आज़ादी के लिए आइए आज पिंजरों में क़ैद होते हैं…

: असीम का नया कैम्पेन : असीम और उनके साथी एक बार फिर सरकारी सेंसरशिप के खिलाफ जुटने वाले हैं और इस बार जंतर मंतर पर…क्या कहा आप असीम को नहीं जानते, हद कर दी आपने। असीम कार्टूनिस्ट हैं और पिछले साढ़े तीन महीने से कानपुर से अपना घर और काम छोड़ कर दिल्ली समेत हिंदुस्मेंतान भर में वेब मीडिया पर सरकार की सेंसरशिप का विरोध करने के एजेंडे के साथ कभी राजघाट…कभी इंडिया गेट…तो कभी बेंगलुरु के वृंदावन गार्डेन्स पर दिखते हैं। कभी गांधी की समाधि पर भजन गाते और कार्टून बनाते हैं, कभी राजघाट पर बाहर कर दिए जाते हैं, तो पुलिस के घेरे में ही ही कपिल सिब्बल को मूर्ख दिवस की शुभकामनाएं देते हैं…कभी इंडिया गेट पर कार्टून्स का अम्बार लगा देते हैं और इस बार असीम और उनके साथी आलोक जंतर मंतर पर अब तक का सबसे अनोखा विरोध प्रदर्शन करने वाले हैं। असीम हमारे लिए कुछ पिंजरे लाए हैं, जो हमारी आज़ादी के लिए रास्ता खोजेंगे।

जी हां पिंजरे, 22 अप्रैल को जंतर मंतर पर कुछ पिंजरे रखे जाएंगे और उसमें हम बारी बारी से बैठेंगे, कवि उसमें बैठ विप्लव की कविताएं लिखेंगे…पत्रकार तंत्र के खिलाफ ख़बरें और लेख, गायक जनगीत गाकर माहौल गुंजाएंगे, वकील अभिव्यक्ति की आज़ादी की दलीलें देंगे…वक्ता भाषण देंगे और ये सब पिंजरों के भीतर से ही होगा। पिंजरा जो प्रतीक है, सरकार की उस सेंसरशिप का जो हम सब पर थोपी जा रही है, तो हम इससे साफ इनकार करते हैं। पिंजरा, जो उपमान है सत्ता की उस हनक का जिसमें वो अवाम को कीड़ा मानकर कुचल कर खत्म कर देना चाहती है तो हम टिड्डी दल बन कर आसमान पर छाने वाले हैं। पिंजरा जो बिम्ब है उस ताकत के गुरूर का जिसे हर हाल में खल्क ए खुदा तोड़ कर ही दम लेगी। हम सबके चारों ओर हमारी निरंकुश, भ्रष्ट, अहंकारी और तानाशाह सत्ताओं ने राज्यों से देश तक जिस तरह का एक पिंजरा कायम करने का अभियान चला रखा है, हम उस कैद में आने से इनकार करते हैं और इस तथाकथित लोकतंत्र की कैद से निकलने के लिए हम 22 अप्रैल को सुबह 11 बजे से जंतर मंतर पर पिंजरों में बैठने जा रहे हैं।

हम क्या करेंगे…हम पिंजरों के भीतर से आज़ादी की लड़ाई लड़ेंगे…मुल्क की नहीं, राष्ट्रवाद की नहीं बल्कि आवाज़ की आज़ादी की लड़ाई, अवाम की आज़ादी की लड़ाई। हम सत्ता के खिलाफ, सेंसरशिप के खिलाफ गीत गाएंगे, छीन के दिखाओ हमारे ऊंचे सुर…कविताएं लिखेंगे, तोड़ दो कलम हमारी…नारे उछालेंगे, खामोश करो हमारी आवाज़ें…भाषण देंगे, कुचलो हमारे विचारों को…कार्टून बनाएंगे, तुम्हारे अंदर के शैतान की तस्वीर बनाएंगे कागज़ पर…हम चुनौती देंगे उस सत्ता को, जिसे हम चुनते हैं और इसीलिए हम तय करेंगे कि उसका हश्र क्या होगा। आप हमारे मुस्तबिल को संवारने के लिए उस गोल मकान में बैठे हैं, न कि हमारे मुस्तबिल को तय करने के लिए, ये काम हम खुद कर सकते हैं और इसीलिए अब हम आभासी पिंजरों की कैद से बाहर आने को तैयार हैं, भौतिक पिंजरों के अंदर जा कर ये काम होगा।

