‘आउटर’ पर बिक रहा पानी रिपोर्टरों के लिए क्‍यों एक्‍सक्‍लूसिव खबर है?

इंडिया टीवी इलाहाबाद के पत्रकार इमरान लईक ने आउटर पर बेरोजगार किशोरों की पलटन (रिपोटर्रों की भाषा में अवैध वेंडर) द्वारा बेचे जा रहे बोतल बंद पानी पर एक शानदार एक्सक्लूसिव खबर शूट की है। फेसबुक पर इसी स्टोरी का एक मुखड़ा व उसकी तीन-चार फोटूवें भी नजर आयीं। यह खबर हमें अंदरखाने यह बताती है कि तमाम लड़के जो बोतलबंद पानी इस समय यात्रियों को पिला रहे हैं, वह पेप्सी का एक्वाफिना नहीं है और न ही कोक का केनली। यह तो बोतल नकली है और शायद पानी भी, जो दूषित भी हो सकता है, आपका बना बनाया स्वास्थ्य चौपट कर सकता है।

खैर, मेरे यह समझ में नहीं आ रहा है कि पिछले एक सप्ताह से कलेजे को तलफा देने वाली भयंकर गर्मी के बीच हमारी ऐतिहासिक भारतीय रेलों में बूंद-बूंद पानी के लिये तरस रहे बच्चे, बूढ़े व नौजवानों को क्या हिदायद दूं कि साहब आप लोग यह जो नकली बोतलबंद पानी गटागट-गटागट पी मार रहे हो, ये न बड़ा खतरनाक है। 22 मई को तपती दुपहरी में दिल्ली से चलकर बरेली के रास्ते अमरोहा स्टेशन के पहले अपन से भी नहीं बर्दाश्त हुआ और भारी जद्जेहद के बाद एक लड़के से एक बोतल पानी खरीद लिया। पूछा भी कि यह सब क्या है रे… अवैध धंधा…। वह लड़का मेरी तरफ एक टक ताकता रहा और इसके पहले कि कोई संवाद या वाद-विवाद होता, हमारी लौहपथगामिनी ने तड़ाक से भोंपू बजा दी, पों….पों… और फिर हचर-हचर डोलती आगे चली।

खैर, घंटों प्यास से तड़प रहा मेरे गले का जब उस बच्चे की नकली बोतलबंद पानी से मिलन हुआ तो फिर समझो जान में जान आयी। इसी बोतल के पानी का मोल समझ में आया। एक बोतल पानी मिल गया, यह भी चांस की बात थी, वरना इसके पहले हापुड़ के आगे तो चूक गया था। खिड़की से हाथ निकालकर 15 रुपये लिये चिल्लाता रहा, ये पानी वाले लड़के एक इधर भी देना, लेकिन कहां, जब तक कि वह मेरी विन्डो तक पहुंचा सारी बोतलें झपट ली गयी थीं। अमरोहा स्टेशन के आउटर पर उस बच्चे के पास बोतलबंद पानी केवल 50 के आसपास थीं और उसके तलबगार करीब 200। एक आंकड़ा बताता है कि हिन्दुस्तान में पूरे रेलवे स्टेशनों को मिलाकर इतने पानी का दुरुपयोग होता है, जितना कि एक विशाल नदी इठला-इठला कर बहे और उसका ‘पानी’ रत्ती भर कम न होवे। थोड़ा सचेत होकर देखिये आपको भी इस पर इत्मीनान हो जायेगा। तो जल बीच कैसी हैं हमारी रेलें ..तेरे ही नाल सरोवर पानी और उस पर सवार ऐसे तलफें जैसे जल बिन मछरिया…। जय हो बोतल बंद पानी की।

