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‘आज’ के बिहार संस्करण की दशा-दुर्दशा पर एक कथा

पटना (बिहार)। प्रकाशन के 93वें वर्श (शताब्दी दशक) में चल रहे देश के प्रतिश्ठित हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘आज’ के बिहार संस्करण की स्थिति काफी बदहाल हो गई है। पटना यूनिट की बदहाली पर प्रबंधन द्वारा कोई ध्यान नहीं देने से बिहार का सबसे पुराना और विश्वासनीय अखबार अब अंतिम सांसे गिन रहा है। बिहार में दैनिक भास्कर की तेज हो रही दस्तक को देखकर लगता है कि भास्कर ग्रुप के बिहार में आगाज होने के बाद ‘लड़खड़ा’ कर चल रहे ‘आज’ की स्थिति और भी दयनीय हो सकती है।

पटना (बिहार)। प्रकाशन के 93वें वर्श (शताब्दी दशक) में चल रहे देश के प्रतिश्ठित हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘आज’ के बिहार संस्करण की स्थिति काफी बदहाल हो गई है। पटना यूनिट की बदहाली पर प्रबंधन द्वारा कोई ध्यान नहीं देने से बिहार का सबसे पुराना और विश्वासनीय अखबार अब अंतिम सांसे गिन रहा है। बिहार में दैनिक भास्कर की तेज हो रही दस्तक को देखकर लगता है कि भास्कर ग्रुप के बिहार में आगाज होने के बाद ‘लड़खड़ा’ कर चल रहे ‘आज’ की स्थिति और भी दयनीय हो सकती है।

लेकिन खबरों की विश्वासनीयता के मामले में ‘आज’ अभी भी सबों पर भारी पड़ रहा है। ‘आज’ के साधारण और निर्विवाद शैली के कारण अभी भी बिहार के जागरूक एवं सजग पाठक अन्य अखबारों की तुलना में ‘आज’ को अधिक सम्मान की नजर से देखते हैं। लेकिन पटना यूनिट के साथ प्रबंधन द्वारा बरता जा रहा उपेक्षात्मक रवैया के चलते आनेवाले दिनों में ‘आज’ अखबार कभी भी दम तोड़ सकता है।

बिहार के नंबर 1, 2, 3 स्थानों पर काबिज मीडिया हाउस में जितने भी वरिष्ठ एवं नामचीन पत्रकार हैं उन सबों को पहचान एवं प्रसिद्धि ‘आज’ के माध्यम से ही मिली है। ‘आज’ ने उन्हें मौका देकर उनके हुनर को तराशा-संवारा और नामचीन बनाया है। लेकिन कहते हैं ‘चिराग तले अंधेरा’! कुछ इसी तरह ‘आज’ के साथ भी हो रहा है। विज्ञापन प्रकाशन के मामले में ‘आज’ बिहार का सबसे उदार समाचार-पत्र है। अन्य अखबार जहां सरकारी विज्ञापन तक में नगद भुगतान की शर्त रखते हैं वहीं ‘आज’ सरकार विज्ञापन प्रकाशन में राज्य सरकार पर विश्वास बरतने और सहयोग प्रदान करने में अव्वल स्थान पर है। यहां ‘सरकार एवं आज प्रबंधन’ दोनों एक दूसरे की नजर में विश्वासनीय बने हैं।

विज्ञापनों से लबालब रहने वाले ‘आज’ के पटना यूनिट से जो भी लोग जुड़े हैं वो एक तरह से समय व्यतीत कर रहे हैं। दूसरे नजरिये से देखें तो उन्हें यहां काम छोड़ने के बाद अन्य मीडिया हाउस में स्थान नहीं मिलेगा (बुर्जुग हो जाने की वजह से)। मतलब की यहां कार्यरत अधिकांश लोग रिटायरमेंट की अवस्था वाले हैं और पुराने और पारंपरिक तरीके से किसी तरह बिहार में ‘आज’ के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए संघर्श कर रहे हैं। ये तो हुई संपादकीय टीम की असलियत, अब एक नजर डालते हैं जिला स्तरीय कार्यालय एवं उससे निचले स्तर पर आज के लिए काम करे पत्रकारों की टीम पर। ‘आज’ की राज्य के विभिन्न जिलों में जो रिपोर्टरों की टीम है वह अन्य किसी भी अखबार से ज्यादा अनुभवी एवं चुस्त-दुरूस्त है लेकिन हालात ऐसे बन गये हैं कि वे सभी सिर्फ पत्रकारिता के पेशे में रूचि रखने के कारण ही ‘आज’ की निःस्वार्थ सेवा कर रहे हैं।

