आखिर क्यों पिटते हैं नेताजी जूते-चप्पलों से?

भारत में मंत्रियों और नेताओ को आम तौर पर फूल-मालाओ से स्वागत करते देखा जाता था, परंतु पिछले कुछ सालो से आम जनता इनका स्वागत करने के लिए फूलों पर पैसा खर्च किये बिना, अपने पैरों में पहने जूते-चप्पलों और शरीर के महत्वपूर्ण अंग हाथ का इस्तेमाल कर रही है। अब सवाल यह है कि आखिर आम जनता को जूते-चप्पलों का सहारा क्यों लेना पड़ रहा है? दरअसल भारत में नेताओं की बहुत इज्जत होती थी। पर जैसे-जैसे आम जनता ये समझने लगी की भ्रष्टाचार और बुनियादी असुविधाओ के पोषक, यही नेता जी हैं तभी से आम जनता गुस्से से लाल है और अपनी नाखुशी का इजहार करने के लिए हाथ-पैर और जूते-चप्पल चला रही है।

जनता जिस नेता पर विश्वास करके अपना प्रतिनिधि चुनती है अगर वही दगाबाज़ निकल जाये तो दुःख होगा ही। भला कौन मंत्री(कुछ अपवाद है) अपने अधिकारियों के कामों का हिसाब लेते है। फाइलें, महीनो-सालों तक एक ही दफ्तर में पड़ी रहती हैं। दिलचस्प बात ये है की जिस अधिकारी के चैम्बर में जितना अधिक फाइल जमा हो होता है वह अपने-आप को उतना ही बड़ा अधिकारी समझता है। अब विश्व विख्यात झारखण्ड को ही ले लीजिये, यहाँ के नेताओ को शर्म और जिम्मेदारी क्या होती है मालूम ही नही है। जनता के सामने एक मंत्री दूसरे मंत्री से लड़ते है अब ऐसी सरकार से जनता क्या आशा कर सकती है। सभी मंत्री अधिकारियो के साथ मिल कर लगे है राज्य लूटने में। तुम मेरी पीठ खुजलाओ मैं तेरी खुजलाता हूँ टाइप का। इसमें परेशान होती है आम जनता क्योकि खास लोगो का काम तो मिनटों में ही हो जाता है। अगर कोई अधिकारी बिना रिश्वत के कम नही करता है तो आप किसके पास शिकायत करेंगे। कमीशन बंधा हुआ है, आश्वासन मिलेगा देखता हूँ और इन्तजार करते-करते आपकी जिंदगी गुजर जाएगी। ऐसे ही नहीं दिल्ली की जनता ने भ्रष्टाचारियों को लात मार कर अपने से दूर धकेल दिया है। नेताओ के कारण जनता को होने वाली परेशानियों का सही ढंग से आंकलन किया जाय तो ये जूता-चप्पल और लात-घूसे भी कम पड़ जायेंगे।

 

लेखक हरिश्चन्द्र कुमार, पांकी(झारखण्ड) में रहते हैं। संपर्कः pintucivil1993@gmail.com 

 

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