अशोक बाजपेयी के हुलफुल्लेपन के अंतर्राष्ट्रीय दुष्परिणाम

मुझे लोक या आंचलिक भाषाओं का मरजीवड़ा कहलाए जाने की कोई पछाँही बीमारी नहीं है किन्तु कभी-कभी कथित बोली-बानियों के कुछ शब्द कतिपय सन्दर्भविशेषों में बहुत कारगर हो उठते हैं. हमारे बुंदेलखंड में अतिरिक्त या मूर्ख उत्साहीलालों के लिए ‘हुलफुल्ला’ विशेषण चलता है और शायद उसी अर्थ में ‘हुड़ुकलुल्लू’ को भी हिंदी में कई, विशेषतः युवा, लेखकों ने अंगीकार किया है. इधर एक ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण हादसा पेश आया है कि यह दोनों शब्द बहुत याद आ रहे हैं.
 
हिंदी जगत को स्मरण होगा कि मित्रवर अशोक वाजपेयी ने (‘कभी-कभार’,9 जून) उसे सूचित किया था कि वह इस ‘’रवीन्द्रनाथ ‘गीतांजलि’ नोबेल-पुरस्कार शती-वर्ष’’ के उपलक्ष्य में ‘सैयद हैदर रज़ा प्रतिष्ठान’ के तत्वावधान में एक विश्व कविता समारोह करने जा रहे हैं जिसके लिए उन्होंने भारत के राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री से आर्थिक सब्सिडी मांगी है. उनके द्वारा आयोज्य इस वैश्विक अनुष्ठान में कितने देशों से कौन-से कवि-कवयित्रियाँ आनेवाले थे यह अशोक ने ज़ाहिर नहीं किया था – शायद इसलिए भी कि वे स्वयं इतने विदेशी भागीदारों को या तो जानते न थे या अनेक कारणों से उनके नाम तय नहीं कर पाए थे. 
 
चूंकि मेरे लिखे पर उचित ही व्यापक रूप से ध्यान नहीं दिया जाता इसलिए यह कैसे कहूं कि उसी हिंदी जगत को यह भी स्मरण होगा कि अगले ही रविवार (16 जून) को मैंने अशोक के प्रस्तावित विश्व काव्य मेले का रवीन्द्रनाथ के बहाने विरोध किया था और यह सवाल उठाए थे कि किसी जीवित, संपन्न चित्रकार को अमर और समृद्धतर बनाए जाने के उद्देश्य से खड़े किये गए निजी ट्रस्ट या फाउंडेशन द्वारा आयोजित किसी अंतर्राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन को कोई भी सरकार आर्थिक मदद क्यों देगी. विशेषतः तब जबकि उसी सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा सौ प्रतिशत पोषित एक ऐसी अकादमी भी मौजूद है (अब पिछले कई वर्षों से वह मिनिस्ट्री और वह अकादमी कैसी है और उनके मंत्री/अध्यक्ष/सचिव आदि कैसे रहते चले आए हैं यह एक अलग बहस है) जिसका काम ही ऐसी साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना है और जिसका कार्यालय पिछली आधी सदी से ऐसे भवन में है जिसका नाम कवि रवीन्द्र पर ही है? ऐसे किसी भी जलसे पर एक करोड़ रुपए से कम क्या खर्च होगा. अशोक में सब ऐब होंगे पर उनमें कंजूसी शामिल नहीं है, उनके यहां पैसा शराब की तरह बहाया जाता रहा है और इतनी बड़ी रक़म सरकार द्वारा किसी निजी प्रतिष्ठान के सीईओ को कैसे सैंक्शन की जा सकती है, भले ही वह ‘अधिकारी’ उसी मंत्रालय में एक वरिष्ठ आइ ए एस अफ़सर रहकर रिटायर क्यों न हुआ हो ?
 
लेकिन रज़ा फाउंडेशन के पैसे और पद,अपने पूर्व-आइ ए एस होने के आत्म-विश्वास और अपनी निजी प्रतिभा के ‘हुब्रिस’ से मुग्ध अशोक ने इस विश्व-काव्यायोजन के प्रयोजन हेतु  ‘पी आर’ तथा प्रतिभा-आखेट के लिए एक ‘यूरोप-टूअर’ बना ही डाला और वहाँ विभिन्न देशों, राजधानियों-महानगरों, साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं की यात्राएँ कीं. मित्रों और पूर्व-परिचितों से भी मिले. उन्हें यकीन था कि उनके प्रतिष्ठान को सरकारी अनुष्ठान-राशि मिल जाएगी और उन्होंने दाएं-बाएं आश्वासन और निमंत्रण बांटने शुरू कर दिए.
 
