आशिकी का अड्डा बना मुगल सम्राट अकबर का ऐतिहासिक मकबरा

फरह। भारत की संस्कृति और नीति हमेशा अथिति देवो भव पर बल देती रही है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ एक ऐतिहासिक स्मारक पर सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मिलीभगत के कारण विदेशी पर्यटकों से विभिन्न प्रकारों से अवैध वसूली और न देने पर अभद्रता की जाती है। इस तरीके से इन लोगों द्वारा अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए भारत की अथिति देवो भव की नीति पर बदनुमा दाग लगाया जा रहा है। जो असहनीय है।

एक तरफ तो सरकार ऐतिहासिक महत्व वाली जगहों पर भीख मांगने पर रोक लगा रही है और वहीं इस तरह के कुछ स्थानों पर चढ़ावे के नाम से भीख मांगने को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस पर रोक क्यों नहीं? इस तरह से ऐतिहासिक महत्व वाले सरकारी धरोहर सिकन्दरा मकबरा पर तैनात कर्मचारियों/अधिकारियों के भ्रष्ट रवैये एवं व्यक्तिगत लाभ के कारण इस ऐतिहासिक मकबरा पर बदनामी और अवैध वसूली आदि के दाग लगते जा रहे हैं। यहॉ पर तैनात कर्मचारीगण अपने निजी लाभ लिए नियमों की अनदेखी पर उतारू हो गये हैं। आये दिन विदेशी पर्यटकों के साथ ओवर शू पहनाने, टिकटों की रीसैल आदि को लेकर बदसलूकी और अवैध वसूली की जाती है।

सिकन्दरा मकबरे में प्रवेश की शुल्क दरें :  इस ऐतिहासिक महत्व वाले मकबरे पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और आगरा विकास प्राधिकरण दोनों का शुल्क मिलाकर कुल प्रवेश शुल्क टिकट के रूप में लिया जाता है। नियमानुसार वहॉ पर 15 वर्ष तक के बच्चों का प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता है। भारतीय दर्शकों से कुल दस रुपया (5 रु. भापुस और 5 रु. आविप्रा का) का प्रवेश शुल्क टिकट के रूप में लिया जाता है। वहीं विदेशी पर्यटकों से कुल 110 रुपया (100 रु. भापुस और 10 रु. आविप्रा का) प्रवेश शुल्क टिकट के रूप में वसूला जाता है।

अवैध वसूली के तरीके : सिकन्दरा मकबरा में प्रवेश करते समय अकबर की दरगाह/कब्र पर जाने से पूर्व वहॉ आने वाले सभी पर्यटकों को ओवर शू पहनाकर ही अन्दर जाने दिया जाता है। जो कि बिल्कुल फ्री सेवा है फिर भी कोई अपनी स्वेच्छा से कुछ दे जाये तो वो एक अलग बात है। लेकिन विदेशी लोगों से 100 से 500 रुपये तक का ओवर शू चार्ज वसूला जाता है। इसके लिए वहॉ पर बैठा व्यक्ति पहले से ही 100-100 व 500-500 के कुछ नोट अपने हाथ में लंबे करके दूसरों को यह दिखाने के उद्देश्य से पकड़े रखता है, जिससे कि ओवर शू पहनते समय पर्यटक को विश्वास हो जाए कि यहॉ पर ओवर शू का चार्ज लगता है।

बिकी हुई टिकटों की जाती है रीसेल : नाम न छापने की शर्त पर वहॉ पर तैनात एक कर्मचारी ने बताया कि भारत सरकार के निर्देशानुसार एक बार सेल होने के बाद वापिसी में पर्यटकों से एकत्रित की गई सभी टिकटों को प्रतिदिन नष्ट कर देना चाहिए। जिससे कि उसका दोबारा उपयोग नहीं किया जा सके, लेकिन वहॉ पर तैनात कर्मचारी ऐसा न करके वापिसी में पर्यटकों से लौटते समय सेल की गई टिकटों को एकत्रित करने के बाद अपने पास रख लेते हैं और फिर अधिकारियों की सांठ-गांठ से विदेशी पर्यटकों के साथ आये गाइडों केा आधी रेट पर रीसेल करते हैं। कभी-कभार बिना पढ़े लिखे लोगों को विन्डों के माध्यम से भी देते हैं। इनकी रिकार्डों में भी कोई एन्ट्री नहीं करनी पड़ती।

दरगाह पर खुद ही बिछा देते हैं नोट :  दरगाह के पास तैनात लोग पर्यटकों को यह दिखाने के लिए कि यहॉ दरगाह पर नोट चढ़ाये जाते हैं, खुद ही उस पर पचास, सौ और पॉच सौ आदि के कुछ नोट अपनी जेब से बिछा देते हैं। भारतीय या विदेशी पर्यटक जब उक्त दरगाह के दर्शन करके गुजरते हैं तो उनसे उस पर नोट चढ़ाने के बदले में उनकी सभी मुरादें/मन्नतें पूरी होने की बात कहकर भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया जाता है। जिससे न चाहते हुए भी कुछ लोग इमोशनली वहॉ पर नोट चढ़ा देते हैं। इस प्रकार से वहॉ पर आने वाले लोगों की नजरों में एक छलावे का मैसेज जाता है।

