इतनी दुरात्माओं में से एक घनघोर दुरात्मा को चुनना आसान नहीं

: मुझे बस मतदान करना है!!! : राधे-राधे यश जी, राधे-राधे. आशा है सकुशल होंगे. अपन की भी मौज है. विगत दो दिनों से आनंदित हूँ. मन बहुत हल्का है. मुझे शपथ दिलाई गयी. मतदान करो. राजनीति करो. मैंने शपथ ले ली. एक उछाह उठ रही है. बस चुनाव हों और मैं मतदान करूँ. पूरा दिन मन इसी भाव में रमा रहता है. अनामिका मध्यमिका बरबस उठ जातीं हैं. उठी ही रहती है. लोग बुरा मान जाते हैं. आपत्ति करते है. मेरे मन में लेश मात्र भी छिछोरपन नहीं है. अनामिका मध्यमिका का उठना मतदान की तीव्र इच्छा का प्रकटीकरण है.

कोई भी चुनाव हो. पंचायत का हो. नगर पालिका/ निगम का हो. विधान सभा का हो. संसद का हो. मुझे बस मतदान करना है. अमरीका में ज़रुरत पड़ेगी तो वहां भी करूँगा . अब फल  की चिंता नहीं रही. प्रकाश फूट पड़ा है अन्दर. अपना सिर्फ कर्म से मतलब है. मतदान करना है. यश जी आप ये पत्र पढ़ रहे हो तो मेरी आत्मा की पुकार लोगों तक पहुंचा दो. कोई भी हो. संत हो. लंठ हो. ब्रह्मचारी हो. दुराचारी हो. भ्रष्टाचारी हो. बलात्कारी हो. भांड. रांड. सांड. कोई भी हो. सबका स्वागत है. मैं सबके आगे विनय से नत हूँ. आये और मेरा मत ले जाए. चरित्र तुच्छ है.

किसी के चरित्र से अब मुझे प्रयोजन नहीं. मैंने उस पार जाके देख लिया. मूल में सब सामान हैं. वर्षा पे मेरा बस नहीं. झंझावातों पे मेरा बस नहीं. किसे टिकट मिलेगा इसपे भी मेरा बस नहीं. मुन्ना बजरंगी जी की जय. राहुल बाबा की जय. हम कौन हैं, पता नहीं. कहाँ से आये हैं, पता नहीं. कहाँ जाना है, पता नहीं. क्या लेके आये थे, कुछ नहीं. क्या लेके जायेंगे, कुछ नहीं. पर नहीं, हम इस संसार को कुछ दे कर जा सकते हैं. मत का दान कर के जा सकते हैं. यज्ञ हमारी परंपरा है. संस्कृति हैं. चुनाव यज्ञ है. मैं आहुति दूंगा. मतदान करूँगा. देव प्रकट हों या दानव. सबको नमस्कार.
 
आपका विस्मित होना स्वाभाविक है. मतदाता दिवस था. पूरा बरेली सड़कों चौराहों पे था.  ना लिंग का भेद था ना वय का. सब शपथ ले रहे थे. मतदान की. राजनीति की. (युवतियों को शपथ दिलाने में आगे रखने का सुविचार जिस शिकारी का था, उत्तम था. एक बार सुंदरियां किसी कार्य के लिए तैयार हो गयीं तो समझिये युवक उस कार्य के लिए मरने को भी तैयार हैं) . पांचाल के सभी दिव्य-पुरुष शपथ पट्टिका पे हस्ताक्षर कर रहे थे. मान्य कमिश्नर, मान्य डी.एम., मान्य आईजी, मान्य डीआईजी, मान्य आदि, मान्य इत्यादि. कुर्सी पाने के दिन से जो करते आ रहे थे उसे पुष्ट कर रहे थे.
 
महान दृश्य था. मेरा काइनेटिक होंडा साक्षी है. बुद्धत्व घट गया. वे ताउम्र देशना करते रहे. मैं मतदान करूँगा. सारे प्रश्न गिर गए. देश की चिंता थी. जाती रही. अंग्रेजी में लोकतंत्र को अर्नब गोस्वामी सम्हाल लेंगे. हिंदी में रवीश कुमार. युवराजों की जो नई खरपतवार आई है. वो भ्रष्टाचार की फसल को नष्ट कर देगी. जो थोड़ा किन्तु-परन्तु रहता भी है, उसे सुधारने के लिए बड़े फौजी अब तैयार हैं. लोक रहेगा. तंत्र रहेगा. मेरा होना ना होना महत्वपूर्ण नहीं है. देश आज भी सोने की चिड़िया है. दूध की नदियाँ आज भी बहतीं हैं. धनपतियों से पूछ लो. राजनेताओं से पूछ लो. अफसरों से पूछ लो. माफियाओं से पूछ लो. कुछ  बच्चे कुपोषित पाए गए हैं. उन्हें पन्नी से ढँक देंगे. दुआ साहब का 'ज़ायका इंडिया का' रोज़ सुबह शाम दिखायेंगे. दिक्कत कोई नहीं है. देश सारे जहाँ से अच्छा है. मैं मुक्त हुआ. अब निष्काम कर्म करना है. मतदान करना है.
 
सुनो यशवंत जी, मन गया. प्रश्न गए. संशय अब मुझे होता नहीं. कानों में सीसा है. आँखें खुद से देखतीं नहीं. तुम जो दिखाओ, जैसा दिखाओ  वही देखतीं हैं. तुम जो समझाओगे मैं समझ जाऊंगा. तुम दबाओगे मैं दब जाऊंगा. मैं मुक्त क्या हुआ प्रकारांतर से मैं प्रधानमंत्री पद का सशक्त दावेदार हो गया.  एक शपथ. एक क्षण. और सब बदल गया. दिल से दुआ निकल रही है. जहन्नुमनशीं होंगे वो जिन्होंने ये शपथ दिलाई. मुझे फंसा दिया. इतनी दुरात्माओं में से एक घनघोर दुरात्मा को चुनना आसान नहीं. पर करना तो पड़ेगा. लोकतंत्र का प्रश्न है. सारा बोझ  मेरे कंधों पे डाल दिया कमबख्तों नें. ##$#@@@%%&&@$$$@$$@$@&&&%^$%^&*^^….

….. भड़ास जारी आहे….

कुशल प्रताप सिंह

बरेली

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