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अमृत भारत में कम्पोजीटर रहे ओपी सिंह अब बिजली मीटर की स्पीड स्लो करने का काम करते हैं, वह भी निःशुल्क

लखनऊ : आप आज यहां जिस शख्स को देख रहे हैं ना, उसके बाबा के पास कभी सात गांवों की जमीन्दारी थी। यह कहानी है यूपी में गाजीपुर जिले के सादात इलाके की। परिवार था ठाकुरों का, और जमींदार साहब इन गांवों के किसानों से मालगुजारी वसूला करते थे। मनचाही वसूली होती थी इन जमींदार साहब की। इसके पहले भी यह ठाकुर साहब अंग्रेजों के तलवे चाटा करते थे। उनकी खुशामदी देख कर अंग्रेजों ने इन ठाकुर साहब को यह जमीन्दारी अता फरमायी थी।

लखनऊ : आप आज यहां जिस शख्स को देख रहे हैं ना, उसके बाबा के पास कभी सात गांवों की जमीन्दारी थी। यह कहानी है यूपी में गाजीपुर जिले के सादात इलाके की। परिवार था ठाकुरों का, और जमींदार साहब इन गांवों के किसानों से मालगुजारी वसूला करते थे। मनचाही वसूली होती थी इन जमींदार साहब की। इसके पहले भी यह ठाकुर साहब अंग्रेजों के तलवे चाटा करते थे। उनकी खुशामदी देख कर अंग्रेजों ने इन ठाकुर साहब को यह जमीन्दारी अता फरमायी थी।

नतीजा, ठाकुर साहब अपने आकाओं की जेब भरने के साथ ही जबरिया होने वाली भारी रकम की उगाही से अपनी ऐयाशी किया करते थे। जमीन्दार की उगाही से बुरी तरह त्रस्त किसानों की आह अचानक जमीन्दार के बेटे के कलेजे पर लग गयी। भारत छोड़ो का दौर था। यानी सन-42 में जमीन्दार के बेटे ने गोरी हुकूमत के खिलाफ बगावत-मोर्चा खोल दिया।

जाहिर है कि दमन होना ही था, जमीन्दार तो अपनी जायदाद बचाने के लिए अपने बेटे के खिलाफ हो गया और अपनी जमीन्दारी सम्भाल लिया। लेकिन आजादी के बाद ही उसका पराभव शुरू होने लगा। जमीन्दार ने कुछ ही वक्त में अपनी सारी सम्पत्ति को बेच खाया। जबकि बेटे ने आंदोलन छेड़ा और आखिरकार अपनी खानदानी सम्पत्ति को लात मार कर खुद लखनऊ में वनवास कर लिया। आजादी के बाद से बेटे ने अपनी मेहनत से एक प्रिंटिंग प्रेस खोला। पब्लिकेशन का धंधा भी शुरू किया। लेखन भी किया। मसलन, इस शख्स ने 130 किताबें लिखीं। और जल्दी ही उनका संस्थान रामा प्रिंटर्स एंड पब्लिशर्स आदि अनेक सहयोगी संस्थांनों का नाम लखनऊ ही नहीं, बल्कि पूरे यूपी में मशहूर हो गया।

लेकिन जमीन्दार के बेटे के पुत्र की फितरत भी अपने बाप से ही जैसी रही। बगावती अंदाज। नाम है ओपी सिंह। ओपी ने अपने पिता के प्रेस में काम करने के बजाय सीधे लखनऊ से प्रकाशित होने वाले अमृत भारत में कम्पोजीटर के तौर पर अपना जीवन शुरू किया। लहजा तो श्रमिकों के हितैषी का ही था, इसलिए ओपी सिंह कर्मचारी यूनियन में धमक कराने लगा। अचानक यह अखबार बंद हो गया। कहने की जरूरत नहीं है कि किसी भी अखबार की बंदी हो जाना, उसके श्रमिकों के विधवा होने से ज्यादा खतरनाक होता है। उधर उसके पिता का संस्थान लगातार तबाही की ओर भी बढ़ता जा रहा था।

