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आज समाज, मेवात : कम्‍प्‍यूटर खराब, बिजली गायब, फोन-इंटरनेट ठप

: साइबर कैफे के सहारे चल रहा है कार्यालय : आज समाज के मेवात ब्‍यूरो कार्यालय की हालत बिल्‍कुल खराब हो गई है. कार्यालय अब उधारी की दुकानदारी के सहारे चल रहा है. ताला बंद करने जैसी स्थिति में आ गया है यह कार्यालय. कम्‍प्‍यूटर खराब हैं, बिजली कटी हुई है, इंटरनेट और फोन डेड पड़े हुए हैं. आफिस से काम लगभग बंद हो चुका है. ब्‍यूरोचीफ किसी तरह अपने प्रयास से साइबर कैफे से खबरों को भेज रहे हैं.

: साइबर कैफे के सहारे चल रहा है कार्यालय : आज समाज के मेवात ब्‍यूरो कार्यालय की हालत बिल्‍कुल खराब हो गई है. कार्यालय अब उधारी की दुकानदारी के सहारे चल रहा है. ताला बंद करने जैसी स्थिति में आ गया है यह कार्यालय. कम्‍प्‍यूटर खराब हैं, बिजली कटी हुई है, इंटरनेट और फोन डेड पड़े हुए हैं. आफिस से काम लगभग बंद हो चुका है. ब्‍यूरोचीफ किसी तरह अपने प्रयास से साइबर कैफे से खबरों को भेज रहे हैं.

आज समाज के मेवात कार्यालय में कभी छह कम्‍यूटर सिस्‍टम हुआ करते थे. धड़ल्‍ले से समाचारों की आवाजाही होती थी, पर पिछले पंद्रह दिनों से कार्यालय की हालत खराब है. कार्यालय के पांच कम्‍प्‍यूटर खराब पड़े हुए हैं. दस दिन से कार्यालय की बिजली भी कटी हुई है. किसी तरह एक कम्‍यूटर एवं उधारी की बिजली के सहारे काम चलाया जा रहा था, पर हद तो तब हो गई जब नॉन पेमेंट में टेलीफोन और इंटरनेट की लाइन भी कट गई. अब कार्यालय का काम पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है.

आठ कर्मचारियों वाला यह कार्यालय अब ताला लगने जैसी स्थिति में पहुंच गया है. कर्मचारी अपने संपादक राहुल देव को भी इस समस्‍या से अवगत करा चुके हैं, इसके बावजूद भी अब तक ना तो कम्‍प्‍यूटर ठीक हुए, ना बिजली और और ना ही फोन व इंटरनेट शुरू हो सका. प्रधान संपादक भी इस समस्‍या को हल नहीं करा पाए हैं. ब्‍यूरोचीफ किसी तरह अपने मेल पर खबरें मंगवाकर तथा फांट चेंज करके कार्यालय को भेज रहा है. अब यह स्थिति कितने दिन तक बनी रहेगी किसी को पता नहीं है.

कुल मिलाकर आज समाज के मेवात कार्यालय का हाल झोलाछाप हो गई है. ब्‍यूरोचीफ किसी तरह यहां-वहां से जुगाड़ करके खबरें भेज रहे हैं. जबकि किसी समय इस कार्यालय की धाक हुआ करती थी. चार लोग संपादकीय, तीन लोग मार्केटिंग तथा एक व्‍यक्ति सर्कुलेशन की जिम्‍मेदारी संभालता था, पर पिछले एक पखवारे से कार्यालय के हालात बदल गए हैं. कब तक ऐसे हालात बने रहेंगे बता पाना मुश्किल है. सबसे आश्‍चर्य की बात तो यह है कि प्रबंधन क्‍यों नहीं अखबार को गंभीरता ले रहा है.

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