आम आदमी जितना नेता से नाराज है उतना ही पत्रकार से भी जला भुना बैठा है

Sanjay Tiwari : तो आपको लगता है कि पत्रकारों को जेल भेजकर केजरीवाल ने अपने चेहरे पर कालिख पोत ली है और उनका बड़ा घाटा हो जाएगा. मुगालते में हैं आप. हमारे दौर में आम आदमी जितना नेता से नाराज है उतना ही पत्रकार से भी जला भुना बैठा है. इसलिए बीजेपीवाले और टीबीवाले जितना इस मुद्दे को हवा देंगे टोपीवालों को उतना फायदा पहुंचेगा.

Sheetal P Singh : शाम बहुत पुराने लगोंटिया यारों के साथ गुज़री। मेरे अलावा बाक़ी तीनों बड़े वाले ब्रेकेट के पढ़ैया लोग। पूरी चांद निकाल ली लायब्रेरियों में। तीनों पुफेस्सर। एक तो वीसी भी रह लिया दो साल। खै़र बातें तो बहुत हुईं। एक बात यहाँ दर्ज हो ही जाय। इस चुनाव में "क्रोनी कैपिटल" का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य क़रीब 7-8 लाख करोड़ के कारपोरेटी NPA को माफ़ कराना भी है। इस काम में एक दो घोड़ों पर दस पाँच हज़ार करोड़ का चंदा पूल करके होम हो जाय तो भी सौदा तो चोखा ही रहने वाला है। पार्टियों से इस पर जवाब माँगा जाय?

Abhishek Srivastava : Today's bottomline: "If Arvind Kejriwal passes gas also, you will accuse him of contributing to global warming and raising the sea level up." (Satinath Sarangi on TIMES NOW Newshour today)

Shahnawaz Malik : दो-चार मौकों पर सही से ड्यूटी निभाकर मीडिया उसे अपने अच्छे काम और ईमानदारी के सर्टिफिकेट के तौर पर प्रोजेक्ट करता है जबकि उसके बाकी काम हाईप्रोफाइल नेता, कॉर्पोरेट दलाल और माफ़िया डॉन वाले हैं। मीडिया कम्पनियां दलाली, बेईमानी और शोषण की पराकाष्ठा हैं। केजरीवाल को घेरने की बजाय मालिकों-संपादकों को उनके सवाल पर इमानदारी से गौर करना चाहिए।

Arun Maheshwari : ‘आप’ के खिलाफ मीडिया में चल रही अभूतपूर्व कुत्सा मीडिया के वर्गीय रूझान से पूरी तरह मेल खाती है। पिछले कुछ वर्षों में सभी इलेक्ट्रानिक मीडिया में भारत के इजारेदार घरानों का जितने बड़े रूप में निवेश हुआ है, उसका प्रभाव इस चुनाव प्रचार में साफ जाहिर हो रहा है। मीडिया में मोदी अभी सभी आलोचनाओं से ऊपर है। मोदी ने अपने भाषणों में आज तक ऐतिहासिक तथ्यों आदि के बारे में जिस प्रकार की बचकानी गलतियां की है, जिसप्रकार वे किसी भी साक्षात्कार या प्रत्यक्ष बहस में शामिल होने से बचते रहे हैं, उन्हें मीडिया के गलाफाड़ू एंकरगण कभी याद तक नहीं करते! ऐसे मीडिया के बिकाऊपन पर अरविंद केजरीवाल की टिप्पणी को आज जिस नैतिक आवेश के साथ मीडिया के ‘शील-हरण’ की घटना के रूप में लगातार प्रसारित किया जा रहा है, वह भाड़े के ढिंढोरचियों द्वारा बेशर्मी की सभी सीमाओं को लांघ जाने जैसा है।

Deepu Naseer : जेल भेजने वाली बात गलत है लेकिन मीडिया का अधिकाँश हिस्सा कॉर्पोरेट के चंगुल में है जिसकी पहली पसंद नरेंद्र मोदी हैं, निसंदेह।

Pramod Joshi : किसी का समर्थन या विरोध करना आम पत्रकारिता के मूल्य मानकों के भीतर आता है। पर बौद्धिक दृष्टि से अपने विरोधी को भी गलत उधृत नहीं किया जाना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की संरचना ऐसी है कि जिसमें कहना मुश्किल होता है कि कहाँ समाचार है और कहाँ विचार है। पेड न्यूज वस्तुतः विज्ञापन को खबर की तरह पेश करना है। केजरीवाल एक राजनीतिक दल के नेता हैं। एक अरसे तक वे मीडिया की मदद से प्रचार लेते रहे। आज भी प्रचार पा रहे हैं। उन्होंने जिन चैनलों पर आरोप लगाया है वह सही भी हो सकता है, क्योंकि चैनलों के करता-धरता कतई साफ-सुथरे और निष्पक्ष लोग नहीं हैं। पर जो लोग केजरीवाल का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन करते हैं क्या वे साफ-सुथरे हैं? उनका भी लक्ष्य सम्भव है, जो उनके दर्शकों या पाठकों के हितों से न जुड़कर उनके व्यक्तिगत हितों से जुड़ता हो। फिर भी हमें तथ्यों की प्रतीक्षा करनी होगी। हाँ नई बात यह जरूर है कि केजरीवाल ने साफ-साफ तीन चैनलों का नाम लिया है। विचार करने वाली बात यह है कि क्या शेष चैनल अपनी वस्तुनिष्ठता को लेकर संवेदनशील हैं। खासतौर से इस आरोप के परिप्रक्ष्य में कि वस्तुनिष्ठता जैसी कोई ची़ज होती नहीं है। नहीं होती तो मोदी-चैनल, राहुल प्रचारक और केजरीवाल की गाने वालों में अंतर क्या है। केंजरीवाल राजनीतिक नेता हैं और उनके साथ काफी भले लोग शामिल हैं। पर उनका आकलन पूरी पार्टी की भूमिका से होगा। भले लोग दूसरी पाटियों में भी होंगे, पर इन पार्टियों की भूमिका क्या है इसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। फिलहाल हम समर के बीच में हैं और उचित-अनुचित का भ्रम फैला हुआ है।

Sanjay Tiwari : मैंने इमरजंसी नहीं देखी। तब तक मैं इस दुनिया में आया नहीं था। सुना है कि इंदिराकाल में मीडिया का वाचडॉग दुम हिलानेवाला कुत्ता हो गया था। अब इमरजंसी नहीं है। अभी मोदी सरकार भी नहीं बने हैं। लेकिन कॉरपोरेट मीडिया का बड़ा हिस्सा अपनी करतूतों से मीडिया इमरजंसी का अहसास करा रहा है। लोकतंत्र का चौथा खंभा कुत्ता होने के साथ साथ कमीना भी हो गया है।

Samar Anarya : अरविन्द केजरीवाल के पहले किसी नेता के काफिले से आम जनता को कहाँ परेशानी होती थी? उनके पहले कौन नेता नियम तोड़ता था? याद है मीडिया को आप के पहले किससे दिक्कत होती थी? मजदूर रैलियों से. वरना तो शहर में आग लगाते मनसे/विहिप/कांग्रेस कार्यकर्ता इन्हें लोकतंत्र का अवतार लगते थे.

उपरोक्त पत्रकारों की टिप्पणियां उनके फेसबुक वॉल से ली गई हैं.

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