इज्जत की रक्षा के नाम पर जान देने और बहादुर बेटी का खिताब लेने से बचो

: जान बड़ी या इज्‍जत (1) : बात की शुरुआत खरगोन में पुलिस विभाग की ओर से आयोजित एक संगोष्‍ठी में दिये गये कृषि वैज्ञानिक डा. अनिता शुक्ला के इस बयान से कि ''अगर वह छह लोगों से घिर गयी थी तो अपने को सौंप क्यों नहीं दिया।’’ वैसे तो उन्होंने और भी बातें कहीं थीं, लेकिन और बातों से मैं सहमत नहीं हूं, इसलिये उन बातों का जिक्र नहीं कर रहा हूं। डा. अनिता शुक्ला के इस बयान पर कि ‘‘अगर वह छह लोगों से घिर गयी थी तो अपने को सौंप क्यों नहीं दिया’’ जर्बदस्त आलोचन हुयी।

यह कहा गया कि मोहतरमा ने ऐसा कह कर देश की बहादुर बेटी की हिम्मत का अपमान किया है जिसने अपनी इज्जत को बचाने के लिये अपनी जान तक दे दी। पूरे देश में दिल्ली गैंग रेप की पीड़िता को बहादुर बेटी कहा गया। उसकी इसलिये व्यापक पैमाने पर सराहना हुयी क्योंकि उसने अपनी इज्जत बचाने के लिये छह बलात्कारियों से जी जान से संघर्ष किया कि और आखिरकार उसने अपनी इज्जत बचाने के लिये जान तक दे दी।

यहां सवाल उठाता है कि आखिर यह इज्जत या आबरू क्या चीज है जिसे बचाने के लिये जान तक दे दिया जाना चाहिये। जान रहे या नहीं रहे, इज्जत नहीं जाने देना चाहिये। मतलब यह कि एक स्त्री के लिये इज्जत, जान से भी बड़ी चीज है और जिसकी इज्जत लूट ली जाये वह जीने के काबिल नहीं है। एक लड़की जान और इज्जत की दो गठरियां लिये पैदा होती है और हर लड़की एवं स्त्री को चाहिये कि वह इज्जत की गठरी की हमेशा रक्षा करे, इसके बचाने के लिये अगर जान की गठरी की कुर्बानी देनी पड़े तो इसमें देर नहीं करनी चाहिये, क्योंकि अगर इज्जत ही चली जाये तो फिर जान के बचने रहने से क्या फायदा।

संसद के पिछले शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में राष्‍ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष गिरिजा व्यास ने कहा था कि बलात्कार की शिकार महिला पल-पल मरती है। इसका लोकसभा में विपक्षी की नेता समेत सभी महिला सांसदों ने समर्थन किया। सवाल यह है कि बलात्कार की शिकार महिला के साथ ऐसा क्या हो जाता है जिसके कारण या तो वह जान दे देती है और जो जान देने की हिम्मत नहीं कर पाती है वह पल-पल मरती है।

हम अक्सर पढ़ते-सुनते रहते हैं और फिल्मों में भी देखते हैं कि बलात्कार की शिकार फलां महिला या लड़की ने आत्महत्या कर ली। क्यों? इसलिये कि उसकी अपनी इज्जत को बचा नहीं सकी। सवाल यह है कि लड़की को अपनी जान देकर भी अपनी इज्जत क्यों बचानी चाहिये। किसी अविवाहित लड़की को ऐसा इसलिये करना चाहिये ताकि सुहाग रात के समय अपने पति के समक्ष अपने को बिल्कुल शुद्ध रूप में पेश कर सके। अगर शादीशुदा महिला के साथ बलात्कार हो जाये तो तो यह माना जाता है कि वह पति के लिये जूठी हो गयी। जिस तरह से चिड़िया के बच्चे को अगर कोई छू ले तो वह अपने बच्चे को मार देती है। उसी तरह से अगर किसी महिला के शरीर का उपभोग (जबरन या बहला-फुसलाकर) कोई और कर ले तो वह अपने पति परमेश्‍वर के लिये अपवित्र हो जाती है और ऐसी अपवित्र लड़की या और से शादी कौन करेगा और अगर वह शादीशुदा है तो कौन सा मर्द उसके अपने घर में रखेगा। ऐसे में एक लड़की या औरत के लिये जिंदा रहने का अर्थ ही क्या है, इसलिये वह या तो आत्महत्या कर लेती है या पल-पल मरती रहती है।

