आलोक मेहता ने साबित किया वे आधुनिक युग के असली संपादक हैं, बधाई

नई दुनिया का सूर्यास्त हो गया… मुझ जैसे पत्रकारों का इससे ज्यादा मतलब नहीं है… यह सब धनकुबेरों के पैसे का खेल है… क्योंकि अब जूता फैक्ट्री खोलने और अखबार की फैक्ट्री खोलने में कोई फर्क नहीं है और यह दोनों धंधा पूंजीपतियों के लिए एक ही बात हो गयी है. खैर… जब से नई दुनिया के दिल्ली संस्करण के बंद होने की खबरें बाजार में आई तभी से मुझे इस बात की चिंता थी कि देशभर के उन हजारों पत्रकारों में अब बंद होने वाले नईदुनिया के पत्रकार व गैर पत्रकार भी जुड़ जायेंगे, जिन्हें अब रसोई के बजट की चिंता घेर लेगी.

मेरी चिंता तब और बढ़ गयी जब मेरे घर आये 29 मार्च के नई दुनिया अखबार के एक कोने में अखबार के संस्करण को स्थगित करने की छोटी सी खबर आई… पर 30 मार्च की सुबह मैं बेहद रोमांचित हो गया, जब मेरे हाकर ने नई दुनिया की जगह मेरे घर में नेशनल दुनिया की कापी डाली… एक दम नये कलेवर में…. प्रधान सम्पादक के नाम की जगह आलोक मेहता का नाम देखा व उनका छोटा सा सम्पादकीय भी… जिसमें पुरानी टीम से ही नया अखबार निकालने की बात कही गई थी… पढ़कर संतोष मिला कि अब कम से कम बंद हुए नई दुनिया के पत्रकारों को रसोई की चिंता नहीं सतायेगी.

आज जब सड़क पर जूते घिसने वाला एक पत्रकार सम्पादक की कुर्सी पर बैठते ही अपने कुछ हजार के इंक्रीमेंट के लिए अपने साथियों गला रेतने के लिए छूरी घूमता हो ऐसे में आलोक जी द्वारा अपने लोगों की नौकरी न जाने देना और एक नया अखबार ही निकाल देना बेहद सराहनीय काम है. इस परिप्रेक्ष्‍य में मैं अपने अनुभव यहाँ बताना भी जरूरी समझता हूँ. मैंने  हिन्दुस्तान में 23 साल तक पत्रकारिता की और मुझे कई संपादकों के साथ काम करने का मौक़ा मिला… जिसमें आलोक मेहता भी एक थे. अंतिम समय में तो एक अतिउत्साही सम्पादक ने तो हिन्दुस्तान के पत्रकारों का ऐसा कत्लेआम मचाया कि लोग दंग रह गए.

इसने तो एक ऐसी होनहार महिला पत्रकार की नौकरी खाई, जो गर्ववती थी और कुछ दिन का अवकाश चाहती थी…. इस होनहार सम्पादक के बारे में (अब सड़क पर है) बता दूं कि इसे आलोक जी ही हिन्दुस्तान में छोटे से पद शायद वरिष्ठ उप सम्पादक के लिए लाये थे… आलोक जी बदले तो अजय उपाध्याय जी सम्पादक बनकर आये… तब तक हिन्दुस्तान टाईम्स  एम्प्लाईज यूनियन बेहद मजबूत यूनियन मानी जाती थी. मैं तब यूनियन में हिन्दुस्तान से प्रतिनिधि था. हम कुछ लोग अजय जी के पास बैठे थे… बेहद शालीन मिजाज के अजय जी बोले…. ये सज्जन क्या करते हैं… पता नहीं… इनकी शायद जरूरत नहीं है. इस पर मैंने कहा – सर रहने दीजिये…. बिरला जी की धर्मशाला में एक और जीव पल जाए तो क्या बुरा है, और फिर एक शरीफ पहाड़ी आपका क्या बिगाड़ लेगा??

खैर, इस सज्जन की नौकरी जारी रही… अजय जी के जाने व मृणाल पांडे के प्रधान सम्पादक बनते ही इस महाशय ने ऐसी कुलाचे भरी कि… असली सम्पादक बन बैठा… फिर तो हिन्दुस्तान पत्रकारों का कत्लगाह बन गया… तब एक चर्चा आम होती थी कि इस सज्जन को यदि ठीक से नमस्ते नहीं किया तो समझो नौकरी गयी!! जब हिन्दुस्तान में ऐसे हालात थे तब यहाँ से दो सौ गज की दूरी कनाट प्लेस से नई दुनिया का प्रकाशन शुरू हुआ… और हिन्दुतान के हमारे ऐसे काफी वरिष्ठ साथियों ने आलोक जी के नेतृत्व में नई दुनिया ज्वाइन कर ली… जिन पर हिन्दुस्तान के इस सम्पादक का चंगेजखानी फरसा बस चलने ही वाला था. और मेरा मेरे हिन्दुस्तानी महान सम्पादक ने बेरिया-विस्तार शिमला के लिए समेट दिया.

जितने लोग आलोक जी के साथ गए… वे हिन्दुस्तान के दिनों में उनके ख़ास थे… मैंने भी जाने का प्रयास किया पर मेरे हिन्दुस्तान के दिनों में आलोक जी के साथ हुए यूनियनी नोंक-झोंक आड़े आई. खैर, इस महान सम्पादक का जिक्र प्रशंगवस आ गया. नहीं तो ये बेचारे तो शायद याद भी नहीं आते!! नेशनल दुनिया… यानी नये अखबार के पीछे कौन है… यह ज्यादा मायने नहीं रखता… पर आलोक जी ने एक नया उदारहण पेश किया कि जब एक पूंजीपति अपनी दुकान बंदकर उसमें काम करने वाले गरीब मजदूरों को अनाथ छोड़ रहा था, ऐसे में मजदूरों के मुखिया ने वहीं से नई दुकान शुरू कर सराहनीय काम किया है. आलोक जी को इसके लिए बधाई और आपको मेरे रूप में आपके अखबार का एक नियमित पाठक मिल गया… क्योंकि आपने देश की चिंता करने वाले कुछ पत्रकारों को रसोई की चिंता से मुक्त किया.

लेखक विजेंद्र रावत वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

 

 

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