(आलोक स्मृति-तीन) : घटिया कंटेंट के साथ भाषा भी घटिया ही रची जाएगी – मुकेश कुमार

Mukesh Kumar : alok tomar ji ki yaad me aaj media aur bhasha par jamkar charch hui..kuchh log vilap me lage hue the to kuchh ne alok ji ki ektarfa tasveer kheenchi….alok ji keval bhasha ke hi khiladi hote to unhe koi nahi puchhta….unke paas samjh, sarokar aur sahas tha isliye ve patrakarita aur bhasha dono ki zameen todne me safal rahe…Aaj bhi agar bhasha ko upar uthana hai to content ko upar uthana hoga kyonki ghatiya content ke saath bhash bhi ghatiya hi rachi jayegi….achchha evam gambheer content ayega to bhasha ke jankaro ko mahatva aur avasar dono milenge….

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Payal Chakravarty : तो क्या महज़ भाषा तक ही सीमित थे आलोक… मैं पत्रकारिता जगत का एक बहुत छोटा और गुमनाम चेहरा हूं। मीडिया जगत के दिग्गजों से ज्यादा से ज्यादा सीखने की और प्रेरणा लेने की कोशिश करती हूं। दुर्भाग्यवश आलोक जी की हस्ती के बारे में मुझे जब पता चला, तब वो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर थे, इसीलिए उनके मिलने का मौका नहीं मिला…लेकिन उनकी एक बात थी, जिसने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया था और वो था उनका निर्भीक और साहसी व्यक्तित्व..जीवन के अंतिम दिनों में भी उन्होंनें अपने इसी साहस को बरकरार रखा। उनके जीवन के अंतिम दिनों का लेखन आज भी उतना ही ताज़ा है जितना एक पौधे की नई और ताज़ी कोंपलें होती हैं.. आलोक जी की पुण्यतिथि पर इसी उम्मीद के साथ गई थी कि शायद उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ जानने को मिलेगा लेकिन चूंकि विमर्श मीडिया की भाषा पर था, इसलिए सभी दिग्गज पत्रकार और आलोक जी के सहयोगी रह चुके लोगों नें आलोक जी की भाषा के बारे में बताया..हालांकि आलोक जी से जुड़े लोग अगर उनकी निर्भीक छवि से जुड़े कुछ संस्मरणों के बारे में बताते तो शायद और अच्छा होता, उनके जीवन से हमें भी अपने जीवन के लिए प्रेरणा मिलती। एकमात्र दीपक चौरसिया जी ने सटीक शब्दों में आलोक जी के व्यक्तित्व के बारे में बताया कि चूंकि वो एक निर्भीक इंसान थे, इसीलिए उन्हें कोई बांध के नहीं रख सका। आजतक के पत्रकार नवीन ने शायद आलोक जी के जीवन से खासी प्रेरणा ली है। लोगों की भीड़ से अलग चलने का साहस और जज़्बा उनमें दिखाई देता है…शायद आलोक जी भी नवीन की उम्र में ऐसे ही रहे होंगे…नई पीढ़ी के उभरते पत्रकारों को भी अपने अंदर आलोक की लौ जलाए रखनी चाहिए…ताकि आलोक हममें जीवित रहें…..

