आरोप लगाने वाली युवती का कहना है कि कथित घटना के वक्त के सबूत (वस्त्र) धुल चुके हैं

नई दिल्ली। हिंदू और इसलामी कट्टरवाद के खिलाफ जूझने वाले जाने-माने कार्यकर्ता और लेखक खुर्शीद अनवर ने बुधवार सुबह आत्महत्या कर ली। वे 55 वर्ष के थे। खुर्शीद ने अपने घर की छत से छलांग लगा ली। इसके बाद उन्हें एम्स ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। खुर्शीद एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के निदेशक थे। एक अन्य एनजीओ कार्यकर्ता ने आरोप लगाया था कि खुर्शीद ने अपने वसंत कुंज स्थित आवास पर उनके साथ बलात्कार किया।

आरोप था कि पिछले साल दिल्ली गैंगरेप के बाद इंडिया गेट पर हुए विरोध प्रदर्शन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली युवती को उन्होंने अपने घर रात के खाने पर बुलाया था। यह आरोप भी था कि खुर्शीद ने उनकी शराब में कुछ मिला दिया था, जिसके कारण उसे वहीं रुकना पड़ा। युवती के मुताबिक, जब उसने अपने सहयोगियों को बताया तो उन्होंने उसकी कोई मदद नहीं की। युवती के अनुसार उससे कहा गया कि ‘एफआइआर करेंगे तो सालोंसाल लग जाएंगे।’

एक्टिविस्ट युवती ने बलात्कार का आरोप पुलिस के समक्ष नहीं लगाया। इस वजह से आरोप के संबंध में कोई मेडिकल जांच नहीं हुई। कथित घटना कोई तीन महीने पुरानी बताई जाती है। अब तक कोई अन्य साक्ष्य भी सामने नहीं आए हैं। लेकिन एक सीडी में निजी तौर पर वितरित आरोपों के आधार पर सोशल मीडिया में खुर्शीद अनवर के खिलाफ कटु अभियान चला। इस पर खुर्शीद ने तीन लोगों के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। मंगलवार को कुछ टीवी चैनलों पर बलात्कार का आरोप जोर-शोर से उठने के बाद सोशल मीडिया में खुर्शीद अनवर के खिलाफ फिर कटु टिप्पणियों की झड़ी लग गई। उनके निकट के मित्रों का कहना है कि यह वार वे सहन नहीं कर पाए।

मीडिया में यह मामला सामने आने के बाद महिला आयोग की शिकायत पर वसंत कुंज (उत्तरी) थाने में आइपीसी की धारा 376 और 328 के तहत मंगलवार को एफआइआर दर्ज की गई। हालांकि देर शाम तक पुलिस ने इसकी पुष्टि नहीं की कि क्या बलात्कार की एफआइआर दर्ज कर ली गई है। इस समूचे प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए बुद्धिजीवियों ने मीडिया और सोशल मीडिया ट्रायल पर गहरी चिंता जताई है। उनका मानना है कि कोई दोषी है या नहीं इसका फैसला कानून को करने देने से पहले समाज अपनी ओर से फैसला देने की जो हड़बड़ी कर रहा है, वह गंभीर चिंता का मामला है।

हिंदी के वरिष्ठ आलोचक और संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य रहे पुरुषोत्तम अग्रवाल का कहना है कि मीडिया और सोशल मीडिया ट्रायल की जो प्रवृत्ति बनी है, वह गंभीर चिंता का मामला है। इस मामले में तो खुर्शीद के मित्रों-परिचितों का निष्कर्ष पर पहुंच जाना ज्यादा दुखद है। अग्रवाल ने कहा कि एक आरोप लगा। उसकी जांच आदि की एक कानूनी प्रक्रिया है। अगर व्यक्ति दोषी है तो कानून अपने नतीजे पर पहुंचेगा और अगर वह दोषी है तो उसे सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ खुर्शीद का मामला नहीं है। मुझे लगता है कि समाज में फैसलों पर पहुंचने की बहुत हड़बड़ी है। लोगों में धैर्य नहीं है और भारी गुस्सा है। जहां तक खुर्शीद का मामला है, वे तो डिप्रेशन में थे और दबाव नहीं झेल पाए।

