आंतरिक राजनीति में फंसा ‘पुष्‍प सवेरा’, काम करने वाले हतोत्‍साहित

चाटुकारिता पसंद और 'कान के कच्चे' प्रबंध तंत्र की वजह से आगरा से प्रकाशित दैनिक पुष्प सवेरा शुरुआती दिनों में बुरे हाल की ओर अग्रसर होने लगा है। बेहतरी में जुटे लोग हथियार डाल रहे हैं और अखबार की क्वालिटी दिन-प्रतिदिन गिर रही है। सत्ता की कमान जातिवादी, नाकारा और चमचागिरी पसंद लोगों ने झटक ली है। हाल इस तरह का हो गया है कि धन उगाही के लिए कुख्यात रिपोर्टर बीटों की सीमाएं लांघ कर लिख रहे हैं। तभी तो रविवार के अंक में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की खबर कमजोर छापी गई।

आगरा के एक प्रतिष्ठित बिल्डर ने पुष्प सवेरा अखबार निकाला है। फिलहाल, बिल्डर कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करता और कमान प्रबंध संपादक ओम ठाकुर के नाम से पहचाने जाने वाले ओम सिंह कुशवाहा को सौंप रखी है। यहीं से राजनीति शुरू हो रही है। कुशवाहा संयुक्त संपादक राजीव मित्तल से व्यक्तिगत रंजिश जैसी मानते हैं और उनके निकटस्थ उन कर्मचारियों से गाली-गलौज करने से भी नहीं हिचकते, जो पूर्वांचल से ताल्लुक रखते हैं। शुक्रवार को मीटिंग में खुलेआम बरसे भी कि पुरबियों को निकाल बाहर करूंगा। जनरल डेस्क का पूरा काम इन्हीं लोगों के पास है, अखबार में गुणवत्ता युक्त खबरें भी लग रही हैं लेकिन कुशवाहा की नजदीकी सजातीय लॉबी कुतर्कों से कमियां निकालती है।

रात को एक अन्य आला अधिकारी और खराब छवि के रहे बुजुर्ग प्रूफ रीडर के साथ वह अपने कमरे में न जाने कब, किसे जलीज कर दें, यह कहा नहीं जा सकता। प्रूफ रीडर जैसे छोटे पद का व्यक्ति भी खुलकर बोलता है। उसके इशारे पर दायित्वों का आवंटन होता है। उदाहरण के लिए स्थानीय निकाय चुनाव डेस्क पर सुधीर दुबे को बैठा दिया गया। सुधीर दुबे को पिछले दिनों समाचार संपादक अनिल दीक्षित ने खराब और बेईमान आशय से लिखी खबरों की वजह से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। वह तीन दिन सी एक्सप्रेस में रहे और वहां के संपादक डॉ. हर्षदेव की गालियां खाने के बाद किसी तरह जोड़-तोड़ करके फिर लौट आए। इन्हीं महोदय की वजह से अखबार में रविवार को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन से जुड़ी खबर में खेल हुआ। आगरा में इस मिशन के घोटाले से जुड़े कागजातों में आग लगा दी गई है। इसे जागरण और अमर उजाला ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है पर पुष्प सवेरा ने सीएमओ के झूठे वर्जन के साथ घोटालेबाजों को हरी झंडी दे दी है जबकि दोनों अन्य अखबारों ने सीएमओ का वो वर्जन छापा है, जिसमें उन्होंने मामले को संदिग्ध मानते हुए जांच कराने की बात कही है।

कुशवाहा लॉबी के खासमखास अन्य रिपोर्टरों का भी इसी तरह का जलवा है जिस बीट पर चाहें लिख दें। नतीजा सामने आ रहा है, रिपोर्टर हतोत्साहित हो रहे हैं और खुद को डेस्क पर भेजने का आग्रह कर रहे हैं। काम करने के इच्छुक लोगों में भी हताशा है। संयुक्त संपादक के अलावा संपादकीय हॉल में बैठे सभी अधिकारी अब सिर्फ उतना काम कर रहे हैं जितना जरूरी है और नौकरी में आता है। डेस्क, रिपोर्टिंग और अंचल, सभी अंग इसी तरह प्रभावित हैं। फोटोग्राफरों का प्रभारी जिसे बनाया गया है वो काम नहीं करता और शाम को असरदार लॉबी की चाटुकारिता करते हुए अन्य फोटोग्राफरों को अपमानित कराता है।

प्रसार विभाग में मुफ्त समाचार पत्र वितरण के कार्य में लगे एक अधिकारी को महज इसलिये अपमानित किया गया कि उसे 12 लड़कों के लिए 1200 रुपये का बिल लगाया था। सौ रुपये में एक दिन तो आजकल मजदूर भी काम नहीं करते, लेकिन कुशवाहा साहब बिल में कटौती कर प्रबंधन की नजरों में चढ़ना चाहते थे। इसी तरह इसी लॉबी के खासमखास विज्ञापन मैनेजर ने लंबी-चौड़ी टीम तो भर्ती करा ली लेकिन विज्ञापन एक पैसे का भी नहीं छप रहा। बस ग्रुप के हाउस एड और अखबार की इनामी योजनाएं छप रही हैं। अखबार में नौकरी पाने के लिए वह सभी लोग अर्हं हैं, जो सी एक्सप्रेस और कल्पतरू एक्सप्रेस में कार्यरत हैं, चाहें कुछ जानते हों या नहीं। इसी वजह से अखबार में अक्षम लोगों का जमावड़ा हो चुका है। कर्मचारियों की भीड़ है, देखना है कि बिल्डर इस सफेद हाथी और उसके नाकारा प्रबंधकों को कब तक बर्दाश्त करता है?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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