प्रबंधन की उदासीनता के कारण ऐसे पत्रकारों को समाचार प्रेशण तक का खर्च भी नहीं मिल पा रहा है। कुछ जिलों में कुछ खास (लम्बे समय से जुड़े) पत्रकारों को अगर संवाद-प्रेशण का खर्च दिया भी जाता है तो उसकी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। संक्षेप में अगर सटीक बात कही जाय तो प्रबंधन की नीयत यहां ठीक नहीं है क्योंकि कुछ जिलों में कुछ पत्रकारों को साल में यदा-कदा संवाद प्रेशण खर्च के नाम पर कुछ दे दिया जाता है लेकिन बहुसंख्य पत्रकारों को अपनी जेब कटाकर ‘आज’ अखबार को सींचना पड़ रहा है। इसके अलावे ‘आज‘ की प्रिन्टिंग यूनिट में लगे मशीन एवं उपकरणों की जर्जरता भी इस अखबार की बदहाली का मुख्य कारण है। एक ओर जहां बिहार में विभिन्न मीडिया हाउस आधुनिकतम प्रिन्टिंग मशीन लगाकर पाठकों को आकर्शक साज-सज्जा के साथ अखबार प्रस्तुत कर रहे हैं वहीं आज की घिसी-पिटी छपाई के कारण नये जमाने के पाठक (युवा वर्ग) उसे तरजीह नहीं दे रहे हैं। जबकि सर्कुलेशन नेटवर्क के मामले में आज की पहुंच बिहार के गांव-कस्बों तक मजबूती से है।

यहां आज प्रबंधन को बता देना चाहूंगा कि अगर उनकी मंशा बिहार में टिके रहकर अखबारी प्रतिस्पर्द्धा की मुख्यधारा में शामिल होना है तो इसके लिए उन्हें बहुत ज्यादा करने की जरूरत नहीं है। उनके मन में अगर बिहार में कुछ कर दिखाने की ईच्छाशक्त्ति की भावना जागृत हो जाये तो यहां बड़े-बड़े एवं नामचीन बैनर को तगड़ी चुनौती दी जा सकती है। इसके लिए उन्हें सर्वप्रथम अत्याध्ुनिक तकनीक की नई प्रिन्टिंग मशीन स्थापित करना होगा साथ ही कुछ अनुभवी लोगों को अन्य मीडिया हाउस से तोड़कर लाना होगा तथा युवा पत्रकारों को तरजीह देनी होगी, बस! बांकी एक अखबार के सफल संचालन हेतु जो कुछ भी चाहिये उन सारी चीजों की सुदृढ़ व्यव्स्था ‘आज’ के पास पूर्व से ही उपलब्ध है। अगर ‘आज’ प्रबंधन पटना में नये प्रिन्टिंग मशीन लगा लें तो उन्हें ऐसे सुखद परिणाम मिलेंगे जिसकी उन्होने कभी कल्पना तक नहीं की होगी। स्पस्ट शब्दों में कहा जाय तो अभी लड़खड़ा करके चलने वाला ‘आज’ बिहार में सरपट दौड़ने लगेगा। इस आलेख का मकसद ‘आज’ प्रबंधन की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं बल्कि उन्हें वास्तविकता से अवगत कराना है। ‘आज’ प्रबंधन से विनम्र अनुरोध है कि इसे सकारात्मक दृश्टिकोण से देखें।

पटना से विवेक कुमार सिन्हा की रिपोर्ट

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