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सुख-दुख...

आखिर, मीडिया पर केजरीवाल को गुस्सा क्यों आता है!

राजनीतिक व्यवस्था की गंदगी अपनी ‘झाड़ू’ से साफ करने निकले हैं, अरविंद केजरीवाल। एक-डेढ़ महीने पहले तक वे मीडिया के ‘नायक’ हुआ करते थे। एक ऐसा नायक, जो अपनी अन्ना टोपी और झाड़ू से भ्रष्टाचारी व्यवस्था को बदल डालना चाहता है। इस पुण्य कार्य के लिए नायक ने अपना पहला राजनीतिक प्रयोग राष्ट्रीय राजधानी से ही शुरू किया था। विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ यह प्रयोग राष्ट्रीय चर्चा में रहा है। चुनाव में केजरीवाल ने पहले झटके में ही कांग्रेस को सियासी धूल चटा दी थी।

राजनीतिक व्यवस्था की गंदगी अपनी ‘झाड़ू’ से साफ करने निकले हैं, अरविंद केजरीवाल। एक-डेढ़ महीने पहले तक वे मीडिया के ‘नायक’ हुआ करते थे। एक ऐसा नायक, जो अपनी अन्ना टोपी और झाड़ू से भ्रष्टाचारी व्यवस्था को बदल डालना चाहता है। इस पुण्य कार्य के लिए नायक ने अपना पहला राजनीतिक प्रयोग राष्ट्रीय राजधानी से ही शुरू किया था। विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ यह प्रयोग राष्ट्रीय चर्चा में रहा है। चुनाव में केजरीवाल ने पहले झटके में ही कांग्रेस को सियासी धूल चटा दी थी।

अपने राजनीतिक प्रयोग का इतना खौफ पैदा किया कि कांग्रेस आलाकमान तक हिलने लगा था। कांग्रेस के चुनावी चेहरे राहुल गांधी ने अपने सिपहसालारों को नसीहत देनी शुरू की थी कि आम जनता से जुड़ाव की राजनीति टीम केजरीवाल से सीखो। वरना, देर हो जाएगी। पहले ही सफल प्रयोग के बाद ‘आप’ नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं जोर मारने लगीं। इस पार्टी ने यह सपना बेचना शुरू किया कि लोकसभा चुनाव के जरिए वे लोग दिल्ली का प्रयोग देश के स्तर पर कर डालेंगे। तभी बड़े बदलाव का ढांचा तैयार होगा। इसी रफ्तार के चक्कर में ही पार्टी का नेतृत्व लगातार विवादों के केंद्र में आया है। जब मीडिया ने इनकी कथनी-करनी का पोस्टमार्टम करना शुरू किया, तो टीम केजरीवाल को गुस्सा आने लगा है। इतना गुस्सा कि वो अब ‘बिके’ हुए मीडिया वालों को जेल भिजवाने का अपना एजेंडा भी बताने लगे हैं।

यूं तो केजरीवाल की खास राजनीतिक पूंजी उनकी विनम्रता मानी जाती है। मीडिया के साथ उनका खास दोस्ताना व्यवहार रहा है। इसी के बलबूते उन्हें बगैर ज्यादा खर्च के सालों तक जमकर प्रचार मिला है। कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों की कसक यही रही है कि मीडिया ने ही केजरीवाल को ‘राजनीतिक बुलडोजर’ बना दिया है। जो कि पूरी सियासी व्यवस्था को सड़ी-गली बताकर रौंदने पर अमादा है। शुरुआती दौर में ये दोनों पार्टियां टीम केजरीवाल पर तरह-तरह से उंगलियां उठाती आई हैं। अन्ना आंदोलन के दौर में जब केजरीवाल अन्ना हजारे के सिपहसालार के रूप में काम कर रहे थे, तो आरोप लगता था कि संघ परिवार उनकी मदद कर रहा है। ताकि, कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की राजनीतिक साख को चौपट कर दिया जाए। यूं तो यह एक जमीनी सच्चाई भी रही है कि भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना के आंदोलनों में संघ परिवार के कार्यकर्ता समर्थन के लिए जुटते रहे हैं।

