‘आप’ ना तो हाशिये की आवाज है और ना अपने मौजूदा स्वरुप में बन सकती है

ये सही बात है कि 'आप' ने दिल्ली में कांग्रेस-बीजेपी के खिलाफ एक नया मोर्चा खोला है और यथास्थितिवाद के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश का बड़ा फायदा उसको जरूर मिला है. लेकिन जैसा कि कुछ विद्वान् लोग कह रहे हैं, क्या उसके खाते में जो तथाकथित जनअसंतोष की लहर है उसको एक सही राजनीतिक दिशा दे दी जाये तो भारतीय राजनीति का मौजूदा स्वरुप बदलने में और फासीवादी शक्तियों के उभार को रोकने में मदद मिल जायेगी? 
 
यहां सवाल महज स्थापित सत्ता-ध्रुवों के खिलाफ 'आप' के समर्थन-विरोध का नहीं है, सवाल देश की व्यवस्था में बुनियादी बदलाव का है. हो सकता है कि अपने कुशल चुनावी प्रबंधन, जनता के एक हिस्से के आदर्शवादी रुझान और फौरी बदलाव की आकांक्षाओं की लहरों के सहारे 'आप' मौजूदा सत्ता संरचना में कुछ सेंध लगाने में सफल हो जाये, पर क्या वो वाकई सामाजिक-राजनितिक बदलाव की ताकत बन सकती है? क्या कोरे रूमानी आदर्श के सपनों के अलावे उसकी कोई ठोस विचारधारा है? क्या उसने बदलाव के लिए आवश्यक कोई जमीनी संघर्ष किया है? क्या ये कुछ अजीब नहीं कि 'आप' के समर्थकों में से ऐसे लोगों की तादाद काफी है जो मोदी को पीएम देखना चाहते हैं? तो क्या ऐसे लोग वाकई देश और समाज को बदलते देखना चाहते हैं? और अगर ये बदलाव है तो उसकी दिशा क्या होगी? 
 
मेरा साफ़ तौर पर मानना है कि आप के अधिकांश समर्थकों में निम्न मध्य वर्ग के कुछ हिस्से के अलावा मध्य वर्ग का वो हिस्सा है जो अपने वर्गीय/जातीय/आर्थिक हितों को सुरक्षित रखते हुए ही कोई बदलाव चाहता है उसकी कीमत पर नहीं। ये कुछ ऐसा ही है जैसे बिना वर्गीय/जातीय ढांचे पर चोट पहुंचाए दलितों/वंचितों/आदिवासियों/शोषितों के लिए सामाजिक न्याय और समता की बात करना। 'आप' की अहम जीत के बावजूद मेरे लिए ये मान पाना मुश्किल है कि वो वाकई किसी महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक बदलावों की वाहक बनेगी या फिर भारतीय राजनीति में कुछ क्रांतिकारी परिवर्तनों की पटकथा लिखेगी क्योंकि 'आम आदमी पार्टी' उतनी भी 'आम' नहीं। इस परिघटना को सरल तरीके से देखने के बजाय मुख्तलिफ सामाजिक प्रवृत्तियों की विचार-प्रक्रिया और वस्तुगत आधारों पर उसका गहन विश्लेषण करना जरूरी है. खासकर वामपंथ के लिए. और उन वामपंथियों के लिए तो और भी जो 'आप' की जीत से मुग्ध होकर उसको आम जनता की जीत बताने पर तुल गए हैं. और यहां तक कि देश के तमाम दबे-कुचले हाशिये के लोगों की आवाज बनने की जिम्मेदारी से बचते हुए इसी में खुद की जीत देखने लगे हैं. लेकिन यह समझना होगा कि तमाम जरूरी और जमीनी मुद्दों पर बहसों के बगैर कुछ मुद्दों पर लोकप्रिय सुधारवादी पहलकदमी के जरिये ठोस परिवर्तन की बात नहीं हो सकती। 
 
वामपंथ जिन मुद्दों पर लड़ता रहा है, सत्ता-संरचना के पिरामिड में वो पहले भी हाशिये पर थे और आज भी हैं. क्योंकि असल में वे विचार नवउदारवादी पूंजीवाद की समर्थक सरकारों व कॉर्पोरेट महाकायों के स्वाभाविक गठजोड़ और उनकी सफलता में अपना बेहतर भविष्य देख रहे समाज के दस फीसदी प्रभुवर्गों द्वारा हाशिये पर धकिया दिए गए करोड़ों लोगों की ही आवाज हैं। लेकिन, सच यही है कि वास्तविक बदलाव तभी होंगे जब हाशिये के लोगों की तस्वीर बदलेगी और अफ़सोस कि 'आप' न तो हाशिये की आवाज है और न ही अपने मौजूदा स्वरुप में बन सकती है, भले ही वो कुछ सीटों पर चुनावी जीत हासिल कर ले।
 
लेखक मित्ररंजन पत्रकार एवं सोशल एक्टिविस्ट हैं. इनसे mitraaranjan@gmail.com के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है.

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