आईपीएस राहुल की मौत पर हरिभूमि के संपादक की त्वरित टिप्पणी के खिलाफ फेसबुक पर मुहिम

हिंदी अखबार हरिभूमि के प्रबंध संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने अपने अखबार में ''आईपीएस की लाश पर हवन'' शीर्षक से खुद की लिखी एक त्वरित टिप्पणी प्रकाशित की. (पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- हिमांशु लेख) उन्होंने इसे अपने फेसबुक प्रोफाइल पर भी डाला है. उनके इस लिखे का कई पत्रकार पुरजोर विरोध कर रहे हैं और उन्हें तरह तरह के तमगों से नवाज रहे हैं. फेसबुक पर डा. हिमांशु की त्वरित टिप्पणी के नीचे कई लोगों ने विरोधी टिप्पणियां की हैं और कुछ लोगों ने अलग से उनके खिलाफ अपने व्यू शेयर किए हैं. पहले वे टिप्पणियां जो डा. हिमांशु के लिखे के नीचे आई हैं…

Yagnyawalky Vashishth :  मैने आज के हरिभूमि में आपकी यह त्‍वरित टिप्‍पणी पढी है, और इसके कुछ हर्फों से मैं आंशिक रूप से सहमत हूं, पर आपने अपने शब्‍दों से जो संपूर्ण खाका या रेखा चित्र खींचने की कवायद की है, मैं उससे असहमत हूं, पूरी तरह से असहमत, मैं सुबह से आपकी इस त्‍वरित टिप्‍पणी को लेकर उद्विग्‍न हूं, और निश्‍चित तौर पर अपनी पहली फुरसत में लिखूंगा, पर बहरहाल केवल इतना कहना चाहता हूं कि आपने शब्‍दों का उपयोग तो शानदार किया है, आपने एक विचारधारा या अवधारण का उल्‍लेख करते हुए सारे तथ्‍यों को शेष सारी बातों को इससे ढांकने तापने की कोशिश की है, आपका अंदाज बेहद शातिर है, और इस रूप में शर्मसार करने वाला भी कि, यह लिखने वाले खुद आप है डॉक्‍टर हिमांशु द्विवेदी..

Aditya Tiwari : यदि आपकी बातो पर नजर डाला जाये तो यहाँ मीडिया की भूमिका पर एक संदेह करना कोई गलत बात नहीं होगी. कहीं कोई अख़बार आईजी को खलनायक बना रहे हैं तो कहीं कोई अपने ही ढंग से इस मुद्दे पर कटाक्ष कर रहा है. मुझे आपकी बातो से दिवंगत एसपी की पत्नी का वो बयान याद आ रहा है जब उसने दुखी मन से मीडिया को कोसते हुए कहा कि उनकी दुनिया तो सिर्फ इस बात को सुन के ही सिमट गई कि उनके पति ने घरेलू कारण से आत्महत्या कर ली…..हालाँकि आपकी बातों से मैं पूर्णतया वास्ता रखता हूं कि आत्महत्या एक कायरतापूर्ण कार्य है और किसी आईपीएस से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती मगर वो भी इन्सान था और कब किसे कौन सी बात बुरी लग जाये, ये तो समझ पाना मुश्किल है. अगर इस पूरे घटना में कोई हास्यास्पद बात मुझे नजर आई तो वो है हमारे राजनीतिज्ञों की हरकतें, कुछ भी उनका काम बनना चाहिए चाहे कुछ भी हो, बस एक दूसरे पर छींटाकशी का दौर चलते रहे, कुछ तो मिलेगा ही ………..

Anupam Singh :  द्विवेदी जी आप वरिष्ठ पत्रकार हैं और ज्ञानी भी। आपने जिस तरह से शब्दों का जाल बुना है वह काबिलेतारीफ है। सवाल यह है कि बिलासपुर में रहने वाले और खासकर मीडिया से जुडे लोग बेहतर तरीके से जानते हैं कि आईजी की कार्यशैली क्या थी। किस तरह से वे पहले भी अपने तौर तरीकों से चर्चा में रहे। इस संबंध में आज पत्रिका पढा जा सकता है। इसके बाद भी आप उन्हें नायक और राहुलजी को कायर साबित करने पर तुले हुए हैं, क्या यह लीक से हटकर कुछ कहने की कोशिश है या इसके पीछे कुछ और वजह है। इशारों से आपने व्यक्तिगत कारणों को आत्महत्या बताने की कोशिश की है। शुरू दिन से आपके अखबार का इस मामले में जैसा रुख रहा है, उससे यह अप्रत्याशित भी नहीं था। रहा सवाल बिलासपुर, रायगढ, दंतेवाडा सहित ऐसे लाखों लोगों को जो राहुल जी का सम्मान करते हैं, उनके लिए वे हमेशा हीरो ही रहेंगे। पुलिस व कानून जीपी सिंह को सही साबित कर दें, जिसकी की कोशिश की जा रही है। लेकिन मेरे जैसे लाखों लोग हैं जो राहुल जी को सही मानते हैं, आपके नजरिए को कदापि नहीं।

