आर्यन टीवी की तरफ से बच्चों की मौत पर बिहार के मुख्यमंत्री के नाम खुला पत्र

बिहार में एक बीमारी डेढ़ सौ से ज़्यादा बच्चों की जान ले चुका है, जबकि सरकार को अभी तक यही नहीं पता कि ये बीमारी कौन सी है। कभी वो इसे इनसेफलाइटिस कहती है, कभी मेनिन्जाइटिस, कभी एक्यूट इनसेफलोपैथी सिंड्रोम, कभी अज्ञात बीमारी। ये हाल तब है जबकि ये बीमारी पिछले कई साल से ग़रीब परिवारों में पैदा हुए छोटे-छोटे बच्चों को लील रही है। आर्यन टीवी ने इस बीमारी से बच्चों को बचाने के लिए सरकार की नींद तोड़ने के मकसद से पिछले कई दिनों से मुहिम छेड़ रखी है। सरकार में बैठे अलग-अलग लोगों की संवेदना में कुछ कमी महसूस कर आखिरकार हमने कल यानी 12 जून 2012 को मुख्यमंत्री के नाम खुला पत्र भी अपने चैनल पर जारी किया।

इस पत्र की कॉपी हम आपको भेज रहे हैं। इसे यू-ट्यूब पर भी डाल दिया गया है।

इसका लिंक है-  http://www.youtube.com/watch?v=kdQ0dUpQFIA

ज़रूरत इस बात की है कि जो जहां बैठे हुए हैं, वो वहीं से इन बच्चों को बचाने के लिए पुरज़ोर आवाज़ें उठाएं। आखिर हमारे ये बच्चे जो आज सरकारी संवेदनहीनता की वजह से असमय काल के गाल में समाते जा रहे हैं, उन्हीं में से कल कोई लाल बहादुर शास्त्री बनने वाला था।

शुक्रिया
अभिरंजन कुमार,
संपादक, आर्यन टीवी


मुख्यमंत्री के नाम खुला पत्र

आदरणीय मुख्यमंत्री जी, आपका समय कीमती है, इसलिए  सीधा मुद्दे की बात करते हैं। बिहार मे इन दिनों एक बीमारी फैली हुई है, जिससे हम सबकी संवेदना हिली हुई है। शायद आप उस तरह से नहीं हिले होंगे, क्योंकि विधानसभा की 243 सीटों में से 210 आपके पास हैं और बिहार में जैसे राजनीतिक हालात हैं, उसमें आप अगले कई साल तक सेफ लगते हैं। बहरहाल, इस बीमारी को आपकी सरकार से जुड़ा हर महापुरुष अपने-अपने तरीके से परिभाषित कर रहा है। कोई इसे इनसेफलाइटिस मानता है, कोई नहीं मानता है। कोई इसे अज्ञात बीमारी कहकर अपनी मासूमियत दर्शा रहा है, तो कोई इसे एक्यूट इनसेफलोपैथी सिंड्रोम जैसा वैज्ञानिक नाम देकर अपने को ज्ञानवान साबित कर रहा है।

कुछ महापुरुष, जो प्रशासन  चलाने से ज़्यादा रस अनुप्रास अलंकार में लेते हैं, उनकी दलील है कि यह बीमारी गंदगी, गरीबी और गर्मी की वजह से फैली है, तो कुछ स्वनामधन्य कहते हैं कि यह बीमारी कुपोषित बच्चों में ज्यादा हो रही है, क्योंकि उनमें रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। यह आपकी सरकार की मेहरबानी है कि हम साधारण लोगों को एक साथ ज्ञान-विज्ञान की इतनी बातें सुनने-समझने को मिल रही हैं, पर दुख इस बात का है कि ज्ञान-विज्ञान की ये सारी बातें हमारे बच्चों की जान नहीं बचा पा रहीं।

आपके सुशासन में अकेला मुज़फ्फरपुर बच्चों की मौत का अर्द्धशतक लगाकर नाबाद है और अभी-अभी अपने सौ साल का नीला-नीला जश्न मनाने वाले आपके गौरवशाली बिहार का स्कोर भी सौ को पार कर चुका है। जैसा कि यह हिन्दुस्तान  की तमाम सरकारों की जीन  में होता है, वो किसी मुद्दे पर अपनी कमी स्वीकार नहीं करतीं, आप भी अपनी सरकार की कोशिशों में कोई चूक मानेंगे, ऐसा हमें नहीं लगता। हमें पता है कि इस साल आपकी सरकार अब बयानबाज़ी से ज़्यादा कुछ ख़ास नहीं करने वाली।

और अगर करेगी भी, तो उसका कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होने वाला, क्योंकि आप अभी पानी लाने का एलान ही कर रहे हैं और झोपड़ी जलकर ख़ाक हो चुकी है। वैसे भी, अब जब तक आप पानी लेकर आएंगे, उससे पहले बारिश हो जाएगी और लोगों को आपके पानी की ज़रूरत नहीं रहेगी। बस मलाल ये है कि सात साल से आपकी सरकार है और आपको पता है कि बिहार के कुछ इलाकों में इस मौसम में हर साल ये बीमारी हमारे बच्चों को हमसे छीनने आया करती है। लेकिन आज तक आपने इससे कुछ सबक नहीं लिया।

इस साल तो हमारे बच्चों की किस्मत में मरना लिखा है, क्या अगले साल के लिए हम उम्मीद करें कि आपके राज में छोटे-छोटे मासूम बच्चों के जीने के अधिकार का हनन नहीं होगा? अगर हां, तो ज़रूरत इस बात की है कि आप तत्काल…

-इस बीमारी की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों की टीम गठित करें, जो अगले साल बीमारी के आक्रमण से पहले ही हरकत में आ जाए।

-एक मेडिकल सर्विलेंस यूनिट बनाएं, जो बीमारियों का मौसम शुरू होने से पहले ही इस बीमारी के असर वाले इलाकों में नियमित रूप से दौरे करे और बच्चों की जांच करे।

-जैपनीज इनसेफलाइटिस के विरुद्ध उसी तरह का सघन टीकाकरण अभियान छेड़ें, जैसा पोलियो-उन्मूलन के लिए पूरे देश में छेड़ा गया।

-इस बीमारी की पहचान के लिए अस्पतालों में हर तरह की ज़रूरी जांच के इंतजाम करें।

-छोटे अस्पतालों के डॉक्टरों को भी इसके इलाज के लिए ट्रेनिंग दिलवाएं।

-बड़े अस्पतालों में ऐसे इंतज़ाम करें कि अगर ज्यादा संख्या में बच्चे आ जाएं, तो कम से कम आगे उन्हें मौत न मिले।

-एक वायरस कल्चर लैब की स्थापना करें, ताकि अगले साल इस बीमारी से जुड़े वायरस की पहचान करने में ऐसी जानलेवा देरी न हो।

-बीमारी के असर वाले इलाकों में नियमित साफ-सफाई, डीडीटी-छिड़काव और निःशुल्क मच्छरदानी वितरण का इंतजाम कराएं।

-प्रभावित इलाकों में गरीबों को पीने का साफ़ पानी मुहैया कराएं।

-कुपोषण और गरीबी को दूर करने के लिए ईमानदारी से अभियान छेड़ें, क्योंकि ग़रीबी, गंदगी और कुपोषण की थ्योरी सुन-सुनकर जनता अब लंबे समय तक धैर्य नहीं रखने वाली।

-भ्रष्टाचार और लालफीताशाही को ख़त्म करने के लिए कदम उठाएं, क्योंकि राज्य की सारी समस्याओं की जड़ में यही हैं।

-अपने विधायकों से भी पूछें कि जनता गरीब की गरीब है और तुम लोग कैसे रातों-रात बिल्डिंगें पीटते चले जा रहे हो?

मुख्यमंत्री जी, आपके समर्थक आपको सुशासन बाबू कहते हैं। विरोधी हम भी आपके नहीं, पर कबीरदास के शब्दों में, आप हमें ऐसा निंदक ही मानकर चलें, जिसे नियरे राखने से लोग कई सारी ग़लतियों से बच जाते हैं। आपको याद हो न हो, पर जब आप बिहार शताब्दी का जश्न मना रहे थे, तब भी हमने कहा था कि “जिस वक्त आप अपनी राजधानी में नीली रोशनी देखना चाहते हैं, ठीक उसी वक्त हम अपनी बिटिया की आंखों में नीली चमक देखना चाहते हैं।”

(यू-ट्यूब लिंक- http://www.youtube.com/watch?v=Eb4CkFwNCMQ )

लेकिन वह चमक तो आप हमारी  बिटिया की आंखों में भर नहीं सके, उल्टे उनमें से जो आपको प्यारी नहीं हो सकीं, वो ईश्वर को प्यारी हो चुकी हैं। जिस वक्त आप अपनी राजधानी को नीली रोशनी में सजाने का उपक्रम कर रहे थे, अगर उसी वक्त उसी पैसे से आपने इस बीमारी से प्रभावित इलाकों पर नज़र डाल ली होती, तो आज हमारे इतने बच्चे इसकी भेंट न चढ़े होते। मुख्यमंत्री जी, आज आपकी सरकार कुपोषण की थ्योरी पेश कर रही है, लेकिन तब भी हमने सवाल किया था कि हमारे कुपोषित शरीर में तथाकथित स्वाभिमान का इंजेक्शन लगाकर आप क्या हासिल कर लेंगे?

अब बताइए कि तब तो आपने हमारे बच्चों को कुपोषण से बचाया नहीं, अब हम आपके पैदा किए हुए उस तथाकथित स्वाभिमान को किस झोपड़ी के दरवाज़े पर सजा दें या किस मरघट में पताका बनाकर फहरा दें?

मुख्यमंत्री जी, क्या हम उम्मीद करें कि अपने जिगर के टुकड़ों  के मासूम चेहरों पर मौत  का जो तांडव हमने इस बार  देखा, अपनी छाती पीटती, चीत्कार  करती मांओं-बहनों की जो हृदय-विदारक तस्वीरें हमने इस बार देखीं, अगले साल दोबारा देखने को नहीं मिलेंगी?

आर्यन टीवी के समस्त पत्रकारों की तरफ़ से

अभिरंजन कुमार
संपादक
आर्यन टीवी

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