”आयदान हर उस स्त्री की जीवन-कथा है, जो जाति-उत्पीड़न और पुरुष सत्ता का शिकार होती रही है”

मुंबई में पहली बार आयोजित मुंबई पुस्तक मेला, पवई के आठवें दिन साहित्य उपक्रम के स्टाल पर हिन्दी और मराठी की चार लेखिकाओं की पुस्तकों का लोकार्पण हुआ, जिनमें हिन्दी की सूर्यबाला, सुधा अरोड़ा और मधु कांकरिया की ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ श्रृंखला की तीन किताबें तथा मराठी की प्रसिद्ध लेखिका उर्मिला पवार की आत्मकथा ‘आयदान’ (हिंदी अनुवाद) शामिल थीं।

इस अवसर पर कथाकार सुधा अरोड़ा ने उर्मिला पवार की आत्मकथा के हिन्दी अनुवाद का लोकार्पण करते हुये कहा कि उर्मिला जी ने अपने जीवन-संघर्षों और चुनौतियों का जिस तरह मुक़ाबला किया वह केवल उन्हीं की नहीं बल्कि हर उस स्त्री की जीवन-कथा है जो जाति-उत्पीड़न के साथ-साथ पुरुष सत्ता का शिकार होती रही है। उर्मिला पवार ने कहा- इस पुस्तक को मेरे कन्फेशन के रूप में नहीं, एक दलित स्त्री के जीवन के आकलन के रूप में देखा जाये तो पुस्तक के प्रति ज्यादा न्याय होगा!

सूर्यबाला की कहानियों पर डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय ने, सुधा अरोड़ा की कहानियों पर शालिनी माथुर ने तथा मधु कांकरिया की कहानियों पर ओमा शर्मा ने अपने विचार प्रस्तुत किए। कवि-कथाकार और वृत्तचित्र निर्माता रामजी यादव ने चारों लेखिकाओं की रचनाशीलता और सरोकारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने उर्मिला पवार की आत्मकथा को मराठी दलित आत्मकथाओं की शृंखला का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताते हुये कहा कि ‘आयदान’ में दलित स्त्रीवाद का एक स्पष्ट स्वर है जो जाति-उत्पीड़न और भेदभाव के पहाड़ को काटते हुये अस्तित्व में आया है।

तमिल लेखिका अम्बई ने कहा कि भारतीय समीक्षा की यह विसंगति है कि अगर पुरुष अपने बारे में लिखता है तो कहा जाता है कि वह जिंदगी और समाज के बारे में लिख रहा है लेकिन अगर कोई महिला रचनाकार अपने बारे में लिखती है तो उस पर अपनी निजी कुंठाएं जगजाहिर करने का आरोप लगता है। साहित्य उपक्रम के संजय पोरिया ने विभिन्न भारतीय भाषाओँ की बुद्धिजीवी महिलाओं के मंच की भरपूर सराहना करते हुए कहा कि यह पहल साहित्य में एक सार्थक भूमिका निभाएगी! कार्यक्रम में कुसुम त्रिपाठी, सूरज प्रकाश, तमिल लेखिका अंबई, मलयालम की लेखिका मानसी, मराठी दलित रचनाकार उर्मिला पवार, शशि मिश्र उपस्थित थे।

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