इटली के दलालों की भारत पर कृपा बनी हुई है

: हेलिकॉप्टर सौदे पर सवालों का घेरा : इटली के दलालों की भारत पर कृपा बनी हुई है। अब से लगभग 25 साल पहले ओत्तावियो क्वात्रोचि ने ऐसी टंगड़ी मारी थी कि कांग्रेस पार्टी कई साल तक सत्ता के गलियारे से बाहर बैठी रही। बोफोर्स के उस सौदे में सिर्फ 64 करोड़ की रिश्वत थी, लेकिन हेलिकॉप्टरों के इस सौदे में सिर्फ रिश्वत ही रिश्वत साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए की है। पता नहीं, इतनी बड़ी रिश्वत डकारने वाले लोग अब कितने वर्षों तक सत्ता से बाहर रहेंगे? इस दुर्भाग्य का श्रेय भी इटली की कंपनी फिनमेक्कानिका के सरगना गिसेप ओर्सी को मिलेगा।

वैसे अभी डरने की कोई बात नहीं है। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने सीबीआई की जांच बिठा दी है। जैसे बोफोर्स कांड में यह सर्वमान्य तथ्य था कि 64 करोड़ रुपए की रिश्वत खाई गई है, वैसे ही हेलिकॉप्टरों के लिए साढ़े तीन अरब की रिश्वत के तथ्य को भी सभी स्वीकार कर लेंगे। दोनों रिश्वतों में देने वालों का नाम भी पता चल गया है, लेकिन लेने वाला कौन है, इसका पता न तो बोफोर्स में चला था और न ही इन हेलिकॉप्टरों में चलेगा। पहले हमारी सरकार की साख को तोपों ने उड़ा दिया था, अब उसे हेलिकॉप्टर उड़ा ले जाएंगे।

अच्छा है कि इटली की सरकार ने अगस्तावेस्टलैंड कंपनी के जिन अधिकारियों को गिरफ्तार किया है, उन्होंने हमारे नेताओं में से किसी का भी नाम नहीं लिया है। लेकिन तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी और उनके तीन रिश्तेदारों के नाम साफ-साफ बताए हैं। उन्होंने एयर मार्शल त्यागी से अपनी मुलाकातों का भी ब्योरा दिया है। त्यागी ने उन विदेशी दलालों से मिलने की भी पुष्टि की है, लेकिन उन्होंने अपने बचाव में दो मुख्य तर्क दिए हैं। एक तो इस 3700 करोड़ रुपए के समझौते पर दस्तखत उनकी सेवानिवृत्ति के बाद हुए हैं और दूसरा इन हेलिकॉप्टरों की खरीद के लिए शर्तों को 2003 में ढीला किया गया था। उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनका यह कहना तो हास्यास्पद है कि उनके चचेरे भाई क्या कामकाज करते हैं, यह उन्हें पता नहीं है। जिन दलाल भाइयों के दफ्तर में वे अपनी वर्दी पहनकर जाते रहे और जिनके यहां उन विदेशी दलालों से मिलते रहे, उनके बारे में बेखबर रहने की बात पर कौन विश्वास करेगा?

यहां मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि समझौते पर दस्तखत कब हुए और हेलिकॉप्टर कब भारत आए, असली प्रश्न यह है कि रिश्वत खाई गई या नहीं? और खाई तो किसने खाई? त्यागी के वायुसेना प्रमुख रहते हुए इस सौदे की वार्ता चली या नहीं? सौदेबाजी हुई या नहीं? अब त्यागी को आत्मरक्षा में जमीन-आसमान एक करना होगा। यह पहली बार है कि किसी सेनाध्यक्ष का नाम सीधा-सीधा उछल रहा है। यह संदेह इसलिए भी पुष्ट होता है कि पूर्व थल-सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने दो-टूक शब्दों में कहा था कि ट्रेटा ट्रक की खरीद में उन्हें रिश्वत का लालच दिया गया था।

