आज समाज में तरक्की चाहिए तो मिश्रा बन जाइये

 

: कानाफूसी : जहाँ एक ओर आज समाज अख़बार अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है, वहीँ इस दौर में भी उसका एक अधिकारी जी जान से इसकी लुटिया डुबाने का बीड़ा उठाये हुए हैं. वैसे तो आज समाज में कभी ऐसे लोगों की कमी नहीं रही, लेकिन ये सज्जन संस्था के लिए नए नहीं बल्कि अख़बार के शुरुवाती दौर से इसके साथ जुड़े हैं.
 
सत्ता के लोभ में श्रीमान पहले से ही कम बौखलाए हुए नहीं थे उस पर राहुल देव एंड कम्पनी की विदाई के बाद तो मानो ईश्वर ने गंजे को नाखून ही दे दिए. भाई साहब जी जान से ग्रुप एडिटर की जी हुजूरी में जुट गए, और मनचाहा पद पा गए. इसके बाद तो मनो वो ख़ुद को भगवन ही समझ बैठे, और आनन फानन में कइयों को नौकरी से निकाल दिया. अब तक समझने वाले समझ ही चुके होंगे कि हम किसी और की नहीं उन्हीं राजशेखर मिश्रा की बात कर रहे हैं जो शशि शेखर के समय में अमर उजाला से निकाल दिए गए थे.
 
फ़िलहाल श्रीमान के दोनों हाथों में लड्डू हैं, और उनके राज में चापलूसी और जातिवाद खूब फल फूल रहा है. पुराने सभी कर्मचारियों को दरकिनार कर महाशय आज कल मिश्राओं को प्रोमोट करने में लगे हैं. सत्ता में आते ही एक महिला कर्मचारी को उसके `मिश्रा` होने का लाभ वेतन दुगुना कर दे दिया. जिसके लिए उसके कम वेतन का हवाला दिया गया. मानो पूरी संस्था में वो ही एक अबला कम वेतन पाती हैं. इसके बाद दूसरे `मिश्रा जी` को उपकृत किया गया, ये साप्ताहिक हमवतन अख़बार से बुलाये गए, मालूम हो कि ये `मिश्रा जी` पहले भी आज समाज में स्ट्रिन्गेर के पद पर काम कर चुके हैं, जिन्हें अब उन्हीं के वरिष्ठ साथियों के ऊपर पांच गुनी वेतन वृद्धि के साथ लाया गया है.  
 
केवल इतना ही नहीं, श्रीमान इन्हें जी जान से प्रोमोट करने में भी लगे हैं, डेली की प्लानिंग मीटिंग में अन्य वरिष्ठ कर्मचारियों के जगह इन दो `मिश्राओं` को साथ रखते हैं. इसके अलावा संस्था में जो नयी नियुक्तियां हुई हैं उनमे भी ब्राह्मण वर्चस्व कायम है. इन सभी प्यादों से राजशेखर मिश्रा का विशेष स्नेह जग ज़ाहिर है. राजशेखर कर्मचारियों से दुर्व्यवहार, और धमका कर काम करवाने के लिए पहले ही बदनाम हैं. विशेषकर महिला कर्मचारियों के बारे में अश्लील टिप्पणियाँ करना इनका ख़ास शौक है. इसी शौक के इनाम स्वरुप एक महिला कर्मचारी की शिकायत पर महाशय का अम्बाला ट्रान्सफर भी हो चुका है. लेकिन चापलूसी, ओर जी हुजूरी की बदोलत महाशय वापस दिल्ली आ ही गए.
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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