आरुषि निर्णय ऐतिहासिक, तीन नेपाली को न्याय मिले

लखनऊ : मैं विधिक रूप से सीबीआई कोर्ट द्वारा आरुषि कांड में दिए निर्णय को ऐतिहासिक और स्वागत-योग्य मानता हूँ क्योंकि जिस प्रकार से घटना घटी थी, जो साक्ष्य शुरू से ही आ रहे थे, जिस प्रकार से स्वयं सीबीआई का पहला क्लोजर रिपोर्ट ही कह रहा था कि साक्ष्यों के आधार पर तलवार दंपत्ति के अतिरिक्त किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा यह घटना कारित किया जाना पूरी तरफ असंभव था, उससे इस सजा द्वारा आरुषि और हेमराज के प्रति न्याय हुआ.

मैंने सीबीआई स्पेशल कोर्ट के जज श्री श्याम लाल द्वारा आरुषि कांड में दिए गए पूरे निर्णय को पढ़ा और मैंने इसे वास्तव में अद्भुत पाया. मैं जज साहब को उनके ज्ञान, विद्वता, गहराई और उद्देश्यों के प्रति गहन निष्ठा के लिए व्यक्तिगत स्तर पर बधाई देता हूँ और उनके सम्मान में अपना सर झुकाता हूँ. यह निर्णय पढने योग्य है. यह हर प्रकार से न्याय की विजय की दास्तान है. विधिक दृष्टि से यह घटना रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर की श्रेणी में भी नहीं दीखता है और आजीवन कारावास इस हेतु विधिक दृष्टि से पूर्णतया सही सजा दिखती है.

आरुषि काण्ड के निर्णय को पढने से साफ़ दिख जाता है कि बचाव पक्ष के वकील श्री तनवीर अहमद मीर ने बहुत लगन और ईमानदारी से अपना काम किया और अपनी पूरी कोशिश की पर जैसा कोर्ट ने कहा-“अभियोजन ने इतने सारे पुख्ता और ठोस सबूत रख दिए जिससे समस्त मानवीय सीमाओं के अधीन आरोपीगण का गुनाह सिद्ध हो गया.”

मैंने और पत्नी नूतन ने कल अध्यक्ष, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नयी दिल्ली को इस कांड में इन तीन गरीब को अवांछनीय तेजी दिखाते हुए गिरफ्तार करने के सम्बन्ध में उन्हें पर्याप्त मुआवजा दिये जाने हेतु याचिका प्रस्तुत की किया था. याचिका में मुख्य अभियुक्तों को बचाने के लिए इस प्रकार अकारण गिरफ़्तारी करने वाले सभी सम्बंधित सीबीआई अधिकारियों की आपराधिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी तय किये जाने की भी प्रार्थना की गयी थी.

हमने ये प्रार्थनाएं सुप्रीम कोर्ट द्वारा जोगिन्दर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार तथा नीलबती बेहेरा बनाम उड़ीसा राज्य में दिए निर्णयों के आधार पर की  हैं. याचिका में कहा गया है कि आरुषि कांड में सीबीआई ने विवेचना ग्रहण करने के 13 दिनों में ही ये गिरफ्तारियां शुरू कर दी जिन्हें साक्ष्यों के अभाव सितम्बर में जमानत देनी पड़ी थी.

आज आरुषि काण्ड के विस्तृत निर्णय में अंकित पाया-“ तफ्तीश पूरी करने के बाद श्री कौल इस निष्कर्ष पर पहुँच गए थे कि यह हत्याएं इन्ही आरोपी व्यक्ति (श्री और श्रीमती तलवार) ने की है, कृष्णा, राजकुमार और विजय मंडल ने नहीं. लेकिन सीबीआई के सुपर-स्लुथ (अर्थात कुछ उच्च-पदस्थ अधिकारी) के हस्तक्षेप से इस सम्बन्ध में श्री कॉल द्वारा न्यायालय में अंतिम रिपोर्ट प्रेषित कर दिया गया.” अतः सवाल यह उठता है कि ये कौन से सीबीआई के सुपर-स्लुथ थे और उन्होंने ऐसा क्यों किया? सवाल यह भी कि उन तीन गरीब नेपालियों श्रीयुत कृष्णा, राजकुमार और विजय मंडल को न्याय कब मिलेगा?

हमारी प्रार्थना इन्ही दोनों प्रश्नों का उत्तर पाने के सम्बन्ध में है. नूतन ने पूर्व में यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में उठाया था जहां उन्हें इलाहाबाद बेंच जाने की सलाह दी गयी थी.

अमिताभ ठाकुर
आईपीएस
उत्तर प्रदेश

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