लेकिन, जब अन्ना ने भ्रष्टाचारी राजनीतिक व्यवस्था के मामले में भाजपा पर भी निशाना साधना शुरू किया, तो संघ परिवार के स्वयंसेवक इससे अलग होते गए। सड़क से संसद तक भाजपा ने भी अन्ना आंदोलन के तौर-तरीकों को अराजक करार करना शुरू किया था। यह आरोप भी लगाया था कि इस आंदोलन में ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्व शामिल हो गए हैं, जो कि भाजपा के खिलाफ भी माहौल बनाने में जुट गए हैं। विधानसभा चुनाव के दौरान जब टीम केजरीवाल ने कांग्रेस और भाजपा को सांपनाथ और नागनाथ करार करना शुरू किया, तो भाजपा वालों ने भी ‘आप’ के खिलाफ जुबानी जंग शुरू की। राजनीतिक दल बनाने के सवाल पर अन्ना हजारे पहले ही टीम केजरीवाल से अलग हो चुके थे। ऐसे में, भाजपा नेताओं को केजरीवाल पर उंगली उठाने में ज्यादा दिक्कत भी नहीं हुई। उन्होंने कहना शुरू किया कि टीम केजरीवाल कांग्रेस की ही ‘बी’ टीम है। जबकि, ‘आप’ के नेता यही कहते रहे कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की नीतियों में ज्यादा फर्क नहीं है। दोनों भ्रष्टाचारी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ही काम कर रहे हैं।

केजरीवाल, कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे। लेकिन, 49 दिनों में ही उन्होंने सत्ता सिंहासन छोड़ दिया। यही कहा कि भाजपा-कांग्रेस दोनों को   उनकी पार्टी की राजनीति से खौफ हो गया है। ऐसे में, ये दोनों दल मिलकर उनकी सरकार को बड़े फैसले नहीं लेने दे रहे। ऐसे में, इस्तीफे का ही विकल्प उन्होंने ठीक समझा। मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बाद केजरीवाल लोकसभा की चुनावी मुहिम में डट गए हैं। उनकी कोशिश है कि दिल्ली विधानसभा की तरह ही वे पूरे देश में अपना राजनीतिक ‘चमत्कार’ दिखा दें। उनकी पार्टी बगैर मजबूत सांगठनिक ढांचे के करीब 350 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी है। करीब 200 उम्मीदवारों के नाम का चयन भी हो चुका है। शुरुआती दौर में भाजपा के रणनीतिकार यही मान रहे थे कि टीम केजरीवाल की सक्रियता से कांग्रेस को ही ज्यादा नुकसान होगा। लेकिन, इधर केजरीवाल ने अपने खास निशाने पर मोदी की राजनीति को रखा है। उन्होंने कहना शुरू कर दिया है कि भ्रष्टाचार से भी बड़ी घातक समस्या सांप्रदायिकता की राजनीति है।

जाहिर है केजरीवाल का यह बदला राजनीतिक पैंतरा भाजपा रणनीतिकारों को ज्यादा खतरनाक लग रहा है। अब तो केजरीवाल ने सीधे नरेंद्र मोदी पर राजनीतिक हमले तेज किए हैं। मोदी ही भाजपा के स्टार प्रचारक हैं। वे देशभर में घूम-घूमकर कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हुंकार भर रहे हैं। इस आक्रामक चुनावी अभियान का लाभ भी मिलता दिखाई पड़ रहा है। मीडिया का एक हिस्सा मोदी-मुहिम को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साहित हो गया है। चुनाव के काफी पहले से मीडिया सर्वेक्षणों का सिलसिला चलता आ रहा है। इनमें बताया जा रहा है कि कैसे मोदी मुहिम के मुकाबले कांग्रेस फिसड्डी बनती जा रही है। टीवी न्यूज चैनलों में आम तौर पर मोदी की रैलियों का ‘लाइव कवरेज’ हो रहा है। जबकि, कांग्रेस के चुनावी चेहरे राहुल को ज्यादा तवज्जो नहीं मिल पा रही है। इसकी कसक कई दिग्गज केंद्रीय मंत्री भी जता चुके हैं। सलमान खुर्शीद जैसे मंत्री तो खुलकर कह चुके हैं कि मीडिया का बड़ा हिस्सा मोदी मुहिम को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह से लेकर लालू यादव जैसे स्वनाम धन्य नेता तो यह भी कह रहे हैं कि मोदी की लहर मीडिया में ही चल रही है, जमीन पर नहीं।

