आकाशवाणी महानिदेशक ने फिर दी प्रस्‍तोताओं को बाहर करने की धमकी

आकाशवाणी के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई ने एक बार फिर दिल्ली के बेहद लोकप्रिय रेडियो चैनल ऍफ़ एम गोल्ड के प्रस्तोताओं को धमकी देते हुए कहा है कि दो महीने बाद ऍफ़एम गोल्ड चैनल का रीलॉन्च होना है, जिसके पश्चात दो महीने के अन्दर अगर उन्हें प्रस्तोताओं के प्रस्तुतीकरण में सुधार नहीं दिखता तो वे उन्हें चैनल से निकाल बाहर करेंगे. हालांकि जानकारों की राय में ऐसा संभव नहीं है मगर एक समय आकस्मिक उद्घोषक रह चुके मंडलोई महानिदेशक बनने के बाद इस तरह का व्‍यवहार कर्मचारियों को खटनके लगा है. 9 जुलाई 2012 को ऍफ़ एम गोल्ड दिल्ली के प्रस्तोताओं के साथ मीटिंग के दौरान मंडलोई ने उन्हें यह धमकी दी.

मालूम हो कि 25 नवम्बर 2011 को भी मंडलोई ने इन प्रस्तोताओं के साथ एक मीटिंग में उनकी निर्मम ढंग से स्क्रीनिंग करके छंटनी किए जाने की धमकी दी थी. इस के बाद प्रस्तोताओं ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती अम्बिका सोनी से और सचिव सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से लिखित रूप से शिकायत की थी. 25 नवम्बर की मीटिंग के बाद मंडलोई ने प्रस्तोताओं के पुनः ऑडिशन करा कर उनकी स्क्रीनिंग करने का आदेश भी निकाला था, मगर मंत्रालय में शिकायत किए जाने की वजह से वे उसे दिल्ली के ऍफ़एम गोल्ड और ऍफ़एम रेनबो चैनलों पर चाह कर भी लागू नहीं करवा पाए थे. इसके बाद मंडलोई ने देश भर में आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों पर आकस्मिक उद्घोषकों के पुनः ऑडिशन के आदेश के सर्कुलर भिजवा दिए. मगर हर राज्य में इसका जमकर विरोध हुआ और कुछ जगहों पर तो खबर है कि आकस्मिक उद्घोषकों ने आकाशवाणी के खिलाफ कानूनी कारवाई भी कर दी है.

यह ध्यान देने योग्य है कि आकाशवाणी के स्थाई उद्घोषकों और कर्मचारियों की कभी स्क्रीनिंग नहीं की जाती और ऍफ़एम चैनलों के आकस्मिक प्रस्तोताओं की भी आज तक कभी स्क्रीनिंग नहीं की गई है. कुछ तो यहाँ तक कहते हैं कि अगर स्थाई कर्मचारियों की भी स्क्रीनिंग होती रहती तो मंडलोई जी जैसे लोग कभी डी.जी. नहीं बन पाते. पिछले कुछ महीनों से ऍफ़एम गोल्ड दिल्ली के प्रस्तोता अपने पारिश्रमिक, पहचान पत्र, उनको नियमित किये जाने और उपकरणों में सुधार जैसे कई मुद्दों को लेकर आवाज़ उठा रहे हैं. और सितम्बर 2010 में एक पत्र सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती अम्बिका सोनी और सी.ई.ओ. प्रसार भारती को भी दे चुके हैं, मगर आज तक इन मुद्दों को लेकर कोई ठोस कार्रवाई आकाशवाणी द्वारा नहीं की गई है.

9 जुलाई 2012 को हुई मीटिंग में मंडलोई ने वही पुराने ढर्रे पर चलते हुए अधिकाँश समय प्रस्तोताओं को नीचा दिखाने और उनकी खिल्ली उड़ाने में बिताया और शेष समय में अपनी प्रशंसा के पुल बाँधने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने कहा कि आप गोल्ड चैनल में काम तो करते हैं मगर आप तो चांदी भी नहीं हैं. मुझे तो कम-से-कम तेईस कैरेट का सोना चाहिए. आप लोगों के कार्यक्रमों में मेहनत कहीं नज़र नहीं आती और उच्चारण बहुत दोषपूर्ण रहता है. उर्दू के शब्दों का सही उच्चारण आप लोग नहीं कर पाते. मज़े की बात यह है कि पिछली बार की तरह मंडलोई साहब के खुद के दोषपूर्ण उच्चारण में बिल्कुल भी सुधार नहीं हुआ था. वह अंग्रेजी के शब्द 'फेस' को भी 'फेश' बोल गए और "रीलॉन्च" का उच्चारण तो बार-बार "रीलांच" ही कर रहे थे, इसके अलावा वे उच्चारण संबंधी ऐसी और भी गलतियाँ कर रहे थे. मगर हाँ, बदलाव इतना ज़रूर था कि सात महीने पूर्व की मीटिंग में अमीन सायानी को अमीन शियानी बोलने वाले मंडलोई अब उन्हें अमीन शायनी जैसा कुछ बोल रहे थे.