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Abhishek Srivastava : आलोक तोमर की याद में हुए कार्यक्रम में आज Qamar Waheed Naqvi ने जब मीडिया की भाषा पर बोलते हुए एक हिंग्लिश वाक्‍य का उदाहरण दिया, ''मैं मर्डर पर पॉलिटिक्‍स नहीं करता'', तो मुझे अचानक एक अवांतर संदर्भ में हंसी आ गई। पिछले दो साल से दरअसल आलोक जी की बरसी पर जो कुछ हो रहा है, वह ''मौत पर पॉलिटिक्‍स'' नहीं तो और क्‍या है? आलोक जी क्‍या सिर्फ सुंदर भाषा का पर्याय हैं? उनके निजी-सार्वजनिक जीवन के वे तमाम श्‍वेत-श्‍याम प्रसंग जो किसी भी पत्रकार के लिए आदर्श या अनादर्श कहे जा सकते हैं, क्‍या उनसे नए लोगों को परिचित करवाना/चेताना उनके साथियों की जिम्‍मेदारी नहीं? किसी को भी भगवान बनाने की बाध्‍यता आखिर कहां से आती है? इसका आंशिक जवाब Rahul Dev ने अंत में दिया, जब उन्‍होंने आलोक जी के नाम पर पत्रकारिता पुरस्‍कार और छात्रवृत्ति की घोषणा की। जब एक कार्यक्रम के वित्‍तपोषक का नाम दीपक चौरसिया हो सकता है, तो दूसरे का नाम छुपाने का क्‍या मतलब? हो सकता है आलोक जी के वे करीबी सज्‍जन अपना नाम उजागर न करना चाहते हों, तो फिर दीपक चौरसिया का नाम लेकर ही आप भाषा या पत्रकारिता के मामले में कौन सा आदर्श गढ़ दे रहे हैं? कल को किसी आलोक तोमर के नाम पर वजीफा कोई सुधीर चौधरी दे बैठेगा, तब आप क्‍या मुंह लेकर लोगों के सामने जाएंगे? मुझे याद है कि आलोक जी ने गिरफ्तारी से बचाने के लिए पुलिस का छापा पड़ने से हफ्ते भर पहले मुझे सीनियर इंडिया से निकाल दिया था। वे मधुसूदन आनंद नहीं थे जो कहते कि भाई, मैं भी कॉन्‍ट्रैक्‍ट से बंधा हुआ हूं, इसलिए तुम्‍हें नहीं बचा सकता (नीरेंद्र नागर का चेहरा बरसों बाद देखकर यह बात याद आ गई, सो ठीक ही है)। Kripa Shankar जी ठीक कह रहे थे, कि आलोक जी के जाने से अंतिम छतरी चली गई। मुझे नहीं लगता कि आलोक जी जहां कहीं होंगे, वहां से कृपाजी की सफेद खिचड़ी दाढ़ी देखकर, कुम्‍हलाया चेहरा देखकर खुश हो रहे होंगे। गरिया ही रहे होंगे कि सालों, काट लो मेरे नाम पर जितना काट सकते हो। बहरहाल, गुस्‍सा आ रहा है और सोच रहा हूं कि आज से दस साल बाद यह कार्यक्रम भी उदयन शर्मा परस्‍कार जैसे हितग्राहियों के किसी रैकेट में तब्‍दील हो जाएगा और मैं वहां कतई नहीं जाऊंगा। ज़ाहिर है, मेरे जाने या न जाने से किसी भी रैकेट पर कोई फर्क नहीं पड़ता। देते रहिए ''सरोकार वाले पत्रकार'' को गुप्‍त स्रोत के धन से पुरस्‍कार, सिखाते रहिए भाषा का शऊर और बनाते रहिए आलोकों को भगवान। सब ठाठ धरा रह जाएगा… अपनी बला से!!!

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Mayank Saxena : आलोक जी…एक विरोधाभासी व्यक्तित्व वाला हैरतअंगेज़ शख्स…उनसे तमाम असहमतियां थीं…उनके अराजक बर्ताव से नाराज़गी भी…लेकिन लेखन में वो धार…वो कहां से आती थी न जाने…वो शब्दों से खेलने का अंदाज़…उफ़…आप जो सिखा गए, उसे ही इस्तेमाल नहीं कर पाऊंगा…नया कहां से सीखेगा आपका ये चेला… हां आपके जाने के बाद हिम्मत सीखी है…बहुत सी हिम्मत…दबंगई से जो मन करे, कहने और लिखने की हिम्मत…ज़रूरी नहीं कि वही लिखूं जो आप सोचते थे…लेकिन हां मनमर्ज़ी का लिखने  की कूव्वत आपसे ही आई…

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Mayank Saxena : तात Alok Tomar की ये कविता जो उन्होंने 21-01-2010 को मेल की थी…उनकी पुण्यतिथि पर…आप से बांट रहा हूं…मूलतः ये कविता उन्होंने नाराज़गी और खिन्नता में संभवतः Rahul Dev जी को मेल की थी…

