(आलोक स्मृति-दो) : कुछ लोग राहुल देव पर ही पिल पड़े हैं, अभद्रता की हद तक

Krishna Kant : आजकल अपनी भाषा के प्रति सजगता का प्रश्न उठाना बड़ा खतरनाक काम है। इसे लेकर वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव काफी समय से सक्रिय हैं और विभिन्न मंचों से लगातार बोल रहे हैं। कुछ लोग भाषा पर बात करने, तर्कों को सुनने, स्वीकारने और नकारने की जगह व्यक्तिगत तौर पर राहुल देव पर ही पिल पड़े हैं। अभद्रता की हद तक। उन्हें इस बात से भी बड़ी समस्या है कि हिंदी में अच्छे शब्द मौजूद होने पर भी अंग्रेजी के शब्द जबरदस्ती क्यों घुसाए जाते हैं। इसका विरोध करने के लिए वे तू—तड़ाक पर उतरकर बात करते हैं।

मेरे हिसाब से, दरअसल, यह भाषा का प्रश्न ही नहीं है, जिसके लिए राहुल देव जी सक्रिय हैं। यह वैचारिक और सांस्कृतिक तौर पर गुलाम समाज को यह बताने का प्रयत्न है कि वह गुलाम है, लेकिन वह समझने को तैयार नहीं है, इसलिए यह बहुत मुश्किल है। मेरे पड़ोस से अक्सर सुबह आवाज आती है—'बेटा, जल्दी उठो। हैंड मुंह वॉश कर लो। मॉर्निंग हो गई न?' यदि कोई ऐसी भाषा का यह कहकर समर्थन करता है कि यह समय की मांग है, यह भाषा का सामयिक प्रवाह है और आप इसके रोक नहीं सकते तो ऐसा कहकर आप खुश हो लीजिए।

लेकिन यह बात पक्की है कि ऐसी भाषा से संस्कारित उस बच्चे के पास विमर्श की भाषा नहीं होगी। उसके पास रोजमर्रा के काम चलाने की भाषा होगी, लेकिन आविष्कार की भाषा नहीं होगी, तकनीकी विकास की भाषा नहीं होगी। फिर आप आज जिनसे भद्दी भाषा उधार ले रहे हैं, उन्हीं से आविष्कार उधार लेंगे। जैसा कि आज भी हो ही रहा है। विरोध किसी भाषा का नहीं, भद्दगी का है। सीखने को आप दस—बीस भाषाएं सीखिए, अगर कूव्वत है तो, किसने रोका?

कृष्णकांत के फेसबुक वॉल से.

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