Harsh Panday : अखबार में यह जंबो लेख पढा। हिंदी के शब्दों में छोटी—मोटी गलतियां हैं। इन्हें नजरअंदाज कर भी दें तो पूरा ही लेख गलतियों का पहाड़ सरीखा है। दरअसल 12 मार्च, यानी घटना के दो दिनों तक इसी अखबार को पढने के बाद से लोगों के जेहन में यह सवाल कौंधने लगा था कि सारा शहर और उन तमाम शहरों के लोग, जहां राहुल शर्मा पदस्थ रहे, उनके सीनियर आिफसर को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, ऐसे में इस अखबार के पास उस अफसर के खिलाफ एक शब्द तक नहीं हैं। तीसरे दिन तक माजरा साफ हो गया और अखबार के दफतर से यह बात सडकों तक आ गई कि राजधानी में जिम्मेदार पद पर बैठे महानुभाव (स्वयं लेखक) से आईजी जीपी सिंह के काफी मधुर संबंध हैं, इसलिए यहां उनके खिलाफ रिपोर्टर का एक शब्द भी लिखना यानी नौकरी से खिलवाड से कम नहीं है। यह बात जाहिर होने के बाद शायद इस लेख पर किसी को न कोफत होना चाहिए, न ही नाराजगी। क्योंकि दोस्ती में तो लोग जान तक दे देते हैं, यह तो सिर्फ शब्दों की जादूगरी है। शब्द भी खुद के विचारों से उपजे नहीं लगते। यहां तो सहसा यूं लगा कि शब्द लेखक के हैं और विचार आरोपों से घिरे उस अफसर के हैं, जो एसपी की मौत के बाद कटघरे में है। ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, किसी से प्रेरित या दुष्प्रेरित नहीं।

कमल शुक्ला ने अपने प्रोफाइल पर इसे अलग से पोस्ट किया है…

Kamal Shukla : मतलब हिमांशु जी, फिर तो सरकार की गलत नीतियों के शिकार होकर कर्ज के बोझ में दबे किसानों की मौत भी कायराना हो गयी | जो आत्महत्या नहीं कर पा रहे उनके आन्दोलन को तो पहले ही आपने नक्सलवाद कहकर प्रतिबंधित कर रखा है, बाकि अपराधी करार दिए गए– जो उसमे भी शामिल न हुए उन्हें आप आतंकियों का समर्थक घोषित करते हो, जैसे की हर्षमंदर, ब्रह्मदेव, हिमांशु, विनायक — इस सूची में बहुत नाम हैं | रह गए वो लोग जो आपके इस भुलावे में पड़े हैं कि कभी तो न्याय मिलेगा? उन्हें तो सनकी पूरा जमाना कह रहा है | न्याय प्रक्रिया की तो आपके आका माफिया ने पहले ही माँ-बहन एक कर रखा है | आप अच्छी तरह जान रहें है की उन्हें जब समझ आएगा तब-तक वे या तो पागल हो गए रहेंगे या फिर पलायन कर चुके रहेंगे | हिमांशु जी आत्महत्या की तरफदारी नहीं कर रहा, मैं तो बचे हुए अन्य सभी राहुल से अनुरोध करूँगा कि अब वो अपनी जान देने के बजाय इस व्यवस्था को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने की लड़ाई में जुट जाएँ | या सब कोई अकेले जीपी सिंह नहीं करता है, बहुत सारे चेहरे होते हैं | ये जान लीजिये कि यह सड़ी व्यवस्था के हिंसक हमले की परिणिति है और इसके लिए तमाम जिन्दा लोग जवाबदार है, जो इस स्थिति को झेल रहें है | राहुल शर्मा की मौत केवल हत्या है, आत्म हत्या की परिस्थिति की सत्यता से जाँच हो तो— जैसे मीडिया कर्मी भी संदेह के घेरे में आयेंगे जिन्होंने सत्ता के हांथो चौथा स्तम्भ को गिरवी रख दिया है |

संजीव पांडेय ने इसे अपने वाल पर पोस्ट किया है…

Sanjeev Pandey : हम शर्मिंदा हैं… राहुल शर्मा जी हम शर्मिंदा हैं…. कि हम पत्रकार हैं…. जीवन में पहली बार अपने पत्रकार होने पर ग्लानी हो रही है कि हमारी बिरादरी में कुछ भडवे अब पत्रकार और संपादक बन बैठे हैं और इस हत्यारे सिस्टम की पैरवी कर रहे हैं। आप पर की गई टिप्पणी के लिए हम बेहद शर्मिंदा हैं…।

पूरी बहस को आप इन तीन लिंक पर क्लिक करके देख पढ़ सकते हैं और इसमें शरीक हो सकते हैं, आप चाहें तो सीधे अपनी राय नीचे दिए गए फेसबुक कमेंट बाक्स के जरिए भी शेयर पोस्ट सेंड कर सकते हैं…

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