आपसी सिर-फुटौव्वल ने भाजपा का बनता राजनीतिक खेल बिगाड़ा

एक तरफ भाजपा के रणनीतिकार यह प्रचार करने में जुटे हैं कि पूरे देश में मोदी के पक्ष में हवा बहने लगी है। इसको लेकर जीत के बड़े-बड़े दावे भी पेश किए जा रहे हैं। देशभर में घूम-घूमकर नरेंद्र मोदी रैलियों में विपक्षी दलों पर जमकर निशाने साध रहे हैं। उनकी रैलियों में खूब भीड़ भी जुट रही है। लेकिन, पार्टी के अंदर जगह-जगह टिकटों को लेकर जो बवाल शुरू हुआ है, वह शांत होने का नाम नहीं ले रहा। यहां तक कि बड़े नेताओं के बीच के अंतर विरोध भी सिर उठाने लगे हैं।

पार्टी की अंदरूनी कलह इतनी बढ़ गई है कि कई प्रदेशों में आशंका होने लगी है कि आपसी सिर-फुटौव्वल कहीं भाजपा का बनता राजनीतिक खेल न बिगाड़ दे। तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा के पितामह माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी भी नेतृत्व की रीति-नीति से अंदर ही अंदर दुखी हैं। कभी-कभार इस असंतोष की कसक झलक भी जाती है। वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज कर्नाटक में हुए कुछ फैसलों से दुखी हैं। अपना दुख वे ट्वीटर संदेशों में जाहिर भी करती रही हैं।

पार्टी में टिकटों के झमेले की शुरुआत आडवाणी की टिकट को लेकर ही हुई थी। मोदी का रुख देखकर इस बार आडवाणी, गांधीनगर की जगह भोपाल से चुनाव लड़ना चाहते थे। इनकी नाराजगी इस बात को लेकर भी रही है कि उनका चुनावी टिकट पहले फाइनल नहीं किया गया। टिकटों की चार सूचियां निकलने के बाद भी सस्पेंस बनाए रखा गया। इसी के बाद उन्होंने भोपाल से चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी। तब नेतृत्व ने दबाव बनाया कि वे भोपाल की जगह गांधीनगर से ही चुनाव लड़ें। क्योंकि भोपाल से चुनाव लड़े, तो इसको लेकर मीडिया में अंदरूनी तकरार के तमाम किस्से प्रचलित कर दिए जाएंगे। जबकि, आडवाणी का तर्क यही था कि जब मोदी को उनकी मनचाही वाराणसी सीट से लड़ाया जा सकता है, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को उनकी चाहत के अनुसार लखनऊ सीट दी जा सकती है, तो उन्हें भोपाल सीट क्यों नहीं मिल सकती? इसको लेकर पार्टी के अंदर दो-तीन दिनों तक राजनीतिक थुक्का-फजीहत की स्थिति बनी रही थी।

यह अलग बात है कि आडवाणी गांधी नगर से चुनाव लड़ने को तैयार हो गए हैं। लेकिन, अंदर की सच्चाई यही मानी जा रही है कि आडवाणी, नेतृत्व की रीति-नीति से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए हैं। उन्हें इस बात की खास कसक है कि इस समय पार्टी के सभी महत्वपूर्ण फैसले मोदी केंद्रित ही हो गए हैं। जबकि, पहले ऐसी परंपरा नहीं रही। यह जरूर है कि इस दौर में आडवाणी अपने को विवादों से दूर रखने की कोशिश करते दिखाई पड़ते हैं। विवादों से बचने के लिए ही इन दिनों इस बुजुर्ग नेता ने मीडिया से भी दूरी बना ली है। लेकिन, उनकी इस चुप्पी में भी नाराजगी के संकेत ढूंढेÞ जा रहे हैं।