विदेशी पर्यटकों के आने पर ही बिछाते हैं कब्र पर नोट : सूत्र ने बताया कि अभी पिछले कुछ दिनों के अन्दर एक दो बार हंगामा होने के बाद से वहॉ के कर्मचारी सतर्कता बरतने लगे हैं। अब वे केवल विदेशी पर्यटकों का समूह आने की सूचना पर ही दरगाह पर नोट बिछा देते हैं और फिर उस समूह के निकल जाने के बाद सभी नोटों को समेट लेते हैं। जिससे कि अन्य किसी जागरूक व्यक्ति या पर्यटक के रूप में आने वाले अधिकारी को इस खेल का पता न लग सके। इसके लिए एक कर्मचारी विदेशी पर्यटकों के समूह के आने की तत्काल जानकारी दे देता है।

ऐसे ही नहीं होती है अवैध वसूली : सिकन्दरा मकबरा पर खुलेआम अवैध वसूली ऐसे ही नहीं होती बल्कि वहॉ पर अलग-अलग दोनों शिफ्टों में तैनात अधिकारियों के आशीर्वाद से ही होती है, यह कहना है नाम न छापने की शर्त पर एक वहीं पर तैनात कर्मचारी का। उसने बताया कि पूरे दिन व रात में ओवर शू, बिकी हुई टिकटों की रीसेल व चढ़ावे के नाम पर कुल वसूली में सभी अधिकारियों और कर्मचारियों का अपना-अपना हिस्सा निश्चित होता है।

एक फौजी ले गया था दरगाह के चढ़ावे को : करीब एक माह पूर्व सिकन्दरा मकबरा पर आये एक फौजी ने जब दरगाह पर चढ़ावे के नाम पर ठगी देखी तो उसकी भृकुटि तन गयीं और उसने दरगाह पर पड़े सभी नोट समेटकर अपनी जेब में रख लिए। इसके बाद वहॉ पर तैनात सभी कर्मचारियों को खरी खोटी सुनाते हुए कहा कि एक तरफ तो मकबरे का परिचय अकबर दि ग्रेट कहकर कराते हो और वहीं दूसरी तरफ ग्रेट अकबर के नाम पर भीख मॉगते हो।

विदेशी के भेष में देसी से हन्ड्रेड रुपीज सर प्लीज कहना पड़ा भारी : 17 मार्च 2013 रविवार को ओवर शू के नाम पर विदेशी पर्यटकों के साथ आये एक भारतीय पर्यटक को विदेशी पर्यटक समझकर उससे भी ओवर शू पहनाने वाले व्यक्ति ने हन्ड्रेड रुपीज सर प्लीज कह डाला, लेकिन जब उसने हिन्दी में हंगामा काटना शुरू किया तो संभालना मुश्किल पड़ गया। उक्त व्यक्ति ने सौ रुपये मॉगने को लेकर आगरा के ही कुछ परिचित इलेक्ट्रोनिकि मीडियाकर्मियों केा बुलाकर काफी देर तक हंगामा काटा था। काफी देर बाद मामले को बढ़ता देख वहॉ के अधिकारियों ने उस व्यक्ति को फटकार लगाते हुए भविष्य में ऐसा ने करने की चेतावनी देकर लीपा-पोती कर मामले को शान्त करा दिया। लेकिन ये तो उनका आये दिन फॅसने पर बचने का नाटक का एक हिस्सा था। आये दिन इस प्रकार की घटनायें वहॉ देखने को मिल जाती हैं।

हर समय मौजूद रहते हैं मनचले : हर वर्ष हजारों की संख्या में दूर दराज से भारतीय व विदेशी पर्यटक आगरा में प्रेम के प्रतीक ताजमहल को देखने आते हैं और उसके साथ-साथ सिकन्दरा मकबरा पर भी भ्रमण के लिए आते हैं। हमारे देश की ऐतिहासिक महत्व वाली इमारतों और देश की संस्कृति के आगे विदेशी भी नतमस्तक होते रहे हैं लेकिन कुछ स्थानीय मनचले इस स्मारक के बाग-बगीचों व उसके अन्दर बने रहते हैं। ये मनचले विदेशी महिलाओं के साथ अश्लील कमेंटस उनके बिना परमीशन फोटो खींचकर भारत की संस्कृति अथिति देवो भव में दाग लगाने का काम करते हैं।

