आजाद देश की गुलाम ग्रामीण पत्रकारिता

भारत देश को आजाद हुए 66 वर्ष गुजर गए। ग्रामीण पत्रकारिता जहां की तहां पर है। क्या विकास और इसमें बदलाव हुए मुझे नहीं पता ? ग्रामीण पत्रकारों की शोषण गाथा इतनी घटिया दर्जे की है कि सुनकर विश्वास नहीं होता। जो गिरावट भरा नजारा आंखों के सामने देखा है। वह पत्रकारिता की रीति और नीति के बिल्कुल उल्टा सा नजर आ रहा है। ग्रामीण पत्रकार की स्थिति एक गुलाम से भी बद्तर है। अखबार के संपादक और मालिक बहुत बड़े शहनशाह। जो अपनों के लिए सुविधाएं जुटाने तो दूर अपना बताने में भी परहेज करते हैं।

साथियों ! आखिरकार कब तक आजाद देश में गुलाम रहोगे ? कब तक यह अखबार के मालिक और उनके चमचे संपादक बेगार कराते रहेगें ? इस गुलामी को करते-करते एक पीढ़ी रिटायर हो गई। वर्तमान में ग्रामीण पत्रकारों की पीढ़ी खामोश है। ग्रामीण पत्रकारों के बने संगठन पदाधिकारियों को सिर्फ फूल-माला पहनाने के लिए बने हुए हैं। संगठन के कर्ता-धर्ता पद बांटकर पदाधिकारियों से वसूली कर आमजन में भौकाल शासन-प्रशासन में लम्बी पहुंच बनाकर नाम और दाम पाकर जल्वा कर रहे हैं। एक साधारण ग्रामीण पत्रकार वरिष्ठ पत्रकारों के बोल सुनने को तरसता है। संपादक के दर्शन दुर्लभ होते। अखबार के मालिक के बारे में जानना पूंछना तो किसी जुर्म से कम नहीं।

किसी ग्रामीण पत्रकार ने अगर अखबार को ग्रामीण पत्रकारिता में आ रही कठिनाइयों और अपनी जरूरी जायज मांगने का साहस किया तो उसकी सजा फिर वह पत्रकार के रूप में नहीं एक बहुत बड़े डिफाल्टर की हैसियत से भुगतता है। यह बात अखबार के मालिक तक पहुंचती नहीं संपादक अपने स्तर से देखता है। अगर उसे लगा कि जायज मांगे अगर ओपेन हो गईं। तो नौकरी पर भी खतरा आ सकता है। उसे तत्काल अखबार का गमन करने और पत्रकार को धमकाने का आरोप लगाकर बाहर का रास्ता दिया दिया जाता है।

यह भी जान लें कि ग्रामीण पत्रकार जो अखबार के लिए समाचार कवरेज करने में रात-दिन की परवाह नहीं करते उनके पास पहचान के लिए परिचय पत्र तक जारी नहीं होता। समाचार कवरेज करने, लिखने और भेजने का कोई खर्च मानदेय नहीं दिया जाता। समाचार छूटने पर समाचार प्रभारी ऊँची आवाज में सिर्फ चिल्लाता ही नहीं गाली गलौज कर मानसिक उत्पीड़न करता है। विज्ञापन और प्रसार का टारगेट न पूरा करने वाला कितना विद्वान पत्रकार हो उसको पत्रकारिता में जलालत झेलनी पड़ती है।

क्या यह सब गुलामी की श्रेणी में नहीं आता तो फिर तानाशाही होगी। आपकी इच्छा ना हो आपसे किसी भी समय जबरिया काम कराया जाए। काम कराने के बाद उसका मेहनताना ना दिया जाए। इस बात को भी ना स्वीकारा जाए कि आप हमारे हो। अरे इस कदर से गुलाम है यह ग्रामीण पत्रकारिता थू…..थू……थू ।

हाँ ग्रामीण पत्रकारिता से जुडे़ लोग बेखौफ हैं.  आप को एक बात और बताते दें कि ग्रामीण पत्रकारिता करने वाले अधिकांश लोगों के दामन साफ नहीं होते यही वजह कि अपना अवैध कारोबार चलाने, अपराधी होते हुए भी पुलिस से बचने के लिए ग्रामीण पत्रकारिता को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोगों के लिए पत्रकार होने का नाम ही काफी है। बाकी तो सब धकाधक चलता रहता है।

लेखक सुधीर अवस्थी 'परदेशी' हरदोई जिले में ग्रामीण पत्रकारिता करते हैं।

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