सवाल ये कि प्रतीकों से क्या होगा, क्या पिंजरा प्रतीक बना कर ही लड़ाई पूरी होगी, यकीनन लड़ाई इससे पूरी नहीं होगी। लेकिन सनद रहे कि पहले गदर का प्रतीक थे रोटी और कमल का फूल…बाद में प्रतीक चरखा हो गया…आज़ाद और भगत सिंह भी तो प्रतीक ही हैं…गांधी से ग्वेरा तक सब प्रतीक हैं और प्रतीक सत्ता को याद दिलाते हैं कि जनता उनको ताकत देती है, तो कमज़ोर भी कर सकती है। हम खून हैं, याद रहे जब तक जिस्म के अंदर बहेंगे तुम शक्तिशाली रहोगे, एक बार जो बाहर बह आए…तो जीवन की रक्षा मुश्किल हो जाएगी। और अब हम उबाल लेने के मूड में हैं, पिंजरे के अंदर से बाहर आने को तैयार हैं, जंतर मंतर पर आइए…पिंजरों में बैठिए और अनुभव करिए कि इन पिंजरों में बैठना…सरकारी सेंसरशिप के पिंजरों में बैठने से कहीं ज़्यादा सुखदायी अनुभव है। दोस्तों ज़रा सोच के देखिए ये कितना बड़ा हमला है आप पर और हम पर…हमारी आज़ादी पर…हमारी निजता पर…और हमारी सम्प्रभुता पर। जब देश सम्प्रभु होता है, तो नागरिक क्यों नहीं…मुख्यधारा का मीडिया चुप है, बड़े पत्रकार और एक्टिविस्ट भी दबाव में हैं…क्या हम भी चुप रहेंगे? क्या कहते हैं आप…आइए साथ असीम खुद भी अपने कार्टूनों पर न केवल सेंसरशिप झेल रहे हैं बल्कि राष्ट्रद्रोह का अनर्गल मुकदमा भी झेल रहे हैं। क्या सत्ता के खिलाफ होना राष्ट्रद्रोह है, तो हां हम सब राष्ट्रद्रोही हैं…हमें पकड़ो और कैद कर दो पिंजरों में…आज़ादी के नाम पर कैद हमें गवारा नहीं…

फेसबुक पर हम खुल कर लिखेंगे…हम ट्वीट करेंगे कि तुम्हारा तंत्र घुना हुआ है, तुम्हारा निजाम निकम्मा है, तुम्हारी सरकारें सड़ रही हैं…हम ब्लॉग्स पर नई आज़ादी की बस्तियां बसाएंगे…आओ और हिम्मत है तो वहां आकर उजाड़ो हमको…हमको मारोगे हम फिर पैदा होंगे…हमको उखाड़ोगे, हम फिर उग आएंगे… तो क्या हम सब 22 अप्रैल को इस सांकेतिक विरोध प्रदर्शन में असीम के साथ आ रहे हैं…मेरी अपील है इस लेख को पढ़ रहे सभी साथियों से…कवियों से…लेखकों से…वकीलों से…वक्ताओं से…पत्रकारों से…गायकों से…संगीतकारों से…पेंटरों से…कार्टूनिस्टों से…ब्लॉगरों से…महिलाओं से…पुरुषों से…बुज़ुर्गों से…कि असीम के इस कैम्पेन को उनसे छीन लें…क्योंकि ये हम सबकी लड़ाई है, आप कैसे किसी को अपनी लड़ाई अकेले लड़ने दे सकते हैं? क्या हमें आने वाली पीढ़ी के सवालों का डर नहीं है…22 अप्रैल को सुबह 11 बजे से शाम 6 बजे तक हमें आपका इंतज़ार रहेगा…सनद रहे, ये सवाल आज़ादी का नहीं सम्मान से ज़िंदा रहने का है…दरअसल ज़िंदा रहने का है…

क्या हुआ ग़र है नहीं, शमशीर अपने हाथ में
हम कलम से ही करेंगे, क़ातिलों के सिर क़लम

लेखक मयंक सक्सेना टीवी जर्नलिस्ट हैं.

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