आरुषि बेटी की जगह बेटा होती तो जिंदा रहती

Amitabh Thakur : आरुषि कांड- निर्णय ऐतिहासिक, स्वागत योग्य… मैं विधिक रूप से सीबीआई कोर्ट द्वारा आरुषि कांड में दिए निर्णय को ऐतिहासिक और स्वागत-योग्य मानता हूँ क्योंकि जिस प्रकार से घटना घटी थी, जो साक्ष्य शुरू से ही आ रहे थे, जिस प्रकार से स्वयं सीबीआई का पहला क्लोजर रिपोर्ट ही कह रहा था कि साक्ष्यों के आधार पर तलवार दंपत्ति के अतिरिक्त किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा यह घटना कारित किया जाना पूरी तरफ असंभव था, उससे इस सजा द्वारा आरुषि और हेमराज के प्रति न्याय हुआ. विधिक दृष्टि से यह घटना रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर की श्रेणी में भी नहीं दीखता है और आजीवन कारावास इस हेतु विधिक दृष्टि से पूर्णतया सही सजा दिखती है. इसके अलावा इस मामले में तीन गरीब और असहाय नेपाली लोगों, कृष्णा, राजकुमार और विजय मंडल के प्रति न्याय होना भी उतना ही जरूरी दिखता है.

Vikas Mishra : एक सत्यकथा है- हमारी रिश्तेदारी का गांव है। पुरानी जमींदारी रही है, अभी भी वहां दबदबा है। पट्टीदारी में एक लड़का एक कहार (बर्तन मांजने वाले) के घर में घुस गया। उसकी लड़की को दबोच लिया। लड़की ने शोर मचाया तो उसकी मां पहुंच गई। साहबजादे को हाथ पकड़कर खींचने लगी, लेकिन वो छोड़ने को तैयार नहीं। शोर बढ़ा तो साहबजादे को पकड़कर प्रधानजी के पास ले गए। प्रधानजी को रामकहानी सुनाई गई। उन्होंने डपटकर उस लड़के से कहा- ये क्या सुन रहा हूं, तुमने ऐसा किया है। लड़के ने कान पकड़ा और बोला-काका गलती हो गई। प्रधानजी बोले- लड़के ने गलती मान ली, अब क्या। कहार के घर वाले बोले- प्रधानजी इंसाफ..? प्रधानजी बोले- तो क्या फांसी चढ़ा दें, कान तो पकड़ लिया…। आरुषि हत्याकांड एक बार फिर सुर्खियों में आया तो दो दशक पुरानी ये कहानी याद आ गई। काश आरुषि बेटी की जगह बेटा होती तो शायद जिंदा रहती।

Sanjaya Kumar Singh : आरुषि हेमराज मामले में आए ताजे फैसले के बारे में मेरा मानना है कि इस बारे में हमलोग जो कुछ जानते हैं वह मीडिया और अखबारों के जरिए ही हम तक पहुंचाया गया है। राजेश और नुपूर ने जो कहा वह हालांकि उपलब्ध है पर हममें से ज्यादातर लोगों ने उसे नहीं देखा है। मीडिया को जांच एजेंसियां चुनी हुई चीजें/जानकारियां लीक करती हैं। कई बार ऐसा एक लक्ष्य के तहत किया जाता है (किया जा सकता है)। मीडिया का पूर्वग्रह अपनी जगह है। इसलिए हम जो जानते हैं उसका कोई मतलब नहीं है। अदालत के फैसले को चूंकि ऊपरी अदालतों में चुनौती दी जा सकती है इसलिए इसके आधार पर भी कोई राय नहीं बनाई जानी चाहिए। जहां तक ऑनर किलिंग की बात है, हत्या कर मुकर जाना या छिपाने की पूरी कोशिश करना – ऑनर किलिंग कैसे हो सकता है। ये तो तभी होगा जब कहा जाए कि हां मैंने इसलिए मारा, चढ़ा दो फांसी पर। इसके बिना अपनी छीछालेदर कराने के लिए ऑनर किलिंग – मुझे बात नहीं जम रही है।

Sudhir Mishra : यह उम्रकैद नहीं मौत की सजा ही है। तिल तिल कर एड़िया रगड़ रगड़कर। सिर्फ जिस्मानी नहीं, जहनी तौर पर भी। हर वक्त हर पल, तलवार दम्पति उस अभागे पल को याद करेंगे जब वह अपने गुस्से पर काबू नहीं पा पाए। उन बातों को याद करेंगे जिन्होंने उन्हें ऐसा करने को मजबूर किया और बार बार यह सोचेंगे कि क्या उसमें आरुषि की गलती थी या फिर उनके दिए संस्कारों की। खैर अब हाईकोर्ट में होने वाली जिरह व फैसले का इंतजार कीजिए क्योंकि अभी आरुषि-हेमराज हत्याकांड का यह मामला आगे भी जाएगा-