25 मई 2013। वाराणसी से छत्रपति शिवाजी टर्मिनल जा रही एक रेल पर अपन भी सवार हुए और इलाहाबाद में छिंवकी जंक्शन से चार-छह कदम दूर ही यह छक्‍क से रूकी। फिर उसी हालात से आगही हुई। यहां भी पानी की इबारत बजिनसही लिख रहा हूं। ट्रेन धीमी होते ही, बाल्टी व डिब्बे लिए सैकड़ों किशोर दौड़े। उनमें दर्जनों 9-10 साल के बच्चे भी थे, जिन्हें हाथों में बाल्टी व खजूर तथा रथ छाप डालडा घी के दस किलवा डिब्बे टांगे देख मैं अपनी कैफिते-कल्ब संभाल नहीं सका। मुझे महसूस हुआ और याद आया यह शेर.. ‘राहत हो रंज हो कि खुशी हो कि इंतशारध वाजिब हर एक रंग में है शुकरे मिर्दगार तुम ही नहीं हो कुश्तए नरेंगे बेरोजगार। जर्नलिस्टिक लैंग्वुएज में इन बेरोजगारों की पलटन को भी अवैध वेंडर कहा जाना मुनासिब समझा जायेगा। बाल्टी-डिब्बे से मग व लोटे द्वारा जल निकालकर बोतल में भरने का पांच रुपया, छोटका, 30 रुपया का कोक वाला बॉटल होगा तो 2-3 रुपए में ही भरा जायेगा। कोई पांच-सात मिनट में दो-ढाई हजार रु का जल बिक गया। पानी बेचने वाले मासूम खुश नजर आ रहे थे। लेकिन जैसे मेमनों के झुंड में कोई सिंह टूट पड़ता है तो वहां भगदड़ मच जाती है वैसे ही सिक्का-रुपया गिन रहे बच्चों की भीड़ में न जाने कहां से अचानक एक वर्दी वाला प्रकट हो गया। शायद जीआरपी या आरपीएफ का कोई सिपाही। इस वर्दी वाले की गिद्ध दृष्टि पहले से ही कहीं से इन सभी पानी बेचनों वालों पर लगी हुई थी।

बहरहाल सारे के सारे बेबंद भागे। किसी का लोटा ट्रैक पर गिरा और टन से बाहर फेंका गया तो किसी का डिब्बा बीच पटरी पर। हजारों यात्रियों ने देखा दो चार डिब्बे पलटे पड़े थे और उसका शीतल जल ढुक-ढुक कर 47 डिग्री सेल्सियश तापमान में लाल पड़ चुकीं लोहे की पटरियों को शीतल कर रहा था। तब मुझे लगा कि बोतल बंद और डिब्बे-बाल्टी वाला यह पानी रिपोर्टरों की नजर में क्यों खबर है। इसमें इतना दूषित पानी क्यों नजर आ जाता है। यात्रियों की सेहत से ज्यादा किसकी और किसलिये चिंता होती है। हमारी बेरोजगारों की फौज जब बाल्टी में शीतल पानी बेच कर चार पैसे कमाती है तो यह अवैध क्यों नजर आने लगता है और एक वर्दी वाला कैसे अचानक प्रकट हो जाता है। अदृश्य रिपोर्टर व प्रकट वर्दी वाला, बेरोजगारों की पलटन, जो अवैध वेंडर है, सब गोलमाल।

तब समझ में आता है कि इंडिया जो दैट इज भारत भी है, में निवास करने वाली बहुसंख्यक आबादी कितने पाटों में पिस रही है। एक तरफ हैं रेलवे के वे आला अफसर, जो पेप्सी और कोका कोला कंपनियों के मालिक, बड़े-बड़े प्रबंधक और उनके प्लांट मैनेजरों से वह सारी सुविधाएं ले रहे हैं, जो कभी देश के बड़ी-बड़ी रियासतों के राजाओं को भी नसीब नहीं थीं। इनमें शामिल हैं-ज्यादातर देश के नौकरशाह और नेतागण, अमिताभ बच्चन, सलमान खान, अक्षयकुमार, आमिर खान और ऐश्वर्या राय। इनका कोई ब्रांड किसी को दूषित नजर नहीं आता। न तो वह स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। क्योंकि उसे क्रिकेट के भगवान सचिन तेन्दुलकर पीते हैं और इन्हीं कंपनियों के सिलाए कमीज व पैंट पहनकर हीरो बने बैठे हैं। कोक पीकर राजस्थान की नई नवेली दुल्हन को उसका पति ‘मर्द’ नजर आने लगता है और ठंडा पेय गटकने के बाद देश के 25 करोड़ युवओं को समझ में आता है कि केवल डर के आगे जीत है। और कहीं जीतने का सवाल ही नहीं।          

पहले रेलवे स्टेशनों पर प्याउ लगते थे। रेलवे स्टाफ की मदद से स्वयं सेवी लोग यात्रियों को बाअदब घड़े का ठंडा व सोंधा-सोंधा पानी पिलाते थे। गर्मी शुरू होते ही करीब-करीब सभी प्लेटफार्मों पर यह व्यवस्था की जाती थी। लेकिन इधर पांच एक सालों से स्टेशनों पर प्याउ की व्यवस्था नजर नहीं आ रही है। कहां गये यह प्याउ और हाथों में गिलास लेकर यात्रियों को शीतल जल पिलाने वाले लोग। यहीं नहीं बल्कि प्रत्येक स्टेशनों पर छोटे-छोटे घड़े व सुराहियां उपलब्ध रहती थीं, जिसे दूर तक सफर करने वाले यात्री 5-10 रुपये में खरीदते लेते थे और उसमें स्टेशन से ही पानी भर कर अपनी सीट के आस-पास रख लेते थे, जिससे उन्हें रास्ते में पानी खरीदना नहीं पड़ता था। अमूमन एक घड़े या सुराही में 5 से 10 लीटर के बीच पानी आता था। स्टेशनों से घड़े सुराही भी गायब हो गये।

अब है कोई हमारे बीच ऐसा समाज शास्त्री व अर्थशास्त्री जो इस बात की पड़ताल करे कि आखिर गांवों में कुम्हारों के हाथ के बने घड़े व सुराहियां बस अड्डों व रेलवे स्टेशनों से क्यों और कैसे गायब हो गयीं। मुम्बई जाने वाली रेलगाड़ियों के यात्रियों से पूछ लीजिये कि मुम्बई से लेकर वाराणसी तक में वे कितने रुपये का पानी पी जाते हैं, तो कोई बतायेगा 100 कोई 150 तो कोई 200। यानि एक यात्री को 1000 किमी0 की यात्रा पूरी करने में करीब 200 रुपये तक का पानी खरीद कर पीना पड़ रहा है। किसका पानी। हमारा पानी। इंडिया दैट इज भारत का पानी और ब्रांड  कोक का केनली व पेप्सी का एक्वाफिना। कुछ-कुछ रेल नीर भी।

भारत सहित अन्य देशों की प्रयोगशालाओं में परीक्षण से यह सिद्ध हो चुका है कि इन कंपनियों के पेयों में फास्फोरिक एसिड, कैफिन, इथाइलीन ग्लाइकाल, द्रव कार्बन डाईआक्साइड जैसे स्वास्थ्यनाशक रसायन मिेले होते हैं और ये बताते नहीं। भारत में बने पेयों में डी.डी.टी, क्लोरोपाइरीफास जैसे जहरीले कीटनाशक मिले होते हैं। ये कीटनाशक और रसायन आस्टोपोरोसिस, गुर्दे, लीवर, हृदय की बीमारियों और मोटापा पैदा करते हैं। साथ ही इनका हर प्लांट रोजाना 15-20 लाख लीटर पानी जमीन से खींच रहे हैं, जिससे आस-पास के इलाके में पानी का भयंकर संकट उत्पन्न हो रहा है, लेकिन इनके ब्रांड रेलवे स्टेशनों पर धक्काड़े के साथ बिक रहे हैं। कोक ब्रांड के केनली नाम से जो बोतलबंद पानी बाजार में उपलब्ध है, उसकी कीमत 20 रुपये है। देश के पानी का इतना बड़ा मुनाफा अमेरिका में जा रहा है, क्या यह खबर नहीं।

यदि अपने घर के बच्चे बाल्टी-लोटा लेकर 2-4 रुपये में पानी बेच रहे हैं तो इससे तो अच्छा ही है कि यह रुपया उनके ही जेब में जा रहा है। उनकी रोजी-रोटी चल रही है। फिर कोई इतना गंदा कैसे हो सकता है कि वह केवल दूषित पानी बेंचता है। आखिर उन्हें भी अपने धंधे की मर्यादा मालूम है। कम से कम सड़क छाप होटलों, ढाबों में उपलब्ध पानी से तो यह बोतलबंद पानी अच्छा ही है। एक बार इस पर गौर करके देखिये।  

लेखक राजीव चंदेल पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *