आज हरिशंकर परसाई जी का जन्म दिन है…

Chanchal Bhu : टाइम्स के मालिकान ने फैसला लिया कि 'सारिका' को बंबई से हटा कर दिल्ली कर दिया जाय. इसके पीछे संस्थान की अघोषित मंशा थी कि कमलेश्वर जी हटें. और यही हुआ. सारिका दिल्ली आ गयी और नंदन जी पराग के साथ साथ सारिका भी देखने लगे. सारिका से जुड़े रमेश बतरा, सुरेश उनियाल भी बंबई से दिल्ली आ गए. उन दिनों इन पत्रिकाओं का दफ्तर १० दरियागंज होता था.

'दिनमान' 'पराग ' 'सारिका'. रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, प्रयाग शुक्ल, शर्मा जी. अवध नारायण मुद्गल, कन्हया लाल नंदन. बाद में 'वामा' भी यहीं से शुरू हुयी और संपादक हुईं मृणाल पांडे, गगन गिल … लगता ही नहीं था यह कोइ गंभीर दफ्तर है. हंसी मजाक, ठहाके. साहित्यकारों का आमद रफ्त. ..उफ़ .. गुजिश्ता खुशबुओं के दिन थे. गप्पियों की एक जमात भी थी.

सर्वेश्वर जी और शर्मा जी में खूब छनती थी और जोर के ठहाके लगते थे. सुषमा स्वराज की आदत थी – 'फिर क्या हुआ?' और अगली कहानी आगे बबाध जाती थी. एक गप्प यह भी- जबलपुर से दो यात्री भोपाल के लिए ट्रेन में चढ़े और बगैर टिकट के. ये दो यात्री थे हरिशंकर परसाई और शरद जोशी. दोनों बैठ ही नहीं लेट गए. कुछ दूर चले होंगे कि टीटी आ गया. उसने टिकट मांगा. जोशी जी ने कहा भाई कुछ पढ़े लिखे भी हो? वो जो सज्जन लेटे हैं, बहुत बड़े साहित्यकार हैं उनका नाम है हरिशंकर परसाई जी. टीटी ने पूछा- और आप? मैं हूं शरद जोशी. टीटी खामोश और उठ कर जाने लगा तो जोशी जी ने कहा भाई कहीं से चाय वगैरह मिल सकती है? टीटी ने कहा देखता हूँ.

अगले स्टेशन पर टीटी एक आदमी के साथ चाय और पेस्ट्री वगैरह लेकर खुद हाजिर हुआ. चाय पेस्ट्री खाने पीने के बाद जोशी जी ने पाकिट में हाथ डाला सुर बोले कितना हुआ? टीटी ने कहा नहीं रहने दीजिए. हमने भुगतान कर दिया है. जोशी जी ने जिद किया तो टीटी ने कहा रहने दीजिए वापसी में काम आएगा. टिकट ले लीजियेगा. हो सकता है कि मेरी जगह कोई दूसरा टीटी रहेगा तो दिक्कत आ सकती है. और जब टीटी प्रणाम कर के जाने लगा तो परसाई जी ने पूछा, भाई अपना नाम तो बता दीजिए, लगता है आप साहित्य में रूचि रखते हैं. टीटी ने सकुचाते हुए कहा कि -'हाँ थोड़ी बहुत रुचि रखता हूँ, मेरा नाम बिमल मित्र है.

चंचल के फेसबुक वॉल से.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *