आइए जानें ‘फ्रंटियर’ अखबार और इसके संपादक समर सेन को

‘साहित्य समाज का दर्पण है’ की उक्ति ऐसे साहित्यकारों के लिए उपयुक्त है जिनका सृजन सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हो. इसी प्रकार ‘पत्रकारिता, शीघ्रता में लिखा साहित्य है’ की उक्ति ऐसे पत्रकारों के लिए उपयुक्त है जिनका लेखन में साहित्यिक समझ जुड़ी हो. पत्रकारिता को लेखन की एक विधा के रूप में विकसित करने में साहित्यकारों का योगदान सर्वोपरि रहा है. समर सेन (1916-1987) ने सबसे पहले बांग्ला भाषा के अत्यंत प्रतिभाशाली कवि के रूप में अपनी पहचान बनायी, फिर अपने चारों ओर के सामाजिक परिवेश में सुधार लाने के निश्चय के साथ कविता लेखन त्याग कर पत्रकारिता को पूरी तरह अपना लिया.

पश्चिम बंगाल में 1960-1970 के दशकों में समर सेन ने नक्सलवादी आंदोलन के दौरान प्रशासन और नक्सल आंदोलन के समर्थकों से भयभीत हुए बिना अपने समाचारपत्र  ‘फ्रंटियर’  में निर्भीक व निष्पक्ष पत्रकारिता का एक नमूना पेश किया. भारत में आंतरिक आपातकाल के दौरान लागू की गयी प्रेस सेंसरशिप का विरोध करने के कारण ‘फ्रंटियर’  को अपना प्रकाशन बंद करने को बाध्य किया गया. समर सेन का जन्म कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक प्रख्यात बांग्ला साहित्यकार परिवार में हुआ था, इनके दादा दिनेश चंद्र सेन एक प्रसिद्ध साहित्यकार और बंगीय साहित्य परिषद के वरिष्ठ सदस्य भी थे, इनके पिता अरुण चंद्र सेन भी एक अकादमिक थे.

और बकौल अरुण सेन,‘ वे एक जीनियस पिता के औसत पुत्र और एक जीनियस पुत्र के औसत पिता थे.’  एक युवा कवि के रूप में समर सेन अपने समकालीन कवियों के समान ही गुरु देव रवींद्र नाथ टैगोर से बहुत प्रभावित थे, लेकिन कुछ समय के बाद उन्होंने रूमानी काव्य के स्थान पर अपनी रचनाओं में आधुनिक कविता एवं यथार्थवाद का समावेश किया. समर सेन बांग्ला कविताओं में अंगरेजी व फ्रांसीसी आधुनिकता को प्रस्तुत करने वाले पहले साहित्यकार माने जाते हैं. वर्ष 1936 में समर सेन की कुछ अंगरेजी कविताएं उस समय के प्रतिष्ठित टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट में प्रकाशित की गयी थी. 1937 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से अंगरेजी साहित्य में स्नातक की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान और स्वर्ण पदक प्राप्त किया,इसके तुरंत बाद उन्होंने अपनी कविताओं की पहली पुस्तक को ‘एकटि कोबिता’ का प्रकाशन किया.

इस पुस्तक के प्रकाशन का व्यय उठाने के लिए समर सेन ने अपना स्वर्ण पदक ही बेच दिया था और इस पुस्तक को उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक मुजफ्फर अहमद को समर्पित किया था. अपने कॉलेज के दिनों में अपने मित्रों के साथ अवकाश बिताने समर सेन रांची भी आये थे लेकिन अन्य मित्रों की तरह जलप्रपात देखने के स्थान पर कांके स्थित मानसिक चिकित्सालय गये और वहां पर बहुत देर तक रोगियों से बातचीत करते रहे. अंगरेजी के स्नातकोत्तर उपाधि में भी समर सेन ने कलकत्ता विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया और इसके बाद ने दिल्ली के एक महाविद्यालय में अध्यापन का काम शुरू किया. इस दौरान भी समर सेन बांग्ला में अपनी कविताएं प्रकाशित करते रहे और बांग्ला कवियों की अग्रिम पंक्ति के साहित्यकार माने गये, लेकिन अचानक एक दिन उन्होंने कविता लिखना पूरी तरह से छोड़ दिया.