यदि सचमुच एसपी त्यागी बिल्कुल पाक-साफ हैं तो यह और भी बड़ी मुसीबत बन सकती है। यदि ऐसा है तो साढ़े तीन अरब रुपया गया कहां? यदि रक्षामंत्री एके एंटनी की जांच गहरे में चली गई और त्यागी ने सभी नाम उजागर कर दिए तो वह गडग़ड़ाहट बोफोर्स की तोपों से भी सौगुनी ज्यादा कानफोड़ू हो जाएगी। तब पता नहीं, किसकी बलि चढ़ेगी? तब प्रश्न यह भी उठेगा कि जिन्होंने 3700 करोड़ रुपए की खरीद पर मुहर लगाई, उनकी जिम्मेदारी कितनी है? उन्होंने खुद रिश्वत नहीं खाई, लेकिन रिश्वत खाने दी, क्या यह कम बड़ा अपराध है? किसी भी लोकतंत्र में रिश्वत खाने से बड़ा अपराध रिश्वत खाने देना माना जाना चाहिए। सरकार का काम जनता के पैसे की चौकीदारी करना है। यदि चौकीदार की आंखों के सामने लूट मची है और वह उस पर मुहर लगा रहा है तो आप उसे क्या कहेंगे?

360 करोड़ यानी साढ़े तीन अरब रुपए की रिश्वत इटेलियन कंपनी ने दी। क्या यह पैसा उसने अपनी जेब से दिया? नहीं, रिश्वत का यह पैसा हेलिकॉप्टरों की कुल कीमत में जोड़ दिया गया, जिसका भुगतान भारत सरकार को करना है। यानी गरीब जनता का पैसा हमारे नेताओं और अफसरों ने लूट खाया। कितनी विडंबना है कि रिश्वत देने वाले इटली में गिरफ्तार कर लिए गए हैं, जबकि लेने वालों का अभी पता ही नहीं है। इस कांड का भंडाफोड़ इटली में साल भर पहले ही हो चुका है, लेकिन हमारी सरकार अपनी कुंभकर्णी मुद्रा में लेटी रही। शायद वह जनता से यह बात छुपाना चाहती हो कि उसने अरबों-खरबों रुपए के ये हेलिकॉप्टर सिर्फ बड़े नेताओं की यात्रा के लिए खरीदे हैं। लगभग इसी तरह के खर्चीले हेलिकॉप्टरों को खरीदने से ओबामा ने मना कर दिया था। भारतीय नेताओं ने अपने इस खर्चे पर रिश्वत भी चलने दी, क्या यह हद दर्ज की मक्कारी नहीं है? ऐसी मक्कारी करते हुए पकड़े जाने पर कोई भी इज्जतदार नेता अपने पद पर रहना पसंद नहीं करेगा और जनता अगर जागरूक है तो वह उन्हें कान पकड़कर चलता करेगी।

हमारी सरकार और मंत्री गण यह कहकर अपनी खाल नहीं बचा सकते कि उन्हें रिश्वत का पता चल जाता तो वे यह सौदा रद्द कर देते, जैसी कि वे अब घोषणा कर रहे हैं। क्या ऐसी बातों का पता रखना उनका धर्म नहीं है? उन्हें सीबीआई, गुप्तचर ब्यूरो, सैन्य गुप्तचरी, टेलीफोन टेपिंग आदि की अगणित सुविधाएं क्यों दे रखी हैं? इन सुविधाओं का इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध वे जितनी फुर्ती से करते हैं, यदि उतनी ही दक्षता से वे सब बड़े सरकारी सौदों पर ध्यान रखें तो इतने भयंकर घोटाले हो ही क्यों? वर्तमान सरकार के दौरान लाखों करोड़ रुपए के घोटाले हो चुके हैं। यह राशि इतनी बड़ी है कि इसे यदि सरकार हस्तगत कर ले तो उसे अगले चार-पांच साल तक किसी भी नागरिक से कोई टैक्स लेने की भी जरूरत नहीं पड़े। यदि यह राशि बांट दी जाए तो भारत का हर नागरिक लखपति बन जाए। भारत के हर नागरिक को शिक्षित और स्वस्थ रखा जा सकता है, इस राशि में! जो सरकार भ्रष्टाचार पर आंखें मूंदे रखती है, वह भारत की गरीब जनता से दुश्मनी करती है।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्‍ठ पत्रकार तथा विचारक हैं.

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