इन ताकतों ने तो समाज और मीडिया के पूरे चरित्र को बदल डाला

: याने जब पांच साल का बच्चा टाफी के लिए किसी का भी पैर पकड़ लेता है तो बाल गरिमा को कोई क्षति नहीं होती और जब महज पावडर के महक पर एक नहीं दर्जन भर युवतियां अपना सब कुछ न्योछावर करने की मुद्रा में एक युवक के पीछे भागती हैं तो स्त्री-गरिमा को कुछ नहीं होता… वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह का विश्लेषण....

टीवी में एक विज्ञापन आता है. कच्चे आम के किसी टाफी उत्पाद को पाने की लालच में एक अपेक्षाकृत संभ्रांत घर का दीखने वाला बच्चा किसी अन्य महिला को पहले तो मम्मी कहते हुआ पीछे पड़ता है और जब वह महिला टाफी देने की जगह उसे दुत्कार कर आगे बढ़ती है तो वह बच्चा उसका पैर पकड़ लेता है और जब फिर दुत्कारा जाता है यह कह कर वह उसकी मम्मी नहीं है तो पैर पकड़े वह बच्चा उसे “मां” कहता है.

एक अन्य विज्ञापन में महज एक पावडर लगाने वाले युवक के पीछे लड़कियाँ भागने लगाती हैं और फिर उससे आसक्ति में चिपक जाती हैं. मुद्रा कामुक होती है. भारतीय कानून, न्यायपालिका और बाल एवं महिला अधिकार से जुड़े तमाम संगठन लगातार अखबारों व टीवी चैनलों को ताकीद करते रहते हैं अपराध की खबर देते वक़्त इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि बच्चों और महिलाओं की गरिमा ना गिरे और चित्र या तो दिए ना जाएँ.

याने जब पांच साल का बच्चा टाफी के लिए किसी का भी पैर पकड़ लेता है तो बाल गरिमा को कोई क्षति नहीं होती और जब महज पावडर के महक पर एक नहीं दर्जन भर युवतियां अपना सब कुछ न्योछावर करने की मुद्रा में एक युवक के पीछे भागती हैं तो स्त्री-गरिमा को कुछ नहीं होता.

बाजारी ताक़तों ने ना केवल गरिमा की परिभाषा बदल दी है बल्कि हमारे प्रतिमान भी बदल दिए हैं. साथ ही मूल्य-आधारित रिश्तों में यहाँ तक प्रभाव डाला है कि एक बाप अपने बेटे से यह नहीं कह पा रहा है कि बेटे शाम को पढ़ा करो. पढ़ने से न केवल व्यक्ति में गुणात्मक परिवर्तन होता है बल्कि भौतिक तरक्की के लिए भी यह ज़रूरी है.      

तीसरा उदहारण लें. टीवी के एक अन्य कार्यक्रम में, जिसे “प्रतिभा खोज” की संज्ञा दी जाती है, में जजों द्वारा यह बताया जाता है कि कैसे एक डांस करनेवाला बच्चा देश में नाम कमाएगा. ऐसा आभासित होता है जैसे इस प्रोग्राम में शामिल और सफल होने वाला बच्चा भविष्य का गाँधी, लिंकन, भाभा या जगदीश चन्द्र बोस बनाने जा रहा हो. उन बच्चों के माँ-बाप यह बाईट देते हैं कि बच्चे को इस मंच पर लाना उनका और उन बच्चों का सपना था जो पूरा हो गया.

आपने एक भी कार्यक्रम  नहीं देखा होगा जिसमे यह बताया  जाता हो कि दूसरे की टाफी का लालच नहीं किया जाता या अगर  मां-बाप टॉफी नहीं दे सकते तो दूसरी महिला को मां कह कर पैर पकड़ना अपनी गरिमा के खिलाफ है. यह भी नहीं बताया  जाता कि प्रतिमान नाचने वाले लडके कि जगह सी बी एस सी का टापर या आई आई टी में आना वाला भी होता है. बाजारी ताक़तों को दूसरा उदाहरण रास नहीं आता क्योंकि इससे ना तो टाफी बिकती है ना ही पावडर. और इन्हें बेचने के लिए अगर किसी गरिमा गिरती है तो क्या फर्क पड़ता है. वैसे भी गरिमा टाइप के भाव के लिए बैलंस-शीट में कोई जगह नहीं बनी है.

पुराने ज़माने में जब कोई राजा दूसरे राज्य पर जीत हासिल कर लेता था तो अगले कुछ दिनों के लिए अपने सैनिकों को खुली छूट दे देता था लूट, हत्या और बलात्कार करने की. मकसद यह होता था कि विजित समाज का स्वाभिमान (सेन्स आफ प्राइड) ख़त्म कर दिया जाये और बलात्कार के शिकार समाज को अपने स्वाभिमान को फिर से हासिल करने में दशकों का काल लग जाता था. वर्तमान में बाजारू ताकतों ने बगैर लड़ाई जीते या बलात्कार किये यह हासिल कर लिया है.

किसी बड़े होटल में अगर छोटी कार लेकर जाते हैं तो दरबान आपकी तरफ देखता भी नहीं है और उसकी जगह लम्बी गाड़ी से उतरने वाले व्यक्ति के लिए ना केवल दरवाजा खोलता है बल्कि जबरदस्त सलामी ठोकता है. छोटी गाड़ी में बैठी महिला के लिए यह बाजारी ताक़तों का सन्देश होता है कि सलामी ठोकवाना हो तो लम्बी गाड़ी में आओ. उसका अपने पति पर एक अदृश्य दबाव होता है कि कुछ भी करो पर गाड़ी बड़ी लेना ही परिवार के सुख-चैन की सीढ़ी है.