समर सेन ने अपने जीवन कई तरह के काम किये, जैसे आकाशवाणी, स्टेट्समैन समाचारपत्र में उप संपादक की नौकरी, वर्ष 1956-62 में रूस में रहकर अनुवादक की भूमिका और वहां से लौटकर कलकत्ता में एक विज्ञापन एजेंसी में कॉपीराइटिंग भी शामिल है. एक संपादक-पत्रकार के रूप में समर सेन ने कभी समझौता करना नहीं सीखा था और इसी कारण उन्हें स्थापित समाचारपत्रों में लंबे समय तक काम करने में बहुत मुश्किल होती थी. वर्ष 1964 में समर सेन, आनंद बाजार समूह के समाचारपत्र ‘हिंदुस्तान स्टैण्डर्ड’  के संयुक्त संपादक थे तब पूर्वी बंगाल में सांप्रदायिक उपद्रव से संबंधित खबरों को लेकर उनका अपने प्रबंधकों-मालिकों से टकराव हुआ जिसके बाद समर सेन ने यह नौकरी छोड़ दी.

वर्ष 1964 में समर सेन ने भारत सरकार में केंद्रीय मंत्री हुमायूं कबीर के स्वामित्व वाले नये साप्ताहिक ‘नाउ’  के संपादक का काम संभाला. इस नये अखबार के नाम के पंजीयन के लिए समर सेन ने अनेक बार अखबार के अनोखे नाम सोचकर संबंधित अधिकारियों को भेजे, जो हर बार किसी न किसी कारण से निरस्त हो गये,

हताश समर सेन ने अंत में नाम भेजा ‘नाउ ऑर नेवर’, पंजीयनकर्ताओं ने अखबार को नाम दिया ‘नाउ ’. समर सेन के कार्यकाल में इस साप्ताहिक में भारत के प्रख्यात लेखकों ने योगदान दिया और बहुत कम समय में यह समाचारपत्र बहुत लोकप्रिय हो गया, लेकिन केवल चार साल बाद वर्ष 1968 में हुमायूं कबीर को समर सेन की विचारधारा में अतिशय वामपंथी रुझान दिखा और उन्होंने समर सेन को नौकरी से निकाल दिया. समर सेन ने अपने मित्रों और सहयोगियों से आर्थिक सहयोग मांगकर ‘फ्रंटियर’  नामक साप्ताहिक निकालने का निर्णय लिया.

मित्रों ने तो 60,000 रुपये से अधिक धन राशि देने का वचन दिया, लेकिन जब पैसे देने की बात आयी तो समर सेन को बमुश्किल 9,000 रुपये ही मिल पाये. यह समाचारपत्र वामपंथी विचारों का समर्थक था और प्रशासनिक उत्पीड़न के दौर में यह एकमात्र ऐसा अखबार था जिसमें क्रांतिकारी वामपंथी विचारों की अभिव्यक्ति के लिए भी स्थान था, लेकिन ‘फ्रंटियर’ , नक्सलवाद और चारू मजुमदार के हिंसक अभियान के मुखर विरोध में था.

‘फ्रंटियर’ समाचारपत्र को कभी भी अधिक ग्राहक संख्या और अच्छे लेखकों का साथ नहीं मिला. एक समय यह साप्ताहिक समर सेन इसे अपने खर्चे पर चला रहे थे. वर्ष 1947 में भारत में आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप के दौर में समर सेन के विरोध के बाद इस समाचारपत्र का प्रकाशन बंद कर दिया गया. आपातकाल के बाद समर सेन में इस पत्र को चलाने की इच्छाशक्ति भी नहीं बची थी लेकिन एक बार फिर इस समाचार पत्र को पुनस्र्थापित करने के प्रयास हो रहे हैं. अपने जीवन के आखिरी दौर में समर सेन आर्थिक रूप से बहुत कमजोर हो गये थे और वामपंथ के विखंडन, नक्सल समर्थकों पर प्रशासनिक प्रताड़ना, नक्सलवाद की हिंसक विद्रूप शैली ने सैद्धांतिक वामपंथ में उनके विश्वास को झकझोर दिया था. असाधारण प्रतिभा और अदम्य साहस के धनी समर सेन का वर्ष 1987 में निधन हो गया.

लेखक रवि दत्त बाजपेयी का यह लिखा प्रभात खबर अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

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