जो मूक रह सकते नहीं…
वे मुखर हैं…
वाचाल भी…
वे निरर्थक हैं…
सदा–निरंतर…
और तत्काल भी…
जिन्हें अपने सत्य पर…
थोडा भी है भरोसा…
उन्हें क्या फर्क पड़ता..
किसने है कोसा…
जो भी हो…
सब सहो…
कुछ मत कहो…
तो भले हो…
जहां मुंह खोला…
आरोप हाजिर है…
बगावत पर तुले हो…
मूक होना सीखना…
अब कठिन है…
क्योंकि अब तो…
चुप रहो और सब सहो…
की बात के दिन हैं…
जो बड़े हैं…
वे शिखरों पर खड़े हैं…
कह रहे हैं…
धिक्कार है… धिक्कार है…
क्या करें…
संबंध हैं…
अधिकार है….
मूक लोगों से डरो…
इनसे बुरा कोई नहीं…
इनमें ज़हर है…
जो बोलते हैं…
वे महज दिल खोलते हैं…
निरापद हैं…

– आलोक तोमर का निधन 20 मार्च 2011 को दिल्ली में हुआ….

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Mayank Saxena : 20 मार्च 2011…एक रात पहले ही तो लखनऊ के लिए ट्रेन पकड़ी थी…आलोक जी बत्रा अस्पताल में भर्ती थे…कोमा में थे…डॉक्टर बोले कि 'तात' स्थिर हैं…सुप्रिया जी ने ज़ोर दिया और डांट कर कहा कि तुम्हारी बहन बीमार है…होली भी है…घर निकल जाओ…परसों सुबह चले आना…मैं रात ही रेल से निकला…सोचा कि 21 की सुबह आ भी जाऊंगा… और हां…21 की सुबह ही आया, लेकिन वैसे नहीं जैसा कि सोचा था…लखनऊ सुबह 9 बजे पहुंचा…होली का दिन था…नाश्ता कर के घर से निकला ही था कि फोन घनघनाया…सुप्रिया जी के नम्बर से…गुप्ता जी थे…रोने लगे और मैं समझ गया…उसके बाद तो फोन कॉल्स की झड़ी लग गई…मैं भी आंसुओं से भीग गया…हिमांशु को फोन लगाया…शाम की ही ट्रेन पकड़ घर से वापस हो लिया…उसी बीच, होली के शोर के बीच एक फोन आया…फोन था सरफ़राज़ का…वो भी रो रहा था…बोला कि आलोक जी पर पैकेज लिखना है, नैरेट कर दीजिए…मैं रोते हुए नैरेट करता रहा…याद आ रहा था न…प्रभाष जी के निधन पर मैं दफ्तर से फोन पर था, आलोक जी उनके घर से नैरेट कर के पैकेज लिखवा रहे थे…ऑर्बिच्युएरी का पैकेज.. उसके बाद अरविंद भाई, श्रीपति जी, कुलदीप, रोशन सबसे बात हुई…दिल्ली पहुंचते पहुंचते सुबह हो गई…श्मशान घाट के बाहर बैठ कर बहुत देर तक रोता रहा…फिर तात की कविता जेब से निकाल कर पढ़ने लगा…कविता थी….शमशेर की एक कविता को आधार बना कर लिखी गई ये कविता…तात की कविता…

काल तुझसे होड़ है मेरी
जानता हूं चल रही है
मेरी तुम्हारी दौड़
मेरे जन्म से ही
मेरे हर मंगल गान में
तुमने रखा है ध्यान में
एक स्वर लहरी,
शोक की रह जाए
आपके दूत मुझसे मिलें हर मोड़ पर
और जीवन का बड़ा सच
चोट दें, कह जाएं
सारे स्वप्न, सारी कामनाएं, आसक्तियां
तुम्हारे काल जल में बह जाएं
लेकिन अनाड़ी भी हूं
अनूठा भी, किंतु
तुम्हारी चाल से रूठा भी
काल की शतरंज से कभी जुड़ा
और एक पल टूटा भी
तुम सृष्टि के पीछे लगाते दौड़
देते शाप और वरदान
और प्रभंजन, अप्रतिहत
चल रही है
दौड़ तुमसे मेरी
ए अहेरी
काल, तुझसे होड़ है मेरी…..

फेसबुक से संकलित कुछ टिप्पणियां, यादें, विचार, संस्मरण.

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