अविनाश दास का माल उड़ा कर मोहन श्रोत्रिय ने अपने नाम से छपवा लिया

Avinash Das : अगर ये साबित हो जाए कि Mohan Shrotriya का प्रतिवाद एक असत्‍य-पत्र है और राजस्‍थान की उन नदियों पर छपी किताबों का एकमात्र लेखक मैं ही था और मोहन श्रोत्रिय उन किताबों के सिर्फ भाषा-सुधारक और सुपरवाइजर थे, तो क्‍या आप सब माफी मांगेंगे? और तब क्‍या आपलोग मोहन श्रोत्रिय का सामाजिक बहिष्‍कार करने के लिए तैयार होंगे?

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बात लगभग सोलह साल पुरानी है। मुझसे पूछा जा रहा है कि इतने दिनों बाद इस बात की याद क्‍यों आयी। दरअसल इन बातों को कह सकने का बीच के वक्‍फे में कोई मौका नहीं मिल पाया था। मुझे जो प्रतिवाद करना था, उन्‍हीं दिनों कर चुका था और भीकमपुरा से लौट भी आया था। सारे लिंक पाठकों के सामने हैं, ताकि दोनों तरफ की बातें सुनी जा सके… (अविनाश दास के फेसबुक वॉल से)

Abhishek Srivastava :  Avinash Das और Mohan Shrotriya नाम के दो दावों और दो निजी सचाइयों तथा Om Thanvi के 'वामपंथ विरोधी एजेंडे' के संदर्भ में चार बातें मैं भी कहना चाह रहा हूं। पहली बात: जनसत्‍ता के संपादक लोकतंत्र की आड़ में अपने अखबार का 'वाम विरोध' के लिए लगातार सचेतन इस्‍तेमाल कर रहे हैं, इसमें मुझे कोई शक नहीं है। अविनाश का लेख जाने-अनजाने संपादक के निजी एजेंडे में फिट है। दूसरी बात: अविनाश के आत्‍मवक्‍तव्‍य को सौ फीसदी सच मानने के लिए मेरे पास निजी अनुभवों और दूसरे युवा वाम कार्यकर्ताओं-लेखकों के अनुभवों का मोटा आधार मौजूद है। ऐसा शोषण प्रचुर मात्रा में होता रहा है और हो रहा है। तीसरी बात: कोई भी युवा वाम कार्यकर्ता-लेखक अपने श्रम के शोषण को उसके वर्तमान देश-काल में उजागर न कर के दरअसल व्‍यापक बिरादराना एकता और राजनीतिक प्रतिबद्धता का ही संकेत देता है। यदि ऐसा रियलटाइम में होने लगा, तो कई वाम मठों के टूटने का खतरा पैदा हो जाएगा। कात्‍यायनी और शशिप्रकाश का ज्‍वलंत उदाहरण हमारे पास है। इसलिए हमेशा श्रम के शोषण को सह जाना अनैतिक नहीं होता, श्रम के शोषण की कहानियां बाद में कभी भी लिखी जा सकती हैं, जब शोषक का चेहरा अपने आप बेनकाब होने की स्थिति में आ गया हो या फिर व्‍यापक उद्देश्‍य पर उस वक्‍तव्‍य का कोई असर न हो रहा हो। चौथी बात: श्रम के शोषण की दास्‍तान लिखते वक्‍त ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि वह जाने-अनजाने किसी की एजेंडापूर्ति का औज़ार न बन जाए। उससे प्रामाणिकता का संकट पैदा होता है। पांचवीं बात: उपर्युक्‍त चारों स्‍थापनाएं अविनाश और श्रोत्रिय जी के दिए परस्‍पर काटने वाले तथ्‍यों से निरपेक्ष मानी जाएं क्‍योंकि सच क्‍या है, इसे कोई तीसरा तय नहीं कर सकता। (अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से)

Pankaj Chaturvedi : अभी अभी श्री ओम थानवीजी का फोन आया, भीकमपुरा किशौरी की पुस्‍तकों के बारे में श्री अविनाश की जनसत्‍ता में प्रकाशित टीप पर असल में मेरा सरोकार किसी पक्ष या विपक्ष में खड़े होना नहीं था. बस अनुपम मिश्र जैसे संत पुरूष का भी उसमें नाम था, तो मुझे लगा था कि अविनाश के आलेख पर दो व्‍यक्तियों, राजेन्‍द्र सिंहजी और अनुपम बाबू का मनतव्‍य अवश्‍य लिया जाना था. ओमजी ने बताया कि उन्‍होंने आलेख को प्राकशित करने के पहले दोनों से ही उनका पक्ष जाना था और तभी आलेख प्रकाशित किया था. यह दुखद भी है और भयावह भी, कोई युवा उत्‍साह, पवित्रता के भाव और लगन के साथ हिंदी की लिखने पढने की दुनिया में आए और उसकी मेहनत किसी दीगर नाम से छपे. सच में यह बौद्धिक बलात्‍कार की तरह ही होगा. काश हम अपनी गलती को मान कर उसे स्‍वीकार करने के महान गुणों को अपने में समाहित कर पाते. (पंकज चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से)

संजीव सिन्हा : वामपंथियों की संकीर्ण मानसिकता की खुलती पोल..  आज के जनसत्ता में कमल किशोर गोयनका, कृष्णदत्त पालीवाल और अविनाश के लेख प्रकाशित हुए हैं। तीनों ने जमकर वामपंथियों की खबर ली है. गोयनका ने प्रेमचंद की मार्क्सवादी छवि गढ़े जाने पर प्रहार किया है. तो पालीवाल ने रामविलास शर्मा को लिखे निराला के पत्र को उद्धृत किया है, जिसमें निराला मार्क्सवादियों के बारे में कहते हैं, "ये उच्च शिक्षित जन कुछ लिखते भी हैं, इसमें मुझे संशय है." वहीं अविनाश ने वामपंथी लेखक द्वारा युवा कलम की कमाई हड़प जाने की विद्रूपता को सहजता से प्रस्तुत किया है. शाबाश जनसत्ता! (संजीव सिन्हा के फेसबुक वॉल से)

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