इंदौर। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और इंदौर प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वावधान में ‘पत्रकारिता का नया दौर और चुनौतियां’ विषय पर होटल फार्च्यून लैंडमार्क में आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद में वक्ताओं ने कहा कि वक्त के साथ पत्रकारिता का दौर भी बदल रहा है। इस नए दौर में साथ चलने के लिए पत्रकार और पाठक दोनों को बदलना होगा। श्री त्रिपुरारि शरण, महानिदेशक, दूरदर्शन ने कहा कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में फर्क है। प्रिंट वाले जो लिखते हैं वे बहुत सोच-समझकर अपनी बात कहते हैं, लेकिन जो बोलते हैं जरूरी नहीं कि वह पहले उस पर सोचते हैं। आज पत्रकारिता में विश्लेषण करने की क्षमता कम होती जा रही है। दूरदर्शन पर आज चाणक्य, बुनियाद, हम लोग और व्योमकेश बक्क्षी जैसे ऐतिहासिक सीरियल इसलिए दोबारा दिखाए जा रहे हैं ताकि नई पीढ़ी के लोग हमारी संस्कृति को करीब से जान सके।
राजदीप सरदेसाई, एडिटर इन चीफ, आईबीएन-सीएनएन, नेटवर्क18 ने कहा कि आम जनता का स्वभाव बन गया कि व टीवी चैनल को देखती है और साथ में उसे कोसती भी है क्या इसे हम टीवी चैनलों की विश्वसनीयता पर संकट कहे। टीवी चैनलों के आने के बाद जो कुछ गलत हो रहा था उसे लोगों के बीच में लाने का काम शुरु हुआ। चैनलों के सामने दो तरह की चुनौतियां है, जिससे हमें मुकाबला करना है। यह सही है कि जिनके पास कालाधन है, बिल्डर है, रीयल एस्टेट से जुड़े हैं और राजनीति में रसूखदार है उन लोगों ने टीवी चैनल शुरू किए, लेकिन अधिकांश आज घाटे में हैं। भारतीय समाज को मुफ्त में खाने की आदत सी पड़ गई है इसलिए वह ३०० रुपए में २५० चैनल देखना चाहता हैं। इस फील्ड में यदि किसी ने पैसा बनाया तो वो केबल ऑपरेटरों ने। टीवी चैनलों को एक बड़ी राशि इन ऑपरेटरों को देना पड़ती है। यदि नासिक शहर में छगन भुजबल के खिलाफ कोई स्टोरी दिखाई जाती है तो केबल वाले उसे काट देते हैं। यही स्थिति चेन्नई में जयललिता के खिलाफ दिखाओ तो होती है। टीवी चैनल के आने के बाद हर आधे घंटे पहले जो दिखाया गया वह इतिहास बन जाता है। दरअसल टीवी पत्रकारिता में टीआरपी का जोर है और वहां भी रैंकिंग हो रही है। जिस चैनल की रैंकिंग ज्यादा वह सबसे बड़ा चैनल। जब एक टीवी पत्रकार ने बिहार के प्रोफेसर की प्रेम कहानी पर स्टोरी बनाई तो उसे टॉप टेन में रैंकिंग मिल गई। कहने का मकसद यह है कि कई मर्तबा टीआरपी की दौड़ में टीवी पत्रकार ऐसी स्टोरी बनाते हैं, जिसका जनता से कोई सरोकार नहीं या जिसमें राष्ट्रीय हित की कोई बात नहीं। यह कहना गलत है कि पत्रकार बिके हुए हैं। अगर कोई पत्रकार मोदी के साथ है और राहुल के साथ नहीं तो उसे राहुल के समर्थक गलत मानते हैं, जबकि पत्रकार को पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए तभी वह अपनी खबर के साथ और आम जनता के साथ न्याय कर सकेगा। टीवी चैनल को २४ घंटे कार्यक्रम दिखाना होते हैं, इसलिए वे अपनी न्यूजरूम में हर खबर के साथ ड्रामा का तड़का लगा देते हैं ताकि लोगों का आकर्षक चैनल के प्रति बना रहे। वर्ना लोग रिमोट का बटन दबाकर चैनल बदल देंगे। जैसे किसी एंकर को क्राइम पर स्टोरी करना है तो कई बार उसे अपराधी जैसा भी बनना पड़ता है। आज की टीवी पत्रकारिता भी बॉक्स ऑफिस जैसी हो गई है। पहले फिल्में ही बॉक्स ऑफिस में कलेक्शन करती थी अब टीवी चैनल भी ऐसा करने लगे हैं।