इन ताकतों ने ही मीडिया के पूरे चरित्र को बदल डाला. तरीका बहुत ही सरल था. टैम मीटर (टी आर पी याने दर्शकों की पसंद –नापसंद नापने का यन्त्र ) उन्हीं बड़े शहरों में लगाये गए जहाँ के लोगों की क्रय—शक्ति बेहतर है या जो रोटी जीत चुके है. उदाहरण के तौर पर पूरे उत्तर-पूर्वी भारत में पिछले दस सालों में एक भी टाम मीटर नहीं लगे नहीं समूचे बिहार में क्योंकि यहाँ के लोग अभी भी रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. बिहार में दो साल पहले मात्र १६५ मीटर्स लगाए गए जबकि आबादी १०.५० करोड़ है. वहीं  अहमदाबाद जिसकी जनसँख्या मात्र ३५ लाख है पिछले १२ साल से १९५ मीटर्स लगे हुए हैं. नतीजा यह रहा कि बिहार में सूखा पड़ना या खाद की कमी होना या थाने में बलात्कर होना खबर नहीं बन सका जबकि मुंबई में बारिश पर चैनल दिन-रात हांफ-हांफ के बताने लगे क्योंकि टीआरपी आयेगा तो विज्ञापन आयेगा और तभी संपादक से रिपोर्टर तक को तनख्वाह मिलेगी.   

हर समाज में प्रतिमान बनाने की एक स्वतः प्रक्रिया होती है. आज से ४० साल पहले बिरले सभ्रांत वर्ग का बच्चा ऐसे ओछी हरकत करता था और अगर एक बार कर भी दिया तो उसे पूरी तरह अपने गरिमा को बनाये रखने की शिक्षा माँ-बाप से मिलाती थी. दुबारा वह ऐसे हरकत शायाद ही करता था. बच्चो को पाठ्य पुस्तकों के ज़रिये बताया जाता था कि किस तरह राणा प्रताप घास की रोटी अपने व परिवार को खिलाते रहे पर आधीनता नहीं स्वीकार की. उन्हें गाँधी, तिलक , बोस या आज़ाद और भगत सिंह के बारे में बताया जाता था. और ये महापुरुष हमारे प्रतिमान बनाते थे.

बाजारी ताक़तों का मानना था कि जिन समाज में ऐसे प्रतिमान होंगे उसमें दस रु किलो का आलू ४०० रुपये बेचना मुश्किल होगा. लिहाज़ा पहली ज़रूरत है इन माध्यम वर्ग के बाल मस्तिष्क को नियंत्रित करना ताकि उसकी सोचने की क्षमता को ख़त्म किया जा सके, उसके तर्क शक्ति को कुंठित किया जा सके. और ये बाजारू ताक़तें इसमें काफी हद तक सफल रहीं. भारतीय समाज को हर शाम को अफीम के इंजेक्सन की तरह सचिन के छक्के दिखा कर सुला दिया जाता है और अगली सुबह राखी सावंत के डांस से जगा दिया जाता है. देश में प्रतिभा महज डांस करने वाले बच्चे में महदूद हो गई है. पढाई में प्रथम आने वाला छात्र तो बेवकूफ़ दिखाई देने लगा है.   

अब ज़रा तस्वीर का दूसरा पहलू देखिये. राष्ट्रीय ध्वज को लेकर एक कार्टून बनाता है और उस पर राज्य सरकार देशद्रोह का मुक़दमा कायम करती है. राष्ट्रीयता की बात करने वाले तमाम संगठन जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस कार्टून बनाने वाले युवा की जबरदस्त निंदा करते हैं. उधर देश की न्यायपालिका से लेकर बाल अधिकार संगठन इस बात पर आपत्ति दर्ज करते है कि अपराध की खबर दिखाते वक़्त बच्चों की तस्वीर ना दिखाई जाये. इससे बाल गरिमा आहत होती है.

प्रश्न यह है कि क्या टाफी के लिए किसी के पैर  छूने वाले बच्चे से, जिसका  “सेन्स आफ प्राइड “ (आत्म-सम्मान का भाव) पांच  साल की अवस्था से ही ख़त्म कर दिया गया हो, राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा बनाए रखने की उम्मीद की जा सकती है? यह भी प्रश्न उठाता  है कि क्या यह बच्चा बड़ा  होकर सच्चरित्र व्यक्ति बन पायेगा? सफल एवं स्वस्थ प्रजातंत्र की पहली शर्त है कि समाज में  व्यक्ति की गुणवत्ता, उसकी  समसामयिक विषयों पर समझ और तर्क शक्ति बेहतर हो ताकि सामूहिक चेतना जनोपादेयता के मुद्दों विकसित कि जा सके.  लेकिन भारत में बाजारी ताक़तों ने समाज के मर्म-स्थल पर कुठाराघात किया है ताकि आदमी महज उपभोक्ता सामग्री खरीदने वाली मशीन बन से अधिक कुछ  ना रह पाए.

लेखक एनके सिंह जाने-माने पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्यूज समेत कई चैनलों-अखबारों में संपादक रहे. वे ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव भी हैं. उनसे संपर्क singh.nk1994@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. एनके सिंह के लिखे अन्य बेबाक लेखों-विश्लेषणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- भड़ास पर एनके

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