Samar Anarya : जज साहब मानते हैं कि तलवार साहब ने पहले तो बड़े ठंडे दिमाग से अपनी बेटी और नौकर की हत्या की और फिर उससे भी ठंडे दिमाग से सबूत मिटाए. पर फिर भी उन्हें यह मामला दुर्लभतम में दुर्लभ (rarest of the rare) नहीं लगा. हर बात पर आहत हो जाने वाली मध्यवर्गीय भावनाएं भी इस बार आहत नहीं हुईं, किसी ने उनके लिए फाँसी नहीं मांगी. जानते हैं क्यों? क्योंकि इस देश में फाँसी की सजा में 100 प्रतिशत आरक्षण है. दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक और कुछ बहुत गम्भीर मामलों में गरीब. हाँ, मैं सिर्फ इसी वजह से फाँसी विरोधी नहीं हूँ.

Balendu Swami : मान लीजिये आरुषि की जगह तलवार दम्पति का लड़का होता और माँ बाप के द्वारा नौकरानी के साथ सेक्स करता हुआ देख लिया गया होता! क्या सोचते हैं आप क्या उसका अंजाम भी आरुषि के जैसा ही होता? … दिल्ली के दामिनी रेप केस में अभियुक्तों का वकील जो टीवी पर खुलेआम कह रहा था कि मेरी बेटी यदि रात को किसी लड़के के साथ घूमे तो उसे जिन्दा जला दुंगा! वो और खाप पंचायत का पञ्च फिर खुलेआम टीवी पर कहता है कि तलवार दम्पति ने आरुषि का क़त्ल करके बिलकुल ठीक किया. कुछ पोस्ट मैंने यहाँ भी देखीं जिनमें तलवार दम्पति से सहानुभूति ही नहीं है बल्कि यह भी पूछा जा रहा है कि भला ऐसी स्तिथी में वो और क्या करते! शर्म आती है ऐसे समाज का हिस्सा होते हुए! बहुत सारे तलवार हमारे आजूबाजू हैं! अरे सेक्स तो छोड़ दो, मैं कितने ही परिवारों को जानता हूँ, जिन्होंने प्रेम-विवाह करने पर माँ-बाप और परिवार वालों ने अपने बच्चों की आरुषि की तरह दैहिक हत्या तो नहीं करी परन्तु पारिवारिक और सामजिक हत्या कर दी! मतलब उन जवान बच्चों को घर से बेदखल कर दिया और सारे सम्बन्ध तोड़ लिए! उनसे कहा कि तू तो मर गई हमारे लिए! हमारे स्टाफ में तीन लोग इस स्तिथी को भुगत रहे हैं. केवल कानून और जेल जाने के डर से वो मार नहीं पाए, परन्तु कानून के फंदे से बाहर और सामजिक अनुमति प्राप्त हत्या तो कर ही दी. ये तो आपके देश की महान संस्कृति है, गर्व करो इस पर जहाँ प्रेम और सेक्स करना गुनाह है और शान के लिए यहाँ क़त्ल कर दिए जाते हैं. लगभग रोज ही अख़बारों में ऑनर किलिंग की घटनाएँ पढ़ने में आती हैं. नेशनल क्राइम ब्यूरो कहता है कि साल में 1000 से जादा ऑनर किलिंग देश में होती है, और ये तो रिपोर्टेड है जबकि गाँव देहात में अधिकाँश इस तरह के अपराध की कोई रिपोर्ट ही नहीं होती.

Kashif Husain : बस कुछ देर के लिए तलवार दम्पत्ति का दिमाग पे से कंट्रोल हटा होगा जूनून छा गया होगा इसके नतीजे में दो जान फ़ौरन खत्म हो गयी पिछले पांच साल से खुद दोनों ने दिमागी सकून खोया होगा सो अलग ! अब इस पड़ाव में उम्र कैद की सज़ा मतलब ज़िन्दगी खत्म ! दिमाग से कंट्रोल हटना कितना भारी पड़ा ये उन दोनों को ज़िन्दगी भर सताने के लिए काफी है ! इसीलिए कहा जाता है दिमाग पे कंट्रोल बने रहना बहुत ज़रूरी होता है !!

उपरोक्त टिप्पणियों का संकलन फेसबुक से किया गया है.

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