इलाहाबाद में एसओ की हत्या और पुलिस की बेचारगी : कुछ सवाल

इलाहाबाद। यमुनापार के बारा एसओ का दिनदहाड़े कत्ल जिले में अपराधियों के बेखौफ होने और ‘लाचार-खाकी’ को एक बार फिर से साबित कर दिया। पुलिसकर्मियों की दोयम दर्जे की कार्यप्रणाली और मनमानी से लेकर अफसरों के धृतराष्ट्र बन चुपचाप तमाशा देखने की विवशता का नतीजा है। लबेरोड दिनदहाड़े थानेदार की हत्या ने लॉ-आर्डर की ऐसी तैसी कर दी है।

सपा मुखिया मुलायम सिंह के ‘मुलायम-समाजवाद’ को छोड़िए, वह तो अब पुराना पड़ गया। अब नए रंग-रूप में लिपे पुते सपा के युवराज कहे जाने वाले ‘टीपू-सुल्तान’ अखिलेश बाबू यानि नए ब्रांड वाली सपा का यह चेहरा है। पता नहीं क्यों, सपा के अलंबरदार और शासन के ओहदेदार कुर्सियों पर बैठने वाले हुक्मरान इस जंगलराज को नहीं देख पा रहे हैं।

बहरहाल, एसओ बारा की दिनदहाड़े हत्या से कानून व्यवस्था एक बार फिर औंधेमुंह गिरी दिख रही है। जब पुलिस ही सुरक्षित नहीं तो आम आदमी की क्या दशा होगी, सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। आग लगने के बाद कुंआ खोदने वाली परंपरा बंद करिए डीजीपी साहब! मातहत अफसरों से थानों का गोपनीय निरीक्षण कराइए, देखिए कि किस तरह से थाने में अपराधी कुर्सी पर बैठे और थानेदार को आदेश देते नजर आते हैं।

तीन महीने पहले इलाहाबाद के बगल प्रतापगढ़ जिले के कुंडा में डिप्टी एसपी जियाउल हक को खाकी ने अकेले छोड़ मौत के मुंह में धकेल दिया था। पूरे देश में तहलका मचा पर पुलिस अफसरों ने कोई सबक नहीं लिया। 14 जून को यमुनापार के बारा क्षेत्र में भी वही कहानी दुहराई गई। अकेले बदमाशों का पीछा कर रहे थानेदार को सूचना के एक घंटे बाद भी अगल बगल के थाने से लेकर खुद बारा थाना की पुलिस कोई मदद नहीं पहुंचा सकी। ऐसे गंभीर मामले में पुलिस का यह रवैया कितना काबिले-बर्दाश्त है।

जवाब मांगते सवाल- एसओ बारा के दिनदहाड़े लबेरोड हुए कत्ल तमाम ऐसे सवाल उठा रहे हैं जिनका जवाब अफसरों के पास भी नहीं है।

सवाल नंबर 1- बदमाशों का पीछा करने अकेले ही क्यों गए थे थानेदार, वह भी सादी वर्दी और पर्सनल कार से।

सवाल नंबर 2- हमराही और थाने की जीप क्यों नहीं ले गए। पीछा करते करते बारा थाना क्षेत्र के आगे शंकरगढ़ थाना क्षेत्र में पहुंच गए और शंकरगढ़ की पुलिस एसओ बारा के साथ नहीं लग सकी, आखिर क्यों?

सवाल नंबर 3- सत्रह किमी तक की दूरी, वह भी मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा, इलाहाबाद-बांदा राजमार्ग पर क्या पिकेट ड्यूटी पर कोई पुलिसकर्मी नहीं था?

सवाल नंबर 4-बदमाशों के फायर के जवाब में थानेदार अपनी सर्विस रिवाल्वर से फायर नहीं कर सके, आखिर क्यों?

सवाल नंबर 5- सूचना देने के एक घंटे बाद भी आसपास के थाने और खुद बारा थाना की पुलिस थानेदार की मदद में नहीं पहुंच सकी, आखिर क्यों?

इलाहाबाद, कौशांबी, प्रतापगढ़ में खाकी पर लगातार हमले हो रहे हैं और पुलिस का रवैया आम जनता के बीच बेचारी और बेबस पुलिस का बनता जा रहा है। बदमाशों की गोली के शिकार बने बारा एसओ आरपी द्विवेदी करीब एक साल पहले कटरा के चौकी इंचार्ज थे तब जिला कचहरी में दो सिपाहियों पर गोलीबारी की गई थी। गोली लगने से एक सिपाही का कान उड़ गया था। उस समय कटरा चौकी इंचार्ज रहे आरपी द्विवेदी ने बदमाशों का पीछा कर एक छात्रनेता को पकड़ा था।

पुलिस के लचर रवैए का नतीजा यह निकला कि उसी छात्रनेता ने चार अप्रैल 2013 को एसओ बीके सिंह पर अपट्रान चौराहे पर दिनदहाड़े गोली चला दी। खाकी पर यह बड़ा हमला था पर पुलिस बैकफुट पर रही। दो मार्च 2013 को कुंडा में डिप्टी एसपी जियाउल हक को गोली मारने के बाद लाठी-डंडों से पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया गया। साथ गए पुलिसकर्मी मुकाबला करने के बजाए वहां से भागकर खेतों में छिपे मिले।

चार्ज के लेने के एक घंटे बाद ही इलाहाबाद सिविललाइंस के सीओ सिराज अहमद को दिनदहाड़े लबेरोड दौड़ा लेने की घटना भी कम नहीं थी पर पुलिस ने तब भी सबक नहीं लिया। कौशांबी जिले में एक सिपाही को पीट पीट कर मार डाला गया। इलाहाबाद के पड़ोसी जिले प्रतापगढ़ में बिहार बाजार में एक सिपाही को गिराकर मारा गया। प्रतापगढ़ के ही सिटी चौकी के सिपाही अरविंद तिवारी को पीटने के बाद हमलावरों ने खौलता तेल शरीर पर डाल दिया गया। खाकी पर हमले दर हमले होते रहे और पुलिस बेचारी व असहाय की भूमिका में बनी रही।

एसओ बारा आरपी द्विवेदी के कातिलों को खोजने के लिए एसटीएफ से लेकर क्राइमब्रांच तक के अफसरों को लगाया गया है पर पुलिस चौबीस घंटे बाद भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। आशंका इस बात की भी है कि इस कत्ल केस के तार शंकरगढ़ इलाके के खनन माफिया या फिर चंबल क्षेत्र से सटे चित्रकूट के अपराधियों से जुड़े हो सकते हैं। बहरहाल, खाकी पर लगातार हो रहे हमले सूबे की कानून व्यवस्था पर भी सवाल उठा रहे हैं। इसे रोकना मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव के लिए बड़ी चुनौती है।

इलाहाबाद से शिवा शंकर पांडेय की रिपोर्ट
 

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