पूर्व रक्षा मंत्री जसवंत सिंह वरिष्ठ नेता हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उनकी महत्वपूर्ण राजनीतिक हैसियत रही है। उन्हें आडवाणी का खास करीबी माना जाता है। इस करीबी के कारण उन्हें नेतृत्व की नाराजगी भी झेलनी पड़ रही है। ये बात जसवंत सिंह ने मीडिया से स्वीकार भी की है। जसवंत अब बागी तेवरों में उतर आए हैं। वे अपने गृह क्षेत्र बाड़मेर से टिकट मांग रहे थे। उन्होंने कहा था कि वे जीवन का आखिरी चुनाव लड़ने जा रहे हैं, ऐसे में उन्हें अपने गृह क्षेत्र बाड़मेर से ही टिकट दे दिया जाए। लेकिन, राजस्थान की राजनीति में जसवंत और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के आपसी रिश्ते अच्छे नहीं हैं। ऐसे में, वसुंधरा ने पूरा जोर लगा दिया कि बाड़मेर से जसवंत को टिकट न मिल पाए, यही हुआ भी। नेतृत्व ने यहां से कर्नल चौधरी सोनाराम को टिकट दे दिया। सोनाराम कांग्रेस से भाजपा में आए हैं। इस फैसले से जसवंत सिंह भड़क गए। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा भी भर दिया है।

कह दिया है कि अब भाजपा में असली-नकली नेतृत्व की लड़ाई शुरू हो गई है। पार्टी में बाहर से आए नेताओं ने अतिक्रमण कर लिया है। इसीलिए, वे विरोध में उतर आए हैं। शुरुआत में दबाव बनाया जा रहा था कि जसवंत विद्रोह का झंडा न उठाएं। लेकिन, चुनावी पर्चा भरने के बाद भी उन पर अब तक अनुशासन का डंडा नहीं चलाया गया। इस संदर्भ में वरिष्ठ नेता अरुण जेटली कहते हैं कि अभी उम्मीद है कि शायद वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में भरा पर्चा वापस ले लें। यदि वे पर्चा वापस नहीं लेंगे, तो फिर उन पर अनुशासन का डंडा जरूर चलेगा। भाजपा के हल्कों में माना जा रहा है कि जसवंत की नाराजगी का असर प्रदेश की कई सीटों पर पार्टी की लुटिया डुबवा सकती है।

पार्टी के रणनीतिकार उत्तर प्रदेश और बिहार की 120 सीटों पर खास उम्मीद लगाए बैठे हैं। उन्हें लगता है कि भाजपा के पक्ष में जो हवा बह रही है, उसके चलते इन दोनों प्रदेशों में जमकर ‘कमल’ खिलेगा। लेकिन, टिकटों को लेकर इन दोनों प्रदेशों में भी कई नेता नाराज बने हुए हैं। बिहार के वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे, राम विलास पासवान की एंट्री का विरोध करते रहे हैं। राजद से भाजपा में आए रामकृपाल यादव की एंट्री से भी वे नाराज रहे हैं। उनके तमाम विरोध के बावजूद पार्टी ने उन्हें पाटलिपुत्र क्षेत्र से टिकट भी थमा दिया है। गिरीराज सिंह वरिष्ठ नेता हैं। मोदी के मुद्दे पर वे वर्षों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पंगा लेते आए हैं। उनकी पहचान मोदी के प्रबल समर्थक के रूप में रही है। लेकिन, यह मोदी भक्ति भी उनके ज्यादा काम नहीं आई। वे बेगूसराय से चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन, पार्टी ने नवादा क्षेत्र से टिकट थमा दिया। दो दिन तक वे नाराज रहे थे। अब उन्होंने दुखी मन से यह फैसला स्वीकार कर लिया है। लेकिन, उनके करीबी लोग कह रहे हैं कि इस फैसले से गिरीराज का दुख बना हुआ है।

बिहार में ही बक्सर क्षेत्र की टिकट को लेकर बड़ा बवाल हो गया है। बुजुर्ग नेता लालमुनि चौबे को इस बार पार्टी ने टिकट नहीं दिया। चौबे यहां से कई बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। वे अटल बिहारी वाजपेयी के खास करीबी नेताओं में माने जाते थे। टिकट न मिलने पर लालमुनि भड़क गए हैं। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को खुलकर कोसा है। यहां तक कह दिया कि वे गुलामों के नेता हैं। गुस्साए चौबे ने तो अल्टीमेटम दिया है कि वे लखनऊ से चुनाव लड़कर राजनाथ सिंह को दिक्कत में डाल सकते हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद चौबे बक्सर से निर्दलीय उम्मीदवार बनने की जिद पर अड़े हैं। वे तो मोदी को भी हवा का नेता कहने से नहीं चूक रहे।

