आन्दोलन के लिये राइफल आवश्यक नहीं : सत्यमित्र दूबे

सोनभद्र : आन्दोलन के नाम पर राइफल उठाने वालों से मैं पूरी तरह असहमत हूँ। यह कहना था प्रोफेसर सत्यमित्र दूबे का जो देश के प्रमुख भाषाविद् डा. मूल शंकर शर्मा की पाँचवी पुण्यतिथि पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में अपना विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रत्येक आन्दोलन परिवर्तन की ओर नहीं ले जाता, आन्दोलन के पूर्व इस बात का आकलन करना आवश्यक है कि आन्दोलन की दिशा क्या है।

संगोष्ठी के प्रथम सत्र के विषय ‘साहित्य व पत्रकारिता – जल, जंगल और ज़मीन के सवाल’ पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुये देश के प्रख्यात समाजशास्त्री प्रोफेसर सत्यमित्र दूबे ने कहा कि प्रारम्भ से ही जंगल पर जनता का अधिकार था और जंगल का सरकारीकरण कभी नहीं हुआ। जनजाति बिरादरी के लोग ही राज किया करते थे, परन्तु उनके राज को कब, कैसे छीन लिया गया, पता ही नहीं चला। श्री दूबे ने आदिवासियों के हक के प्रति चिन्ता व्यक्त करते हुये कहा कि संविधान के पाँचवे हिस्से में आदिवासियों को क्या दिया जायेगा, इसका उल्लेख अवश्य है, पर उसे पूरा नहीं किया गया।

प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर दीपक मलिक ने देश की मीडिया की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करते हुये कहा कि संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री का उम्मीदवार नहीं होता लेकिन मीडिया उसी पर बहस चलाये हुये है। वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने देश आदिवासियों के विस्थापन व बिगड़ते पर्यावरण पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने उत्तराखण्ड हादसे के एक सप्ताह पूर्व नैनीताल में आयोजित उस सेमिनार में हुये विमर्श पर भी प्रकाश डाला जिसमें हिमालय पर मण्डराते खतरे पर विस्तार से चर्चा की गयी थी। उन्होंने बताया कि पाँच प्रदेशों का आम जीवन गोविन्द वल्लभ पंत सागर के प्रदूषित जल से प्रभावित है। पत्रकारिता पर सवाल उठाते हुये श्री कुमार ने कहा कि कुछ तो लिखते हैं पर सभी लोग नहीं लिखते हैं जिससे पत्रकारिता के स्तर में गिरावट आयी है। उन्होंने जनपद के बिगड़ते पर्यावरण में सत्तारूढ़ दल द्वारा समर्थित चिंकारा कंपनी के कार्यों पर भी चिन्ता जतायी।

जल, जंगल व ज़मीन और मीडिया की भूमिका पर समाजसेवी शान्ता भट्टाचार्या के वक्तव्य ने ऐतिहासिकता प्रदान कर दी जब उन्होंने जंगल और आदिवासियों के संघर्ष पर तत्कालीन सरकार द्वारा रासुका लगाये जाने व जनसत्ता में ख़बर प्रकाशन के बाद उसे समाप्त किये जाने का उल्लेख किया। वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस ने कहा जल, जंगल और ज़मीन के आन्दोलनों को बिना कलमकारों के सहयोग से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। उ.प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमन्त तिवारी ने देश में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन में सरकार की असंवेदनशीलता पर चिन्ता जतायी।

प्रगतिशील लेखक संघ, उ.प्र. के प्रदेश महासचिव  डा. संजय श्रीवास्तव ने डा. विनयन, सीमा आज़ाद सहित देश के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का उल्लेख करते हुये कहा कि आन्दोलन को तंत्र कुचलने का प्रयास करता है और वनवासियों की लड़ाई लड़ने वालों को नक्सली घोषित कर दिया जाता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल ने वनवासियों के संघर्ष को साहित्य में समुचित उल्लेख का जिक्र करते हुये कहा कि बिरसा मुण्डा के संघर्ष का साहित्य ने जिस गरिमापूर्ण ढंग से उल्लेख किया कि वे पूजित हो गये।

प्रेस क्लब, सोनभद्र द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम नारायण लाल श्रीवास्तव, डा. विनय कुमार पाठक, विजय शंकर चतुर्वेदी सहित कई बुद्धिजीवियों ने अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम  के दूसरे सत्र में ‘लोक जीवन, संस्कृति और पर्यावरण’ विषय पर चर्चा की गयी व तीसरे सत्र में कजली गायन का आयोजन हुआ। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में कुल पाँच पुस्तकें भी विमोचित की गयीं।

सोनभद्र से विजय शंकर चतुर्वेदी की रिपोर्ट.

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