आखिर बीजेपी और कांग्रेस केजरीवाल के ‘झाड़ू’ से क्यों डरती है?

Nadim S. Akhter : दिल्ली में मेट्रो और फ्लाईओवर गिनाकर शीला दीक्षित कब तक गुठली के भी दाम चूसती रहेंगी. आप चुनिंदा पॉश इलाकों को छोड़कर दिल्ली में कहीं भी चले जाएं, टूटी-फूटी सड़कें, ओवरफ्लो होता सीवर, जहां सीवर नहीं हैं, वहां बजबजाती नालियां और गंदगी आपका स्वागत करेंगी. कई इलाकों में तो पीने के पानी में सीवर का पानी मिलकर आता है. बदबूदार. लोग उसी से नहाते और कपड़े धोते हैं. मैंने कई जगहों पर देखा है. पुलिस-शासन आज भी वह अपने अधिकार में नहीं कर पाईं. फिर भी दावे हैं कि दिल्ली चमक रही है. भइया लुटियन्स की दिल्ली चमकती होगी, आम आदमी वाली दिल्ली तो फटेहाल है. कभी आइए, तो दिखा दूंगा. आपको भी और आपके सारे कांग्रेसी नेताओं को भी.

अब बात बीजेपी की. ऊपर मैंने 'चमकती दिल्ली' के जितने नगीने गिनाए, उसके लिए अकेली शीला दोषी नहीं है. म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन पर कब्जा जमाए बैठी बीजेपी ने भी दिल्ली का उतना ही कबाड़ा किया है. लूट-खसोट उसने भी खूब की है. भ्रष्टाचार को चार चांद लगाए हैं कॉरपोरेशन में.

सो दिल्ली में मुझे ना तो शीला दीक्षित वाली कांग्रेस से उम्मीद है और ना हर्षवर्धन वाली बीजेपी से. सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. इस बार मैंने अरविंद केजरीवाल वाली आम आदमी पार्टी से उम्मीदें लगाई हैं. तमाम चिंताओं और सीमाओं के बावजूद. कांग्रेस-बीजेपी को तो कई बार आजमा लिया. एक बार मौका AAP पार्टी को देने को बनता है. तभी पता चल पाएगा कि ये पार्टी राजनीति की दिशा बदलने के अपने वादे पर कितना खरा उतर पाती है. वरना दिल्ली को दो तरफा लड़ाई में कांग्रेस-बीजेपी दोनों की जय-जय है. अंदर से सबकी मिलीभगत है. सरकार इनमें से किसी की भी बन जाए, मलाई तो सब काटते हैं. मिलकर. AAP आएगी तो माहौल-दशा-दिशा बदलने की उम्मीद है. आजादी के 60 से ज्यादा बसंत देख चुके इस देश के वासी इतने तो मैच्योर हैं ही कि वो Alternative की अहमियत समझते हैं. Monopoly के खतरे जानते हैं.

आज AAP alternative बनके सामने आया है. हर खास और आम को इसे समझना होगा. और अगर दांव सही लगा तो हो सकता है कि AAP की राजनीति पूरे देश में राजनीति करने का ढंग ही बदल दे. कई नुक्स निकाल सकते हैं आप AAP में और अरविदं में लेकिन ये शुरुआत है. दिल्ली में मैंने कई लोगों, चाय वालों-रिक्शे वालों-दुकानदारों-मुहल्लेवालों-किराना वालों से पूछा है कि भइया, अरविंद केजरीवाल वाली AAP पार्टी को जानते हो? सबने बताया कि हां, अच्छे से जानते हैं. ये लोग ठीक लगते हैं. बाकी सब तो बेईमान हैं (कुछ ने तो मां-बहन की गाली का भी प्रयोग किया). नए-नए मीडिया सरकार वाले सीडी कांड के बाद भी लोगों का फीडबैक लिया. कुछ को तो पता ही नहीं था इसके बारे में और जिनको पता था, वो कह रहे थे कि समझ नहीं आया पूरा मामला. सब अरविंद को फंसावे ला है. वो भ्रष्टाचार हटाने को कहता है ना, इसलिए…

तो दोस्तों. जनता का फीडबैक जबरदस्त है. अरविंद को दिल्ली में सब पसंद कर रहे हैं. इलीट से लेकर मिडिल क्लास और दिहाड़ी करने वाले मजदूर तक. ये अलग बात है कि उनकी ये पसंद वोट में तब्दील होगी या नहीं. AAP दिल्ली में इतिहास भी रच सकती है और नहीं भी. बहुत कुछ पोलिंग वाले दिन बूथ मैनेजमेंट पर भी डिपेंड करेगा. लेकिन मुझे लग रहा है कि पब्लिक का जबरदस्त सपोर्ट AAP को है. एक और मजेदार बात. अन्ना हजारे लाख मना करें लेकिन आम आदमी आज भी अरविंद और उनकी पार्टी को अन्ना हजारे से ही जोड़कर देखते हैं. एक रिक्शे वाले ने तो गजब कहा. नाम वो दोनों में से किसी का नहीं जानता था लेकिन मेरे पूछने पर बोला- हां वो टोपी वाला बूढ़ा बाबा और चश्मा-मूंछ वाला आदमी ना. जानते हैं. अच्छा आदमी है सब…

तो 'आम आदमी पार्टी' को लेकर दिल्ली का आम आदमी अच्छी राय रखता है. अंदरखाने बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियां ये बात जानती हैं, सो दोनों बेहद डरी हुई हैं. उनकी वोट की तिजोरी पर डाका पड़ने वाला है. कौन जाने अरविंद केजरीवाल वो कर जाएं तो जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के बाद बी नहीं हो पाया इस देश में. बाकी सब मोहमाया है. जय हो.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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