पिछले दिनों केजरीवाल, मोदी के राजनीतिक गढ़ गुजरात में पहुंचे थे। यहां के कई शहरों में उन्होंने दौरा किया। कई जगह मोदी समर्थकों से उनकी मुठभेड़ भी हुई। लेकिन, कहीं भी केजरीवाल दबाव में नहीं आए। वे लगातार मोदी के खिलाफ जुबानी जंग लड़ते रहे। उन्होंने गुजरात से लौटकर यही दावा किया कि मोदी के कार्यकाल में गुजरात विकास मॉडल का जो दावा किया जा रहा है, उसमें दम नहीं है। क्योंकि, हकीकत यही है कि मोदी के राज में यहां के कुछ औद्योगिक घराने ही फले-फूले हैं। जबकि, आम आदमी के जीवन में कोई बेहतरी नहीं आई।

गुजरात दौरे के बाद टीम केजरीवाल ने मोदी मुहिम के खिलाफ ज्यादा तीखे तेवर किए, तो संघ परिवार ने एकजुट होकर ‘आप’ के खिलाफ जंग शुरू कर दी है। इस बीच कई तरह के विवादों में केजरीवाल और उनके कई नेता फंसे हैं। जब मीडिया ने ‘आप’ नेताओं की जमकर खबर लेनी शुरू की, तो इन्हें भी गुस्सा आने लगा। केजरीवाल, संजय सिंह, गोपाल राय, आशुतोष व मनीष सिसौदिया जैसे प्रमुख नेताओं ने आर-पार के तेवर दिखाने शुरू किए। यह कहना शुरू किया कि कैसे मोदी की राजनीति प्रवृत्तियां तानाशाही वाली हैं? उन्होंने किस तरह से पिछले सालों में अपने हथकंडों से तमाम राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को ध्वस्त किया है? कुछ को तो सदा के लिए मौत की नींद सुला दिया गया। जाहिर है इन आरोपों से मोदी के सिपहसालारों को ही नहीं, संघ परिवार के पूरे कुनबे को नाराजगी हुई है।

केजरीवाल तीन दिन के दौरे पर महाराष्ट्र गए थे। कल ही उनका दौरा पूरा हुआ है। पहले दिन वे मुंबई पहुंचे थे। यहां पर उन्होंने ‘लोकल’ ट्रेन में सवारी की थी। ताकि, आम आदमी से संवाद कायम कर सकें। लेकिन, एक रेलवे स्टेशन पर काफी हंगामा हुआ था। समर्थकों और विरोधियों के बीच हाथापाई की नौबत आई थी, तो कुछ तोड़-फोड़ भी हो गई। कांग्रेस और भाजपा ने इस फसाद का आरोप टीम केजरीवाल पर लगाया, तो केजरीवाल ने कह दिया कि मीडिया का एक हिस्सा ही छोटी-छोटी बातों को ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है। उन्होंने इशारों-इशारों में कह दिया था कि मोदी परस्त मीडिया उन्हें बदनाम करने में जुटा है।