आखिर कैसे रूक सकती है टिकटों की रीसेल : सिकन्दरा मकबरा पर प्रवेश हेतु मिलने वाली टिकटों पर कहीं भी केाई किसी प्रकार की तिथि या दिन नहीं लिखा होता है और जो सीरियल नंबर मौजूद होता है वह भी बार कोड में, जिसे केवल कम्प्यूटर की रीड कर सकता है। अन्यथा टिकट के सेल या रीसेल का पता नहीं लग सकता। इसके लिए वहॉ पर मिलने वाली टिकटों पर हर रोज दिनांक आदि लगाने का निर्देश जारी किया जाना चाहिए जिससे कि अगले दिन स्वयं ही टिकट अनुपयोगी हो जायेगी और उसकी रीसेल पर रोक संभव है। जिससे हो रही राजस्व की क्षति को रोका जा सके।

भारत सरकार व आविप्रा को हो रही है राजस्व की हानि : टिकटों पर तिथि या दिन इंगित न होने के कारण बिकी हुई टिकटों को रीसेल करने से नई टिकटों की बिक्री कम होती है जिससे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और आगरा विकास प्राधिकरण दोनों को ही भारी राजस्व की हानि हो रही है। क्योंकि रीसेल की गई टिकटों से आये धन को तो केवल वहॉ पर तैनात अधिकारी व कर्मचारी आदि आपस में बन्दरबॉट कर लेते हैं। इस प्रकार से भारत सरकार केा खुलेआम चूना लगाया जा रहा है और साथ ही साथ भारत की छवि को भी खराब किया जा रहा है।

ऐतिहासिक स्मारक बन गया है आशिकी का अड्डा : हर समय वहॉ पर दर्जनों की संख्या में प्रेमी-प्रमिकाओं के जोड़ों को खुलेआम आशिकी फरमाते हुए देखा जा सकता है। वहॉ के अधिकारियों और कर्मचारियों के ढुलमुल रवैये के कारण मनचले और आशिक मिजाज लोगों ने उसे अपनी धरोहर समझकर आशिकी का अड्डा बना लिया है। स्कूल, कालेजों और इंजीनियरिंग संस्थानों के छात्र-छात्रायें अपनी क्लासेज छोड़कर गुरुओं व घरवालों की आंखों में धूल झोंककर वहॉ पर अपने प्रेमी-प्रेमिकाओं के साथ आशिकी फरमाते हैं। इस तरह के नमूने कभी आपत्तिजनक स्थितियों में देखे जा सकते हैं।

प्रेमी युगलों से भी होती है वसूली : स्मारक में जगह-जगह इसकी सुरक्षा एवं प्रेमी युगलों द्वारा आपत्तिजनक हरकतों को रोकने के लिए एसआईएस वालों को तैनात किया गया है। लेकिन सूत्रों के मुताबिक ये सुरक्षाकर्मी अपनी मूल जिम्मेदारियों से भटककर प्रेमी युगलों केा अश्लील हरकतें या आपत्तिजनक स्थितियों में पकड़ भी लेते हैं तो उनसे उसके बदले में सुविधा शुल्क लेकर छोड़ देते हैं जिससे प्रेमी युगलों के हौसले और कहीं बढ़ जाते हैं।

स्मारक की सफाई एक कर्मचारी के हवाले : 119 एकड़ के क्षेत्रफल में फैले सिकन्दरा मकबरा पर सफाई कर्मचारी के नाम पर केवल एक ही कर्मचारी नियुक्त है। इसके अलावा अन्य छह को प्राईवेट तौर पर रखा गया है। जिन्हें केवल हफ्ते में एक या दो बार ही अधिक लोड होने पर बुलाया जाता है। जबकि हर माह लाखों रुपये सफाई के नाम पर सरकारी आंकड़ों में दर्ज किए जा रहे हैं। स्मारक में जगह-जगह पेड़ों के पत्तों व गंदगी के ढेर लगे हुए हैं।

अकबर ने स्वयं शुरू करवाया था इसका निर्माण : आगरा के मध्य से करीब सात किमी दूर सिकन्दरा हाईवे के किनारे पर स्थित इस मकबरा का निमार्ण 1605 से 1613 के बीच हुआ था। इसका निर्माण स्वयं सम्राट अकबर ने शुरू करवाया था। यह करीब 48 हैक्टेयर या 119 एकड़ में फैला हुआ है। यह मकबरा हिन्दू, इस्लामिक, ईसाई, जैन और बौद्ध कला का सर्वोत्तम मिश्रण है। लेकिन इसके पूरा होने से पहले ही अकबर की मृत्यु हो गई थी। बाद उनके पुत्र जहॉगीर ने इसे पूर्ण करवाया था। इस इमारत को देखकर मुगल कला के विकास के बारे में जानकारी होती है। सिकन्दरा का नाम सिकन्दर लोदी के नाम पर पड़ा था। इस मकबरे के चारों कोनों पर लाल पत्थर से निर्मित तीन मंजिला मीनारें हैं। जिन पर सुंदर कारीगरी की गई है। इस मकबरे के चारों ओर खूबसूरत बगीचे इसकी रौनक में सुबह शाम चार चॉद लगा देते हैं।

आगरा से ठा. विमल कुमार की रिपोर्ट.

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