इंडियन मुजाहिदीन का खत संपादकों के नाम

सभी अखबारों, टीवी चैनलों के संपादकों को हमारा सलाम और शुक्रिया. सलाम तो रस्मी है, पर शुक्रगुजार हम दिल से हैं. आप लोगों ने तो हमें खुदा ही बना दिया है. कहते हैं, हर जर्रे में खुदा का नूर है. इसी तरह मुल्क में होनेवाले हर धमाके में हमारा हाथ है. खुदा का कोई रंग, शक्लो-सूरत नहीं होती. वह गायब भी है, हाजिर भी. वह ‘मंजर’ भी है, नाजिर भी.

हमारा हाल भी इससे अलग कहां है. कुछ बेवकूफ हैं, जो आप जैसे काबिल संपादकों पर सवाल उठाते हैं, और हमारे होने का सबूत मांगते हैं. अब इन बेवकूफों को कौन समझाये कि कहीं खुदा के होने का सबूत मांगा जाता है. वह तो सिर्फ एहसास है, जिसे रूह से महसूस करना पड़ता है. फिर सवाल उठानेवाले लोग हैं कौन- कम्युनिस्ट और तरक्कीपंसद लोग. ये तरक्कीपंसद व कम्युनिस्ट ठहरे नास्तिक, वो क्या खुदा को समझेंगे. वैसे सवाल मुसलमानों के मन में भी है, पर वो खामोश हैं. आखिर वो करें तो क्या करें, उन्हें तो आप ‘मीडिया के खुदाओं’ ने पहले ही हमारे साथ नत्थी कर दिया है.

सुना है कि प्रेस काउंसिल के चेयरमैन मार्कडेंय काटजू ने आप लोगों के लिए एक गाइडलाइन जारी की है कि बिना सबूत हर धमाके में हम लोगों का नाम न घसीटें. अब काटजू साहब से तो यह उम्मीद नहीं थी कि वह भी ऐसी नासमझी की बात करेंगे और ‘खुदा के हाथ’ के बारे में सबूत मांगेंगे. वह तो उन 10 फीसदी भारतीयों में शामिल हैं, जो आलिम-फाजिल हैं (बाकी 90 फीसदी को तो वह खुद बेवकूफ मानते हैं). अगर कोई ‘खुदा के हाथ’ (हैंड ऑफ गॉड) का सबूत खोज ही पाता, तो 1986 में अर्जेटीना फुटबॉल का चैंपियन थोड़े ही बन पाता! दिमाग पर जोर डालिए, माराडोना का वह गोल आपको भी याद आ जायेगा, जिसे खुदा ने उनकी तरफ से किया था.

आप लोगों ने हमें जो इज्जत बख्शी है, उसके लिए एक बार फिर आप सब का शुक्रिया. लेकिन, माफ कीजिएगा हम खुदा बनना नहीं चाहते, हमें तो जबरन खुदा बनाया गया है. दहशतगर्दी रोकने में फेल सरकारों ने अपनी नाकामी छिपाने के लिए एक बुत (इंडियन मुजाहिदीन) गढ़ा और आप लोगों से उसकी इस कदर परस्तिस करायी गयी/ करायी जा रही है कि सबों की नजर में हम खुदा हो चले. यह जो ‘मंजर’ रचा गया है, जो बुत गढ़ा गया है, उसके लिए खुफिया एजेंसियों आइबी, एनआइए वगैरह ने बहुत ‘रियाज’ किया है. मुसलमान हमारे बुत से खौफजदा हैं. वो कह रहे हैं- यारब मुझे महफूज रख उस बुत के सितम से/ मैं उस की इनायत का तलबगार नहीं हूं. खौफ इस कदर है कि वे अपने बच्चों को इंजीनियर, तकनीशियन बनाने से डर रहे हैं. बाकी बात अगले खत में. खुदा हाफिज. आप सलामत रहेंगे, तो हमारा बुत भी सलामत रहेगा.

सत्य प्रकाश चौधरी

प्रभात खबर, रांची

satyajournalist@gmail.com

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