अब जब कोई ऐसा ‘सेल्फ-फिनान्स्ड’ व्यक्ति यूरोप में सही ‘नेम-ड्रॉपिंग’ सहित अपनी कर्नल ब्लिम्प-नुमा, ’सूडो-ऑक्सब्रिज’ इंग्लिश बोलता हुआ इतने आत्म-गौरव से लबरेज़ घूमता है तो आमतौर पर भरोसा हो जाता है कि इस तरह के विज़िटिंग-कार्ड वाला, इतना डाइनैमिक 70-वर्षीय ‘अधेड़’ आदमी ‘फ्रॉड’ तो नहीं हो सकता. यूं भी अशोक ‘फ्रॉड’ नहीं हैं. उन्हें अपने आयोजन पर इतना विश्वास था कि उन्होंने सबको इसी दिसंबर की तारीख भी दे दी. लिहाज़ा उनके दावतनामों या तज़वीज़ों पर फ़ौरन यकीन किया गया, कुछ लोगों ने टिकट भी बुक कर लिए और कुछ संस्थाएं अपनी-अपनी सरकारों से अपने कवियों के लिए ग्रांट लेने की अर्ज़ियां भी देने लगीं. यूरोप में इन बातों को बहुत संजीदगी से लिया जाता है और महीनों पहले योजनाएं बनानी पड़ती हैं.
 
यह ठीक-ठीक मालूम नहीं हो पाया है कि अशोक ने रज़ा फाउंडेशन की ओर से कितने और कौन से कवियों और देशों को निमंत्रण या प्रस्ताव दिए. सिर्फ़ दो प्रमाणित जानकारियां हैं कि एक छोटे-से देश की बड़ी काव्य-प्रतिभा को उन्होंने पक्की चिट्ठी दी और दूसरे एक छोटे-से मुल्क से कहा कि वह दो कवियों को भेजने की तैयारियाँ कर ले, ख़त पहुंचा दिया जाएगा.
 
इधर दैवदुर्विपाक से कुछ ऐसा हुआ कि शायद अशोक का महत्वाकांक्षी प्रस्ताव राष्ट्रपति या/और प्रधानमंत्री कार्यालय से होता हुआ संस्कृति मंत्रालय के तार्किक गलियारों तक पहुंचा जहां वह सिद्धांततः तो मान लिया गया किन्तु इस तरमीम के साथ कि सारा कार्यान्वयन साहित्य अकादमी अपनी सुविधा से करेगी, पूरा विशेष बजट उसी को मिलेगा, वही जवाबदेह होगी, एक उच्चस्तरीय स्टियरिंग कमेटी ज़रूर बनेगी जिसमें संस्कृति मंत्रालय के सर्वोच्च अधिकारियों के साथ अशोक वाजपेयी (हिंदी), सीताकांत महापात्र (ओड़िया), के. सच्चिदानंदन (मलयालम), सितांशु यशस्चंद्र (गुजराती) आदि होंगे. अशोक के निमंत्रण जिन कवियों को भेजे जा चुके हैं उनके सम्मान की यथासंभव रक्षा की जाएगी किन्तु अन्य कवियों और मुल्कों की उनकी फ़ेहरिस्त को रद्द माना जाएगा.
 
यह सत्यापित नहीं हो पाया है किन्तु सुना है कि मंत्रालय में ऐसी अफ़वाह है कि उपरोक्त पहले तीन कवियों का एक गुप्त महत्वाकांक्षी एकल एजेंडा स्वयं को विश्व मंच पर नोबेल पुरस्कार के भारतीय उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट करने का भी हो सकता है, इसलिए एक विचित्र किन्तु सत्य शर्त यह भी लगा दी गई है कि कमेटी के कवि-सदस्य प्रस्तावित विश्व-काव्य-मंच पर स्वेच्छा से अपनी कविताएं नहीं पढ़ेंगे. यूं भी जहां इस सम्मेलन में चालीस विदेशी कवियों के पहुंचने की आशंका है वहां भारत को सिर्फ़ दस का कोटा अलॉट है जिसके लिए राशन की दूकान पर केरोसीन की आमद जैसी फ़ौज़दारी होगी.
लेकिन यूरोप में अशोक की अदूरदर्शी, ग़ैरज़िम्मेदाराना, आपत्तिजनक, लगभग आपराधिक गतिविधियों के दुष्परिणाम उन कवियों और देशों को झेलने पड़ रहे हैं जिन्होंने रज़ा फाउन्डेशन के इस नुमाइंदे पर विश्वास कर लिया. जिस प्रतिभागी को वह दिसंबर का पत्र दे आए थे उसे अब अकादमी का 4-9 फरवरी का निमंत्रण मिला है, जब उसे दक्षिण अमेरिका के एक बड़े कविता-समारोह में जाना ही है और इधर उसने दिसंबर का दो व्यक्तियों का भारत का टिकट ले रखा था. अशोक अब अपनी लज्जा ढांपने के लिए उसे दिल्ली से कहीं बहुत दूर किन्हीं संदिग्ध जेबी भगिनी-संस्थाओं के सामने कविता पढ़ने भेज रहे हैं लेकिन स्वाभाविक है कि वह बेहद नाराज़ और परेशान है. इतने बड़े काव्य-व्यक्तित्व के साथ यह सरासर धोखाधड़ी है. अशोक ने उनसे कोई क्षमा-याचना भी नहीं की है.
 
