Vikas Mishra : एक फिल्म आई थी 'मातृभूमि'। जहां लड़कियों का अकाल है, लड़कों की शादियां नहीं हो रही थीं। एक घर में पांच कुंवारे बेटे थे और उनका विधुर बाप। रुपये पैसे देकर तिकड़म से वो पांचों के लिए एक लड़की ढूंढ लाया। आंगन में बंटवारा हो रहा था। एक-एक दिन एक भाई..। इस तरह बांटने पर दो दिन बचते थे। तब तक बाप बोला। सालों तुम्हें हमारी फिक्र नहीं होती। मैंने तुम्हें पढ़ाया लिखाया, तुम लोगों के लिए दुल्हन ले आया जीवन भर की सारी जमा पूंजी खर्च करके। मेरा ख्याल नहीं है तुम लोगों को।
फिर तय हुआ कि बाकी दो दिन पिता जी के। लड़की से किसी ने नहीं पूछा और पिताजी बहू के साथ सुहागरात मना आए। ये कहानी ख्याल आई अभी बीजेपी और आडवाणी प्रकरण के बाद। सत्ता उस लड़की की तरह लगी। राजनाथ, मोदी, जेटली वगैरह पांच बेटों की तरह लगे और न जाने क्यों आडवाणी मुझे उस पिता की तरह लगे, जो अपने लिए बहू के दो दिन अलाट करवा रहा था।
वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.