वायु की गति से हम आगे बढ़ रहे हैं
आशुतोष, एडिटर, आईबीएन7 ने कहा कि आज नया भारत बन रहा है या गढ़ा जा रहा है, पर हम उसे समझ नहीं रहे हैं। हम नए बिन्दुओं की तलाश नहीं करना चाहते। नई पीढ़ी किस्मत वाली है, जिसने बहुत बड़े बदलाव देखे हैं। आज हम वायु की गति से आगे बढ़ रहे हैं। देश और काल दोनों ही बदल गए हैं। टीवी पत्रकारिता ने बहुत बड़ी क्रांति ला दी है। इसने अभिजात्य संस्कृति को ध्वस्त किया है। सामंतवादी सोच को बदला है और जमीन तक लोकतंत्र को फैलाया है। जो २५ साल पहले नहीं था वह आज हम अपने सामने देख रहे हैं। इतनी बड़ी क्रांति पहले कभी नहीं हुई। टीवी पत्रकारिता ने जनता को एक आवाज दी है और वे किसी भी समय एक जगह पर एक साथ इकट्ठे हो जाते हैं यह बड़ी बात है। टीवी पत्रकारिता के साथ चुनौतियां भी आई है, जिसका मुकाबला हमें ही करना होगा।
सीमा मुस्तफा, वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभ लेखक ने कहा कि एक दौर था जब पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने के बाद अपनी खबरों को दफ्तर में भेजने के लिए पोस्ट ऑफिस या अन्य सेंटरों पर घंटों इंतजार करना पड़ता था। यदि कोई पत्रकार बाहर जाकर रिपोर्टिंग करता था तो उसके बारे में जानकारी दूसरे-तीसरे दिन मिलती थी। आज स्थिति बदल गई है। आज मोबाइल, इंटरनेट का जमाना है। इनफार्मेंशन के सबसे हथियार आज हमारे पास है। दुनिया के किसी भी हिस्से में बैठकर आप खबरें पलभर में एक जगह से दूसरी जगह भेज सकते हैं, लेकिन जर्नलिज्म में कमिटमेंट समाप्त होता जा रहा है। अखबारों में संपादकों की पोस्ट खत्म हो गई है, अब मैनेजर और प्रोपाराइटर का जमाना है। टीवी चैनल राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी को दिखाता है, लेकिन मुजफ्फर नगर के दंगे नहीं दिखाता। छोटी-छोटी जगह पर जो हादसे हो रहे, उन पर किसी की नजर नहीं है। टीवी पत्रकारिता में एक बहुत बड़ा काम किया है, उसने भ्रष्टाचार को उजागर किया है। यूं कहे कि सबसे अधिक आर्थिक घोटाले टीवी चैनलों ने ही उजागर किए। मीडिया को अपनी आचार संहिता खुद बनाना होगी।
श्रवण गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार एवं सदस्य भारतीय प्रेस परिषद् ने कहा कि पत्रकारिता में विश्वसनीयता आज सबसे बड़ी चुनौती है। खबरों में वास्तविकता का होना जरूरी है, लेकिन आज नकलीपन का जमाना है। सही चीजें खत्म हो रही है और गलत चीजें सामने आ रही है। अगर अखबार की कीमत उसकी रद्दी की कीमत से कुछ अधिक होगी तो उसमें छपने वाली खबरें भी रद्दी की शक्ल में होगी। उन खबरों का न कोई मूल्य होगा न क्रेडिबिलिटी। कारपोरेट घरानों का प्रवेश मीडिया में बढ़ता जा रहा है। उत्तर भारत में औद्योगिक घराने, राजनीतिक दल अपने हितों के इस्तेमाल के लिए टीवी चैनल और अखबारों का उपयोग कर रहे हैं। ये एक चुनौती है जिसे हमें समझना होगा। लोग अखबार खरीदकर कम मांगकर अधिक पड़ते हैं। हिन्दी भाषी राज्यों में अखबार के पाठक अधिक है ग्राहक कम। अब मोबाइल का जमाना है। ऐसे में हमें स्वयं अपने हथियार गढ़ने होंगे। खासकर हिन्दी भाषी राज्यों को अधिक मेहनत करने की जरूरत है।