हद तो तब हो गई जब उन्होंने प्रस्तोताओं को अच्छा कार्यक्रम करने के गुर सिखाने के दौरान उत्साह में आकर यह भी कह डाला कि मुस्लिम, ईसाई और पारसियों के त्यौहारों के दिन भला किसको याद रहते हैं. इसलिए इनको भी याद रखना चाहिए. गोया कि वे सिर्फ हिन्दू प्रस्तोताओं को ही संबोधित कर रहे हों. और उन प्रस्तोताओं की हिन्दू मानसिकता के बारे में भी वे पहले से ही आश्वस्त हों. उन प्रस्तोताओं में कुछ मुस्लिम भी बैठे थे, जिन्हें यह सुनकर न जाने कैसा लगा होगा.

मंडलोई ऍफ़एम गोल्ड पर हमेशा लाइव कार्यक्रम करने वाले प्रस्तोताओं की यदा-कदा फिसल जाने वाली ज़बान की खिल्ली तो बहुत रस ले लेकर उड़ा रहे थे, परन्तु भरी सभा में उनके जैसे ज़िम्मेदार ओहदेदार की यह चूक कितनी गंभीर थी इसका पता नहीं उन्हें कितना भान रहा. हालांकि यह सब कहने के बाद उन्होंने अपने कहे पर भूल सुधार की कुछ छिपी हुई कोशिश ज़रूर की जिससे यह अंदाजा लगा कि उनका इरादा तो धार्मिक एकता की बात करने का था. मगर मुद्दा यह है कि किसी प्रस्तोता से लाइव प्रसारण के दौरान अगर इसकी तुलना में कोई छोटी सी गलती भी हो जाती है तो उसके सिर पर सवार होने में कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती.

सोचने वाली बात तो यह है कि मंडलोई उन्हीं प्रस्तोताओं का मजाक उड़ा रहे थे जिन्हें, कड़ी चयन प्रक्रिया से प्रस्तोता चुनने का दावा करने वाली उनकी अपनी आकाशवाणी ने चुना था और फिर उन्हें प्रशिक्षित भी किया था. अंत में मंडलोई ने इन प्रस्तोताओं को धमकी देते हुए कहा कि चैनल रीलांच के दो महीने बाद मैं स्क्रीनिंग के साथ आपसे मिलूंगा, अगर आप में सुधार नज़र नहीं आया तो मुझे गोल्ड बाहर से खरीदना पड़ेगा.

प्रस्तोताओं को कुछ महीने बाद स्क्रीनिंग की धमकी देकर मंडलोई तुरंत बाहर निकल गए ताकि प्रस्तोताओं की ओर से कोई जवाब न सुनना पड़ जाए. हालांकि मंडलोई द्वारा करीब 7 महीने बाद दोबारा मिली इस धमकी को कुछ प्रस्तोता तो महज़ बन्दर घुड़की मान रहे हैं, मगर कुछ इस बात को लेकर घबराए भी हुए हैं कि कहीं सरकारी तंत्र अपनी खामियां छुपाने के लिए अपनी ताक़त का नाजायज़ इस्तेमाल करते हुए उन्हें वाकई बाहर का रास्ता न दिखा दें.

लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि प्रस्तोताओं से सात महीने बाद महानिदेशक ने यह दूसरी मीटिंग की थी जिसमें ऊटपटांग बातें करके उनका कीमती वक़्त जमकर बरबाद किया गया और उन्हें अपमानित किया गया, मगर उनकी जायज़ मांगें पूरी करने के लिए महानिदेशक ने मंत्रालय की सिफारिशों के बावजूद  ऐसा कोई एक काम नहीं किया था, जिसे वे मीटिंग में गिना कर गर्व महसूस कर सकते. मगर हास्यास्पद बात यह है कि महानिदेशक से यह सब सुनने से पहले इसी मीटिंग में प्रस्तोता अन्य अधिकारियों से इस बात की बधाई पा चुके थे कि उनका चैनल इस महीने पहले पायदान पर पहुँच चुका है. सच तो यह है कि प्रस्तोता डीजी के साथ इस मीटिंग में बड़ी आशाएं लेकर गए थे कि उन्हें कुछ अच्छी खबरें सुनने को मिलेंगी, मगर वे एक बार फिर सरकारी बाबूगीरी की इस कुटिलता का क्रूर चेहरा देख ठगा सा महसूस कर रहे थे.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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