(आलोक स्मृति-एक) : राहुल देव के खिलाफ अविनाश ने निकाली फेसबुक पर भड़ास

प्रख्यात पत्रकार आलोक तोमर की दूसरी पुण्यतिथि पर 'मीडिया की भाषा' विषय पर विमर्श का आयोजन कल गांधी शांति प्रतिष्ठान में किया गया था. इस विमर्श का संचालन वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने किया. आयोजन में वाकई विमर्श हुआ. हर तरह के पत्रकारों ने अपनी बात रखी. एनडीटीवी में काम कर चुके और मोहल्ला ब्लाग चलाने वाले अविनाश भी कार्यक्रम में शरीक हुए पर उन्होंने मंच से अपनी बात नहीं रखी. उन्होंने फेसबुक के जरिए प्रोग्राम व विमर्श को लेकर अपने नजरिए को बयान किया है. अविनाश ने राहुल देव पर तीखी टिप्पणी की है. अविनाश के एफबी वॉल से उनकी बात को कापी करके यहां प्रकाशित किया जा रहा है. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

मंच से अपनी बात रखते राहुल देव. कार्यक्रम से जल्दी जाने के लिए सुप्रिया राय से अनुमति मांगते दीपक चौरसिया.
मंच से अपनी बात रखते राहुल देव. कार्यक्रम से जल्दी जाने के लिए सुप्रिया राय से अनुमति मांगते दीपक चौरसिया.

Avinash Das : पत्रकार "आलोक तोमर की याद" कार्यक्रम में राहुल देव भाषा पर लगभग वही बातें कर रहे हैं, जो बातें प्राथमिक पाठशाला में हिंदी का मास्टर करता है। चलन से गायब हो चुके शब्दों को लेकर अप्रासंगिक आग्रह से भरे हुए राहुल जी यह मूल बात भूल रहे हैं कि कोई भी भाषा बहती हुई नदी की तरह आगे की ओर जाती है। शब्द वही पुराने पड़ते हैं, जो सहज रूप से संप्रेषणीय नहीं होते। मीडिया की आज की भाषा इसलिए असरदार नहीं है, क्योंकि आज के पत्रकार भाषा की पृष्ठभूमि से नहीं आते, न ही उनके संपादकीय आका। आलोक तोमर की भाषा इसलिए बची रही, क्योंकि उनको प्रभाष जोशी की छतरी मिल गयी। आज किसकी छतरी किसके पास है, ये बताइए? वैसे भी किसी भाषा का बचना या मरना इस बात पर निर्भर करता है कि समाज के बीच उसकी जगह और उसका सम्मान कितना है। भाषा विद्वानों की लफ्फाजियों से नहीं बचती…

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Avinash Das गैर भरोसेमंद और झोल से भरी हुई पत्रकारिता के इस दौर में एक अच्छी और व्याकरणनिष्ठ भाषा बरत कर कोई भी क्या उखाड़ लेगा?

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Avinash Das : अगर आप अच्छी भाषा जानते हैं, तो आप अच्छी तमीज भी जानते हैं। कल "आलोक तोमर की याद" कार्यक्रम में अंग्रेजी के बरक्स हिंदी की दीन-हीनता का प्रलाप करते हुए राहुल देव यह शिष्टाचार भी भूल गये कि वह सिर्फ संचालक हैं। डॉन की तरह माइक पर कब्जा किया और गिरोह की तरह गोष्ठी चलायी। लाभ लोभ वाले रिश्तों के बीच से वक्ता तय करते रहे और उनके लिए भी न्यूनतम समय सीमा की हेकड़ी दिखाते हुए खुद को इस अनुशासन से मुक्त रखा। शुरू से अंत तक गलत पटरी पर उन्होंने पूरी बहस रखी। भाषा विमर्श को विचार और लोक व्यवहार की तरफ जाने ही नहीं दिया। घुमाते रहे कि मीडिया में सुप्रीम कोर्ट को सर्वोच्च न्यायालय और स्कूल को विद्यालय क्यों नहीं लिखा जाता। उन्हें समझना चाहिए कि भ्रष्ट भाषा व्यक्ति के निजी ज्ञान से अधिक अपने समय की अभिव्यक्ति से जुड़ी सीमाओं को जाहिर करती है। राहुल देव को लंबे समय से समझने की कोशिश करते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यह व्यक्ति लोकतांत्रिक व्यवहार का नाटक करते हुए सामंती आग्रह के प्रति ज्यादा प्रतिबद्ध है। विचारशून्य तो है ही, भाषा को लेकर भी बहुत सतही समझ रखता है।

उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ कमेंट…

Santosh Kr. Pandey पहले इ बताइए कि ये राहुल देव कौन हैं ? हम कबहू इनका नाम नहीं सुने ! क्या हासिल किया है इन्होने ? मुझ अज्ञानी को बताया जाय !

Avinash Das संतोष जी, राहुल देव जी पहले जनसत्ता मुंबई के संपादक थे। फिर दिल्ली जनसत्ता के संपादक हुए। एसपी सिंह के बाद बहुत थोड़े दिनों के लिए आजतक के संपादक रहे। अभी पिछले कुछ सालों में ये सीएनईबी चैनल और आज समाज अखबार के संपादक रहे। इन दिनों सभा-सेमिनारों में भाषाई चिंता पर बोलते हैं।

Santosh Kr. Pandey अविनाश जी ! जन्सत्ता मेरे गृह स्थान फैजाबाद /अयोध्या में नहीं आता था , "आज " अखबार आता था लेकिन चलता नहीं था ,सीएनईबी चैनल भी नहीं आता था … फिर देश के बाहर चला आया और फिर बाहर तो ये सब आता ही नहीं ! इसलिए इनके बारे में जानने का मौका नहीं मिला ! रही बात आपकी लाभ लोभ वाली — तो हिन्दी का बेडा गर्क इसी वजह से है ! किसी को अगर बुरा लगता है तो मेरे ठेंगे से ! Avinash Das

Girijesh Vashistha सभी वक्ताओं ने मिलकर जितना समय लिया उससे ज्यादा अकेले संचालक महोदय खा गए. एक ही बात को १०० बार कहा. उन्हें यकीन ही नहीं हो कहो थ कि लोग समझ गए कि वो क्या, कहना चाहते हैं.

Niharika Neelkamal Arora unhe lagta hai ki wo bhi netaao ki tarah janta ko pratidin APRIL FOOL bnaane ka visheshadhikar rakhte hai..

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