यह मामला तो एक व्यक्ति के साथ था लेकिन दूसरे में तो अशोक ने एक राष्ट्रीय साहित्यिक संस्थान के साथ दुर्व्यवहार किया है. अव्वल तो यह समझना मुश्किल है कि उन्होंने भले ही कविता में समृद्ध किन्तु अपेक्षाकृत एक छोटे देश को दो निमंत्रणों का प्रलोभन क्यों दिया क्योंकि उस पैमाने पर तो शायद जर्मनी और फ्रांस सरीखे देशों से उन्होंने दस-दस कवि बुलाए होंगे. उस संस्थान ने अपने मंत्रालय से दिसंबर की भारत-यात्रा के लिए दो कवियों के वास्ते अनुदान लेने की कार्रवाई शुरू कर दी लेकिन जब अशोक ने उनसे सारे संपर्क तोड़ लिए तो घबरा कर उन्होंने पूछताछ शुरू की और उन्हें पता चला कि साहित्य अकादेमी अशोक की लिस्ट के कवियों को आमंत्रित कर चुकी है और उनके देश से कोई नाम नहीं है. इस संस्थान ने अपनी साख खोई हो या ना खोई हो, यह उनके राष्ट्रीय साहित्य की अवमानना तो है ही. पता नहीं वह किसको क्या जवाब दे रहे होंगे.
 
इस बात की औपचारिक जांच होनी चाहिए कि अशोक ने किस आधार पर किन कवियों और देशों को निमंत्रित किया था. साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय को न केवल इन तथ्यों को उजागर करना चाहिए बल्कि सैयद हैदर रज़ा, अशोक वाजपेयी और रज़ा ट्रस्ट के जेबी ट्रस्टियों से प्रभावित देशों और विदेशी कवियों से लिखित, सार्वजनिक क्षमा-याचना करवानी चाहिए. भारत के विदेश मंत्रालय और भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् (आइ.सी.सी.आर.) को इस घटना को एक उदाहरण बना कर दिल्ली-स्थित सारे दूतावासों को एक गश्ती-पत्र लिख कर चेताना चाहिए कि वे और उनके सम्बद्ध संस्थान इस तरह के निमंत्रणों और उन्हें देने वाली संस्थाओं की पूरी जांच कर लिया करें. इस विश्व कविता समारोह में तो ऐसा पत्र बंटवाना ही चाहिए ताकि वह कवियों के माध्यम से ही सारे देशों और अंतर्राष्ट्रीय साहित्य-बिरादरी में प्रसारित हो जाए. अशोक की विचारहीन अहम्मन्यता से विदेशों मे पहले से ही पिटी हुई भारत की छवि पर एक और दाग लगा है. इधर भारत में कई ‘भाषा’ या ‘विश्व साहित्य' और फिल्मादि समारोह कुकुरमुत्तों की तरह सर उठा रहे हैं जिनके प्रच्छन्न उद्देश्य एकदम प्रकट हैं. यह सही है कि उनसे सम्बद्ध अत्यंत संदिग्ध और दुर्बुद्धि स्त्री-पुरुषों के लिए कई दरवाज़े खोल दिए गए हैं लेकिन दिग्भ्रमित उत्साह में सैयद हैदर रज़ा और अशोक वाजपेयी के नाम भी उन उचक्के माफ़ियाओं के साथ जुड़ने के मोहताज क्यों दिखें?
 
लेखक विष्णु खरे वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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