कार्य किया. यह किया, वह किया तो ठीक है पर अमर उजाला अखबार कभी यह बाताने की कोशिश नहीं करता है की डब्लूडब्लूएफ के कितने प्रोजेक्ट वहाँ चल रहे हैं और यह कि हर बार मौके पर केवल वही खास प्रोजेक्ट अफसर कैसे पहुँचता है और केवल उसी का वर्जन सामने क्यों आता है. जबकि वन्य जीवों के बारे में कार्य करने वाली अन्य कई संस्थाएं भी वहाँ मौजूद हैं और साथ ही वन विभाग भी है.

तो फिर क्या खास कारण है कि पूरा अखबार एक ही व्यक्ति को जंगल का हीरो बनाने पर तुला हुआ है. अखबार के पिछले कुछ दिनों के अंकों ने तो घडियालों के बच्चों को लेकर इस अपने मित्र प्रोजेक्ट आफिसर की इतनी वंदना कर दी कि अगर यह होता तो शायद क़यामत आ जाती. जबकि कतर्नियाघाट वन जीव प्रभाग का पूरा अमला भी मौजूद रहता है. अमर उजाला बहराइच और इसी के साथ अन्य कई छोटे बड़े प्रसारण वाले अखबार डब्लूडब्लूएफ के इस तथाकथित प्रोजेक्ट आफिसर पर इतना मोहित रहते है कि इसके द्वारा किये गए क्रिकेट टूर्नामेंट से लेकर हर कार्यक्रम में इसकी भागीदारी को प्रमुखता से दिखाना ही उद्देश्य रहता है.

इस तरह की खास कवरेज के पीछे कारण है कि इस डब्लूडब्लूएफ के तथाकथित प्रोजेक्ट आफिसर का पूरा कुनबा जंगल के आस पास के गांवों पर दबदबा बनाये है और वन विभाग में भी अधिकतर अफसर इसके सेवा भाव से दबे हुए है. इसी के साथ ही जब भी बहराइच जिले के पत्रकारों को जंगल में मंगल मतलब गेस्ट हाउस में मुर्गा दारु की पार्टी आवश्यकता होती है तो यह प्रोजेक्ट आफिसर सम्पूर्ण व्यवस्था करते है. जिसका ऋण पत्रकार लोग अखबार में अपनी कलम के जरिये उतारते हैं.

यह अलग बात है कि इस डब्लूडब्लूएफ के तथाकथित प्रोजेक्ट आफिसर के कुछ परिजन ग्राम्य विकास से सम्बंधित और उसमे वह जमकर घोटाले करते हैं लेकिन सेवा के अहसान के तले दबे यह पत्रकार लोग उस और ध्यान नहीं देते हैं. आखिर पत्रकार का कर्तव्य जमकर सेवा पाना भी तो होता है बाकी जागरूकता से क्या मतलब. अखबारी दुनिया में पेड न्यूज़ तो अब आम हो चुका है. जिसके द्वारा पत्रकारिता में ख़बरों को किसी भी खास के पक्ष में बेचकर पैसा कमाने का धंधा हो गया है. जब इस बात की चर्चा जोर पकड़ने लगी है तो कई अखबार अपने को इससे बचाने में जुट गए है. पर अभी जिलों में ऐसा ही हाल बना हुआ है.

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