इस सोच से हर लड़की किसी न किसी हद तक ग्रस्त होती है और इसलिये जब कोई उसके साथ जोर-जबर्दस्ती करता है तो उसे अपने शील की रक्षा करने के लिये अपनी जान तक दे दी है। चूंकि यही काम दामिनी ने किया और इसलिये वह देश की बहादुर बेटी है और उस पर हर देशवासियों को नाज है। इस आलेख का मतलब यह कतई नहीं कि कि अगर कोई या कुछ लोग सामूहिक बलात्कार करें तो उन्हें बिना विरोध के करने देना चाहिये। महिलाओं और लड़कियों की आत्मरक्षा अथवा हैवानों से बचने का प्रशिक्षण देने के दौरान क्या यह सीखाया जाता है कि अगर कोई लड़की कुछ दरिंदों से घिर जाये और उसके लिये अपनी इज्जत बचाने का कोई चारा नहीं रहे तो उसे अपनी जान दे देनी चाहिये।

अगर बलात्कार या यौन शोषण को तथाकथित इज्जत/आबरू की अवधारणा से परे होकर देखा जाये तो बलात्कार का सीधा मतलब यह है कि जबरन या बलपूवर्क स्थापित किया यौन संबंध। एक महिला अपने पूरे जीवन काल में कई हजार बार यौन संबंध स्थापित कर सकती है। जब वह अपने पति या प्रेमी के साथ अपनी सहमति से यौन संबंध स्थापित करती है, तो उसे कोई आपत्ति नहीं होती बल्कि उसे आनंद मिलता है, लेकिन अगर उसके साथ जबरन यौन संबंध स्थापित करे तो उसे नागवार गुजरना चाहिये और इसका हरसंभव विरोध किया जाना चाहिये, लेकिन यह कौन सी मानसिकता है कि किसी महिला के साथ अगर कोई या कुछ लोग जबरन यौन संबंध स्थापित कर लें तो अपनी इज्जत बचाने के लिये उसे जान तक दे देने में कोई कोताही नहीं करनी चाहिये।

यह माना जाता है कि पति का पत्नी की देह पर अधिकार है और जब पति जब मन आता है तब यौन संबंध स्थापित करता है, चाहे उसकी पत्नी मानसिक या शारीरिक रूप से तैयार हो या नहीं। इसका विरोध वह आम तौर पर नहीं करती। क्योंकि उसने मान लिया है कि उसका देह उसके पति के लिये है। जब कोई अविवाहित लड़की के साथ उसका कोई प्रेमी यौन संबंध स्थापित करता है तब भी वह विरोध नहीं करती, क्योंकि उसे लगता है कि वह प्रेम कर रही है, भले ही उसका प्रेमी प्यार करने का नाटक कर रहा होता है। कई बार यह भी होता है कि कोई पुरुष किसी महिला को शादी, नौकरी या पैसे का प्रलोभन देकर उसके साथ यौन संबंध स्थापित करता है और इसका भी तब तक विरोध नहीं होता जब तक कि यह साफ नहीं हो जाता कि वह पुरुष उसे धोखा दे रहा था।

जाहिर है कि यौन संबंध कोई कष्‍टकारक प्रक्रिया नहीं है और न ही यौन संबंध ऐसी प्रक्रिया है जो एक बार ही होती है या अगर किसी ने एक बार जबरन यौन संबंध स्थापित कर लिया तो उसका शील भंग हो जायेगा और वह समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी। इस समाज में तमाम कुकर्मी, घोटालेबाज, भ्रष्‍ट, अपराधी और पापी सीना तान कर चलते हैं। पाप धोने के लिये गंगा में स्नान कर लेते हैं। बच्चों की हत्या करने, मासूमों के साथ बलात्कार करने, दूसरे के हक को छीनने, किसानों को आत्महत्या के लिये मजबूर करने, देश को लूट कर खाने और तमाम तरह के अनैतिक काम करने से नेताओं, अपराधियों और किसी पुरुष की इज्जत नहीं जाती है, लेकिन अगर किसी महिला के साथ किसी ने जबरन यौन संबंध स्थापित लिया या उस महिला ने प्रलोभन में आकर या अपनी सहमति से किसी पर पुरुष के साथ संबंध स्थापित कर लिया तो उसकी इज्जत चली जायेगी। इस पाखंड को आधुनिकता और पश्चिमी विचारों में पली बढ़ी लड़कियां भी नहीं समझती है।

हर महिला और पुरुष को अपने शरीर पर केवल उसका पूरा अधिकार है। किसी को उसकी इजाजत के बगैर उसकी देह से छेड़खानी करने का अधिकार नहीं है। कोई अगर ऐसा करता है तो उसका कड़ा जवाब देना चाहिये। बलात्कार करने वाले या किसी महिला के साथ छेड़खानी करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिये, ताकि कोई ऐसा करने की हिम्मत नहीं कर सके। यही नहीं किसी भी महिला को अपने कौमार्य की रक्षा करने का अधिकार होना चाहिये और एक सभ्य समाज में उसके इस अधिकार का हर हाल में सम्मान होना चाहिये। उसकी मर्जी के विरूद्ध अगर कोई उसके साथ छेड़खानी करने की कोशिश करे या यौन शोषण करे तो उसका हर तरीके से प्रतिरोध करना चाहिये, क्योंकि यह उसके स्वविवेक पर अतिक्रमण है, लेकिन यह मानसिकता को पालना अथवा आज आधुनिक युग में ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देना कितना सही है – कि किसी लड़की या महिला को अपनी इज्जत को जान देकर भी बचानी चाहिये और अगर वह अपनी इज्जत बचाने में कामयाब नहीं हो पाये तो बाद में आत्महत्या कर लेनी चाहिये। क्या बलात्कार की कोशिश के दौरान अपनी इज्जत बचाने के लिये अपनी जान दे देने या बलात्कार के बाद अपनी जान दे देने की मानसिकता क्या महिला को गुलाम बनाये रखने की पुरुष मानसिकता का ही विस्तार नहीं है। यह सही है कि इस समाज को महिलाओं के प्रति अपनी मानसिकता बदलनी चाहिये, लेकिन एक महिला को भी अपनी मानसिकता क्या नहीं बदलनी चाहिये, जिसके कारण वह तथाकथित इज्जत को अपनी जान से भी अधिक महत्वपूर्ण मान बैठती है।

क्या इज्जत का पूरा चक्रव्यूह पुरुष समाज द्वारा इसलिये रचा गया है ताकि महिलाओं को अपने अधीन रखा जा सके। लेकिन हमारा आधुनिक समाज, महिला सशक्तीकरण की बात करने वाले नारीवादी, महिला संगठन, फेसबुक और मोबाइल जैसे आधुनिक आविष्‍कारों का उपभोग करने वाले लोग और हमेशा आधुनिक होने के दावे करने वाली युवा पीढ़ी भी यही मानती है कि महिला या स्त्री को अपनी इज्जत की रक्षा करने के लिये अपनी जान देकर बहादुर बेटी का खिताब हासिल करना चाहिये।

लेखक विनोद विप्लव पेशे से पत्रकार हैं। मोहम्मद रफी की उनकी लिखी जीवनी ‘‘मेरी आवाज सुनो’’ काफी लोकप्रिय हुयी। विभिन्न विषयों पर लिखे उनके आलेख, फीचर, कहानियां एवं व्यंग्य प्रमुख समाचार पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। उनका कहानी संग्रह, सिनेमा और स्वास्थ्य विषयों पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। उनका व्यंग्य संग्रह ‘‘ढिबरी न्यूज चैनल’’ शीघ्र प्रकाशित होने वाला है। बिहार में पांच नवम्बर, 1963 को जन्मे विनोद विप्लव भारतीय जनसंचार संस्थान (नयी दिल्ली) से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा करने के बाद पत्रकारिता से जुड़े। इस समय राष्‍ट्रीय संवाद समिति ‘‘यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया’’ से संबद्ध भारतीय भाषाओं की संवाद समिति ‘‘यूनीवार्ता’’ में विशेष संवाददाता हैं

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