आईपीएस नजरुल ने मुख्यमंत्री ममता के खिलाफ दर्ज किया फौजदारी मुकदमा

अभूतपूर्व प्रशासनिक संकट है बंगाल में इन दिनों। बाकी देश में भी इसकी कोई नजीर है या नहीं, फिलहाल नहीं मालूम। राज्य सरकार की सेवा में रहते हुए वरिष्ठतम आईपीएस अफसर ने मुख्यमंत्री के खिलाफ फौजदारी मुकदमा दर्ज करा दिया। एक समय मुख्यमंत्री के घनिष्ठ रहे साहित्यकार पुलिस अफसर नजरुल इस्लाम ने इससे पहले मुख्यमंत्री पर अल्पसंख्यकों के साथ छलावा करने करने का आरोप ही नहीं लगाया बल्कि पूरी एक किताब लिखकर प्रकाशित कर दी, ''मुस्लिमदेर कि करणीय'' मतलब मुसलमान क्या करें। वे लगातार सख्त भाषा में मुख्यमंत्री की आलोचना करते रहे हैं। इस मुताबिक उनके खिलाफ अभियोगपत्र भी दायर हो गया और उनकी पदोन्नति भी रुक गयी।

दरअसल इसी पुस्तक को लेकर ही दोनों के संबंध बिगड़ गये। वरना दीदी जब रेलमंत्री थी, तब उनके सबसे नजदीक रहे हैं नजरुल इस्लाम। तब वाम जमाने की भी उन्होंने खुलकर आलोचना की थी। मुख्यमंत्री बनने के बाद दीदी के करीब ही रहे हैं नजरुल। पर नजरुल इस्लाम देश भर में शायद विरले ही पुलिस अफसर हैं जो प्रतिष्ठित साहित्यकार भी हैं और उनकी कलम उनकी वर्दी पर हमेशा भारी पड़ती रही है। वाम शासन की जितनी आलोचना की उन्होंने, उससे कम वे दीदी की नीतियों का विरोध नहीं कर रहे हैं। यहां तक फिर भी ठीक था। दमयंती सेन से लेकर पचनंदा तक तमाम पुलिस अफसरान किनारे भी किये जाते रहे हैं।

लेकिन आईपीएस पुलिस अफसर नजरुल इस्लाम ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, मुख्यसचिव संजय मित्र और गृहसचिव वासुदेव बंद्योपाध्याय के खिलाफ फौजदारी मामला दायर करके खुली बगावत कर दी है। नजरुल के मुताबिक ये तमाम लोग उन्हें नाजायज ढंग से परेशान कर रहे हैं। हालांकि इस बारे में नजरुल ने सार्वजनिक तौर पर मुंह नहीं खोला है। वे कहते हैं कि अभी उन्हें इस बारे में कोई बात नहीं करनी है। लालबाजार भी अजब पशोपेश में है, वहां भी हर जुबान पर ताला है। कोलकाता के हेयर स्ट्रीट थाने में 17 अगस्त को नजरुल ने यह मामला दर्ज कराया है जिसमें उन्होंने साफ तौर पर आरोप लगाया कि है कि उन्हें बेइज्जत करने के लिए जालसाजी भी की गयी है।

मालूम हो कि अल्पसंख्यकों के बारे में लिखी उनकी पुस्तक पर सरकोर को कड़ा ऐतराज रहा है। एक वक्त तो इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने की भी तैयारी हुई और इसे लेकर खूब हंगामा हुआ। बहरहाल किताब प्रतिबंधित नहीं हुई लेकिन सरकारी सेवा में रहते हुए कोई ऐसी पुस्तक कैसे लिख सकता है, इसे लेकर नजरुल के खिलाफ विभागीय जांच पड़ताल हुई। नजरुल पर सांप्रदायिकता भड़काने का आरोप लगा। लेकिन रजिस्ट्रार आफ पब्लिकेशन ने नजरुल को क्लीन चिट देते हुए साफ कर दिया कि उनकी पुस्तक में आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है। इसके बाद मुख्यमंत्री को भेजे अपने गोपनीयपत्र को लेकर भी नजरुल विवाद में फंस गये। मुख्यमंत्री की शुभकामनों के जवाब में तीखी प्रतिक्रिया भेजी नजरुल ने जिसे प्रशासनिक दृष्टि से विष वमन ही माना गया। इससे मुख्यमत्री से उनके संबंध और क़टु होते गये। क्रमशः वे किनारे लगते गये और उनकी प्रतिक्रियाएं तीखी से तीखी होती गयीं।

नजरुल ने बाहैसियत रेलमंत्री ममता बनर्जी के लगातार अनैतिक कार्यकलापों का खुलासा किया। यहां तक कि रेलमंत्रालय में गैरकानूनी आर्थिक लेनदेन ममता के कार्यकाल में हुए, ऐसे आरोप भी लगाये नजरुल ने। जाहिर है कि संबंध बिगड़ने में रही सही कसर पूरी हो गयी। उनके इन आरोपों के जवाब में ही राज्य सरकार की ओर से जवाबी कार्रवाई शुरु हो गयी। बताया जाता है कि उनकी किताब पर प्रतिबंध की कोशिश भी इन्हीं आरोपों की प्रतिक्रिया में हुई। मुख्यमंत्री के खिलाफ गंभीर आरोप लगाने की वजह से नजरुल के खिलाफ दुबारा चार्जशीट लगायी गयी। इसके जवाब में नजरुल ने जवाबी मामला दायर कर दिया। सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिव्युनल में यह इस मामले की सुनवाई होने लगी और नजरुल की पदोन्नति रोक दी गयी। इस पर राज्य सरकार को पत्र लिखकर नजरुल ने आरोप लगाया कि अनैतिक तरीके से उनकी पदोन्नति रोक दी गयी है। उन्होंने तभी चेतावनी दे दी थी कि निर्दिष्ट समय के बीतर उन्हें उनके पत्र का जवाब न मिला तो वे फौजदारी मामला दर्ज करायेंगे। वह अवधि पार हो गयी और सचमुच नजरुल ने फौजदारी मुकदमा दर्ज करा ही दिया।

कोलकाता से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

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