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दौरे के दूसरे दिन वे नागपुर पहुंचे थे। यहां पर एक सितारा होटल में फंड जुटाऊ रात्रिभोज का आयोजन किया गया था। इसमें प्रति व्यक्ति 10 हजार रुपए का शुल्क रखा गया। ताकि, पार्टी के लिए पैसा इकट्ठा हो सके। इस रात्रिभोज में 130 उद्यमी जमात के मेहमान पहुंचे थे। लेकिन, इन मेहमानों के बीच 10 हजार रुपए वाला कूपन खरीदकर कुछ मीडिया वाले भी पहुंच गए। इन लोगों ने वह भाषण रिकॉर्ड कर लिया, जिसकी हुंकार केजरीवाल ने भरी थी। उन्होंने कहा कि सभी मीडिया वाले मोदी के पक्ष में हवा बनाने के लिए लग गए हैं। इनमें तमाम बिक गए हैं। इन्हें बड़ी रकम देकर खरीदा गया है। यदि वे सत्ता में आए, तो इस गोरखधंधे की जांच कराएंगे। जो लोग इसमें जुटे हैं, उन्हें जेल भेजा जाएगा। इसमें मीडिया वाले भी जेल जाएंगे।

शुक्रवार को जब केजरीवाल से इस बयान के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने यही कहा कि वे मीडिया वालों को जेल भिजवाने की बात कैसे कर सकते हैं? मीडिया  में उनके तमाम दोस्त हैं। भले, केजरीवाल ने अपने तीखे बयान पर सफाई दी हो, लेकिन उनकी पार्टी के नेता आक्रामक मुद्रा में ही दिखे। पार्टी प्रवक्ता संजय सिंह ने कह दिया है कि मीडिया का बड़ा हिस्सा पेड न्यूज की तरह मोदी से जुड़ी खबरें चला रहा है, यह हकीकत है। गुजरात के विकास के बारे में भी बगैर किसी छानबीन के खबरें चलाई जा रही हैं। जबकि, हकीकत यह है कि मोदी के गुजरात में पिछले एक दशक में 800 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली है। इस तरह की जमीनी सच्चाइयों को नहीं बताया जा रहा। अडानी जैसे औद्योगिक घराने को बेहद सस्ती दरों पर लाखों एकड़ जमीन दे दी गई है। लेकिन, इस पर मीडिया सवाल नहीं उठाता।

इस बीच मीडिया को जेल भेजने वाली टिप्पणी का मामला तूल पकड़ गया है। टीवी न्यूज चैनलों की एसोसिएशन ने काफी नाराजगी जाहिर की है। ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के महासचिव एन के सिंह ने कहा है कि केजरीवाल की टिप्पणी सर्वथा निंदनीय है। जब पूरा मीडिया, टीम केजरीवाल की राजनीति का महिमा मंडन कर रही थी, तब तो उन्हें सब अच्छा लग रहा था। क्या, वे बताएंगे कि उस समय उन्होंने मीडिया को कितने में  खरीदा था? मीडिया संगठनों के साथ ही भाजपा और कांग्रेस जैसे दलों ने भी टीम केजरीवाल के खिलाफ घेरेबंदी तेज कर दी है। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष डॉ. हर्षवर्धन ने तो कहा है कि वे केजरीवाल की टिप्पणी के खिलाफ राष्ट्रपति और चुनाव आयुक्त को भी चिट्ठी लिखने जा रहे हैं। चेन्नई में तो कल पत्रकारों ने केजरीवाल की विवादित टिप्पणी पर प्रदर्शन भी किया है। मीडिया की इतनी नाराजगी के बावजूद टीम केजरीवाल के तेवर नरम नहीं पड़े।

पार्टी प्रवक्ता गोपाल राय कहते हैं कि भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था की लॉबी मजबूत है। इसके अस्तित्व पर ‘आप’ ने निर्णायक हमला शुरू किया है, तो इस भ्रष्ट व्यवस्था का पूरा तंत्र हमारे खिलाफ खड़ा हो रहा है। हमें डर नहीं है, क्योंकि देर-सवेर देश का आम आदमी जरूर समझेगा कि हम राजनीतिक शुचिता के लिए जूझ रहे हैं। ईमानदारी की जंग में बहुत कुछ झेलना पड़ता है। ऐसे में, हमें मीडिया के उस हिस्से से डर नहीं लग रहा, जो कि खास कारणों से हमारी नीयत पर सवाल खड़ा कर रहा है। क्योंकि, हमें पता है कि इनका ईमान तो पहले ही बिक चुका है। वे बिकाऊ हैं, लेकिन हम टिकाऊ हैं। यही हममें और उनमें फर्क है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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