गुजरात में अहमदाबाद पूर्व की सीट को लेकर टंटा खड़ा हो गया है। सात बार सांसद रहे हरेन पाठक को इस बार टिकट नहीं दिया गया। क्योंकि, उनका मोदी टोली से तालमेल अच्छा नहीं रहा। हरेन, आडवाणी के ज्यादा करीबी रहे हैं। टिकट कटने की एक वजह यह भी मानी जा रही है। उन्होंने विद्रोह का अल्टीमेटम जरूर दिया था। लेकिन, राजनाथ सिंह ने उनसे मुलाकात करके समझाने की कोशिश की है। हरेन पाठक क्या फैसला करेंगे? इस बारे में उन्होंने खुलासा नहीं किया। उनकी भावी राजनीति के बारे में सस्पेंस बरकरार है। लखनऊ की सीट को लेकर भी लालजी टंडन नाराज रहे हैं। इस बार उनकी सीट छीनकर राजनाथ सिंह को दी गई है। इसको लेकर वरिष्ठ नेता टंडन कई दिनों तक ‘कोपभवन’ में रह चुके हैं। पार्टी भले यह दावा करे कि टंडन जी को मना लिया गया है। लेकिन, वे अपनी नाराजगी की झलक दिखाने में चूकते नहीं हैं।

भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी भी अपनी वाराणसी सीट को लेकर अटक गए थे। वे इस बार भी वाराणसी से चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन, यहां पर मोदी को लड़ाने की रणनीति तय हुई। इसको लेकर कई दिनों तक मुरली मनोहर जोशी भी गुस्से में दिखाई पड़े थे। अब उन्हें कानपुर से चुनाव लड़ाया जा रहा है। लेकिन, उनकी नाराजगी का प्रकरण आज भी भाजपा में चर्चा का विषय है। मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की पहचान भगवा साध्वी की है। तेज-तर्रार उमा को इस बार झांसी से टिकट दिया गया है। लेकिन, भाजपा में यह चर्चा चली थी कि उमा झांसी की जगह भोपाल से चुनाव लड़ना चाहती हैं। इसको लेकर उमा खफा रही हैं। उन्होंने दो दिन पहले ग्वालियर में आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश भाजपा के नंबर-1 नेता ने ही इस तरह की खबर साजिश के तौर पर प्लांट कराई है। भाजपा के हल्कों में माना जा रहा है कि उमा भारती ने यह इशारा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर किया है। उल्लेखनीय है कि चौहान और उमा भारती के बीच लंबे समय से आपसी रिश्ते खराब रहे हैं।

इस बीच उमा भारती को झांसी की बजाए सोनिया गांधी के मुकाबले राय बरेली से लड़ाने की चर्चा तेज हुई है। इसकी पहल योग गुरू बाबा रामदेव कर चुके हैं। पार्टी नेतृत्व उमा भारती को राय बरेली से चुनावी जंग लड़ने के लिए तैयार करा रहा है। लेकिन, शिवराज सिंह चौहान की लॉबी को शायद ही यह रास आए कि राष्ट्रीय नेतृत्व उमा को ज्यादा महत्व दे? कई प्रदेशों में भाजपा के अंदर टिकटों को लेकर आपसी मारामारी तेज है। यहां तक कि मोदी की मनुहार भी काम नहीं आ रही। सूत्रों के अनुसार, लालमुनि चौबे को नरेंद्र मोदी ने बुधवार को फोन किया था। उन्हें 10 मिनट तक फोन पर समझाया। लेकिन, बुजुर्ग नेता ने अपनी जिद छोड़ने के संकेत नहीं दिए। वे तो गुस्से में कह रहे हैं कि कम से कम तीन सीटें हरवाकर भाजपा नेतृत्व को मजा चखाकर ही रहेंगे।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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