अग्रवाल ने कहा कि कोई दोषी है या नहीं यह फैसला कानून को करने दें और जल्दी न करें। यह तो लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदल देने जैसी स्थिति हो गई है। ऐसे मामलों में क्या कानून में कुछ खामी रह गई है, यह पूछे जाने पर अग्रवाल ने कहा- हो सकता है। पर मैं तो कानून का जानकार नहीं हूं, इसलिए इस बारे में कुछ नहीं कह सकता।

आलोचक प्रो अपूर्वानंद ने कहा कि एक तरह से खुर्शीद अनवर का शिकार सोशल मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में सक्रिय उन लोगों ने किया है, जो इस मामले में लगे हुए थे। उन्होंने कहा कि दोनों ने एकदम गैरजिम्मेदाराना तरीके से, बल्कि कहूंगा कि आपराधिक तरीके से काम किया, जिसमें किसी व्यक्ति को धकेल कर ऐसी जगह पहुंचा दिया जाता है कि उसके पास आत्महत्या के अलावा कोई और चारा न रह जाए।

उन्होंने कहा कि हर अपराध के लिए एक सजा है, सजा तक पहुंचने की एक प्रक्रिया है, जिसका अर्थ है कि हम उस प्रक्रिया का पालन करें। सारा काम ‘एक्टिविस्ट’ और मीडिया करे, यानी वही आरोप लगाए , वही मुकदमा चलाए और वही फैसला सुना दे, यह नहीं हो सकता। लेकिन भारत में पिछले दो वर्षों में यह प्रवृत्ति बढ़ी है। यह खूंखार भीड़ की वृत्ति है, जिसे लगातार उकसाया जा रहा है और जिसकी भाषा सजा सुनाने और दंड देने के अलावा और कुछ नहीं है।

अपूर्वानंद ने कहा,  कानून बना है तो उस कानून में जिस पर आरोप लगा है उसे भी न्याय प्रक्रिया में अपनी सफाई और सुरक्षा के पूरे अवसर दिए जाने चाहिए। उसे सार्वजनिक रूप से पहले ही मारा नहीं जा सकता या उसका चरित्र हनन नहीं किया जा सकता। इस क्रूरता में हम एक पल के लिए भी नहीं सोचते। उन्होंने कहा कि खुर्शीद को आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलना चाहिए।

अनवर के करीबी समर अनार्य का कहना है कि मंगलवार रात ही खुर्शीद से उनकी बात हुई थी। वे इस बात से बेहद परेशान थे कि आरोप लगाने वाली युवती का कहना है कि कथित घटना के वक्त के सबूत (वस्त्र) धुल चुके हैं। अब उनके (खुर्शीद के) सामने संकट यह है कि वे अपने आप को निर्दोष किस आधार पर साबित कर पाएंगे?

खुर्शीद के भाई अली जावेद, जो प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव भी हैं, का कहना है कि कुछ लोगों ने झूठा आरोप लगाकर खुद ही मुकदमा चलाया और फैसला भी कर दिया। झूठ के आधार पर सोशल मीडिया में और टीवी पर भी यह सब होता रहा, जबकि लड़की की तरफ से पुलिस को कभी शिकायत नहीं की गई थी। यह आपराधिक कृत्य है। जिसके खिलाफ आरोप लगा रहे हैं, उसके लिए अदालत है या नहीं? खुर्शीद अनवर इलाहाबाद से थे। उन्होंने उच्च शिक्षा दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से प्राप्त की। पत्नी से कुछ समय पहले उनका अलगाव हो गया था। एक बेटा है जो ‘एशियन एज’ में पत्रकार है।

जनसत्ता अखबार में प्रकाशित खबर.

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