लेकिन ओपी तो जुझारू हैसियत का नाम था ना, इसीलिए उसने अपने हौसलों को पंख दिया और अपना निजी कारोबार शुरू की तैयारी की। इसके पहले अमृत-प्रभात के कर्मचारियों ने सामूहिक तौर पर लखनऊ के जानकीपुरम में ईडब्यूएस यानी दुर्बल आय के मकान खरीद लिये थे। ओपी को भी एक मकान मिल गया। उधर बेरोजगार होने पर ओपी ने तय किया कि वेल्डिंग का काम शुरू किया जाए। अर्जी लगायी गयी बिजली महकमे में, कि कनेक्शन मिल जाए। लेकिन इंजीनियर ने ढाई सौ रूपये की फीस के साथ ही साथ साढ़े छह सौ रूपये की घूस भी मांग ली। ढाई सौ रूपये तो अदा कर दिये गये, लेकिन ओपी ने घूस से हाथ खड़ा कर दिया। बोला: हम चोरी करने के लिए धंधा नहीं करना चाहते हैं, फिर घूस क्यों। दूं। यह सन-87 की बात है।

खरे जवाब को सुन कर इंजीनियर ने भी तय कर लिया गया कि वह बिना घूस के काम नहीं करेगा। कनेक्शन तो पास हो गया, लेकिन मीटर नहीं लगाया गया। करीब दो बरसों तक व्यर्थ भागा-दौड़ी देख कर ओपी ने तय किया कि अब काम शुरू कर ही दिया जाए। वेल्डिंग की मशीन वगैरह आ गया और कामधाम शुरू। लेकिन अभी दो दिन भी नहीं हुए थे, कि इंजीनियर ने पुलिस बुलवा कर ओपी की दूकान पर छापा डलवा दिया। सारा सामान जब्त और ओपी फरार हो गये। बाद में कोर्ट में मामला छूट गया कि जब मीटर ही नहीं लगा था, तो बिजली चोरी का मामला ही बेवजह लगा। ओपी ने फिर दौड़भाग की, लेकिन पुलिसवालों ने पहले ही जब्त हो चुकी मशीन तक वापस नहीं की। बेइज्जती तो खूब ही हुई।

इसके बाद से ही ओपी की खोपड़ी सटक गयी। ओपी का सारा गुस्सा अब बिजली के इंजीनियरों और पुलिसवालों पर ही उतरा। उसने तय किया कि वह अब पुलिस और बिजली विभाग से त्रस्त लोगों पर मलहम लगायेगा। इसके लिए ओपी ने न जाने कितने घरों पर लगे मीटरों पर छेड़छाड़ किया और उनकी स्पीड धीमी कर दिया। ओपी के ज्यादातर कस्टमर बिजली से त्रस्त लोग ही हैं। ओपी अब बिजली मीटर के अलावा, प्लम्बरी और भवन निर्माण का भी काम करता है। लेकिन जैसे ही उसे खबर मिलती है कि किसी की बिजली काट दी गयी, ओपी दौड़ कर उसके घर पहुंच जाता है। नि:शुल्क। यह उसका जुनून है कि बिजली तो हर कीमत पर जुड़ेगी। तारों से कटिया भी डलवा देता है ओपी। लेकिन इन कामों के लिए उसने कभी भी कोई रकम नहीं मांगी।

ओपी के सम्मान का आप अंदाजा केवल इसी बात से लगा सकते हैं कि ओपी को जब भी पुलिस ने पकड़ा, तो उसे छुड़वाने के लिए सैकड़ों लोग मौके पर पहुंच गये और हारकर पुलिस को ओपी को रिहा कराना पड़ा। ओपी अगर चाहे कि नि:शुल्क के बजाय इन कामों के लिए पैसा उगाना चाहे तो उसकी आमदनी दो-चार लाख रूपया महीना से ज्यादा हो सकता है। वह कार-मोटरसायकिल तक मेंटेंन कर सकता है। लेकिन ओपी आज भी हमेशा की ही तरह सायकिल पर ही फर्राटा मारते दिखता है। पैंट-शर्ट पर प्रेस नहीं, और कई जगहों पर पैबंद भी लगे होते हैं। और हां, खास बात तो यह कि ओपी ने अपने घर की बिजली कभी भी चोरी नहीं की है।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

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