अजय उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि लोकतंत्र में प्रेस एक मजबूत स्तंभ है। पत्रकारिता टीवी की हो या प्रिंट की, दोनों ही ताकतवर है, लेकिन लिखे शब्दों में अधिक ताकत होती है। पत्रकारिता में वेरिफिकेशन का होना जरूरी है। वर्तमान दौर में पत्रकारिता को पुनर्भाषित करना होगा। सोशल मीडिया, पत्रकारिता और मीडिया कम्युनिकेशन तीनों अलग-अलग चीजे हैं। वर्तमान में विज्ञापन और संपादकीय के बीच एक नया विभाग शुरू हो रहा है जो विज्ञापन भी और संपादकीय भी। हमें इस चीज को समझना होगा।
अनुराग बत्रा, एडिटर, मीडियाएक्सचेंज डॉट कॉम ने कहा कि आज की पत्रकारिता में बहुत सारे बदलाव आ चुके हैं। आज डिजीटल का जोर है। आने वाले दिनों में हम ई-पत्रकारिता को अपनाएंगे। लोग अखबार इंटरनेट और मोबाइल पर पढ़ेंगे। सोशल साइट का प्रयोग अधिक बढ़ेगा। वर्तमान में २.७ बिलियन वेबपेज रोजाना सर्च हो रहे हैं। ३२ हजार करोड़ विज्ञापन पर खर्च हो रहे हैं। जिसका एक बड़ा भाग डिजीटल पर खर्च हो रहा है। वर्तमान में सच बोलने वाले लोग कम है, लेकिन उनकी वेल्यु और क्रेडिबिलिटी अधिक है।
विनय छजलानी, सीईओ, वेबदुनिया ने कहा कि पत्रकारिता में ई-कम्यूनिकेशन का दौर शुरू हो चुका है। अब वेबसाइट, ई-मेल, यूट्यूब, सोशल साइट, ट्यूटर, ब्लॉग जैसे ई-कम्यूनिकेशन पर चर्चा अधिक होती है। नई पीढ़ी इन चीजों को तेजी से अपना रही है। ई-जर्नलिज्म को अब हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। समय के साथ इसका महत्व बढ़ता जा रहा है।
प्रवीण कुमार खारीवाल, अध्यक्ष, इंदौर प्रेस क्लब ने कहा कि भूमंडलीकरण और उदारवादी अर्थव्यवस्था का मौजूदा दौर जबसे आरंभ हुआ है तब से हमारी पत्रकारिता के चाल, चरित्र और चेहरे में भी काफी बदलाव आया है, उसके सरोकार भी बदले हैं और उसके समक्ष कई तरह की चुनौतियां भी आ खड़ी हुई है। यह बदलाव और चुनौतियां किस तरह की है, मैं इसके विस्तार में नहीं जाऊगा, क्योंकि इसके लिए हमारे बीच विशेषज्ञ वक्ता मौजूद हैं जो इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
प्रारंभ में अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर परिसंवाद का शुभारंभ किया। विषय प्रवर्तन वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने किया। अतिथियों का परिचय एडिटर्स गिल्ड के सचिव विजय नाईक ने दिया। स्वागत उदबोधन इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने दिया। कार्यक्रम का संचालन महासचिव अरविंद तिवारी ने किया, जबकि एडिटर्स गिल्ड के कोषाध्यक्ष सुरेश बाफना ने आभार व्यक्त किया। अतिथि स्वागत प्रवीण कुमार खारीवाल, अमित सोनी, सुनील जोशी, मोहित भार्गव, अनिल कुमार, संजय लाहोटी, गंगेश मिश्र, नितिन माहेश्वरी, पंकज मित्तल, कमल कस्तुरी, हेमंत शर्मा, विजय गुंजाल, रचना जौहरी। आदि ने किया। अतिथियों को प्रतीक चिन्ह राजा शर्मा, डॉ. प्रशांत तिवारी, सुनील अग्रवाल, शशीन्द्र जलधारी, रुमनी घोष, आलोक ठक्कर, डॉ. हनीष अजमेरा, संजीव सिंह ने भेंट किए। कार्यक्रम में कुलपति डॉ. डीपी सिंह, संभागायुक्त संजय दुबे, कलेक्टर आकाश त्रिपाठी, डीआईजी राकेश गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार अभय छजलानी, पूर्व कुलपति डॉ. भरत छापरवाल, उद्योगपति रमेश बाहेती, सुरेंद्र संघवी, विनय छजलानी, विधायक अश्विन जोशी, खनिज विकास निगम के उपाध्यक्ष गोविंद मालू सहित अनेक गणमान्य व प्रबुद्धजन उपस्थित थे। इस अवसर पर युवा पत्रकार शिरीष खरे की पुस्तक तहकीकात का विमोचन भी हुआ। अतिथि वक्ताओं ने श्रोताओं के प्रश्नों का विस्तार से जवाब भी दिए।
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