इससे अनिल यादव की मानसिकता ही नहीं बल्कि हिंदी पट्टी की जहनियत समझने के भी सूत्र मिलते हैं

: मुक्ति की जगह सिर्फ सेक्सुआलिटी विमर्श? और करेंगे वह भी स्त्री देह पर ही? : वैसे असली कहानी कुछ और ही थी. एक लड़की के (फिर वह जितनी भी महत्वाकांक्षी क्यों न रही हो) का अश्लील वीडियो बना लिए जाने की कहानी, उसके प्रतिरोध पर उस वीडिओ को सार्वजनिक कर दिए जाने की कहानी. और फिर उस लड़की द्वारा इस मामले में मौजूद एक प्रतिष्ठित संपादक से (फिर उसके उस संपादक से रिश्ते जो भी रहे हों) द्वारा हस्तक्षेप करने की माँग करने की कहानी और इस माँग के पूरा होने के पहले एक मारपीट और उसमे पुलिस आने की कहानी. कहानी तो खैर और भी थी, उस संपादक द्वारा पहले पुलिस को आने से रोकने की कोशिश करने और फिर आ जाने पर बहुत बढ़िया शराब के प्रस्ताव के साथ मामले को रफा दफ़ा करने की कोशिश की कहानी.

पर कहानियाँ जैसी होती हैं वैसी रह कहाँ पाती हैं. सो इस कहानी में उस लड़की (और उसके साथियों) की बेवकूफियों के चलते पहले तो पत्रकार होने का दावा करने वाला आशीष कुमार अंशु नामक एक घोर संघी, और अतिसंदिग्ध विश्वसनीयता वाला मोदीभक्त साम्प्रदायिक चरित्र कूदा जिसने कुछ एक और वामपंथी का शिकार कर लेने के उत्साह और कुछ टीआरपीखोरी में इस कहानी को सुना तो पूरा पर अपने ब्लॉग पर टुकड़ों में छापना शुरू किया. वह भी पत्रकारीय नैतिकता की (वैसे उसको पता न होगा कि ऐसी भी कोई बला होती है) ऐसी की तैसी करते हुए उस लड़की के नाम और तस्वीर के साथ. उस संघी ने एक और कमाल किया. उस आदमी को जिसे लड़की लगातार बाप समान कह रहा था उसे मुख्य अभियुक्त बना देने का कमाल और जिस पर वीडियो बनाने और सार्वजनिक करने की धमकी देने का आरोप था उसे अपने चरित्र के मुताबिक़ एक ‘नौकर’ भर बना दृश्य से गायब कर देने का कमाल. फिर तो उस संदिग्ध विश्सनीयता वाले संघी के साथ इस लड़की की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाने के सिवा होना भी क्या था? सो वही हुआ, और साथ में एक और कमाल हुआ. यौनहिंसा के मामलों में पीड़िता/शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखने,उस पर निजी हमले न करने की रवायत लोगों ने ब्लॉग ब्लॉग, फेसबुक फेसबुक रौंद डाली. रौंदते भी क्यों न, लड़की के अपने नाम और चेहरे के साथ सार्वजनिक हो जाने का तर्क तो इस संघी ने उन्हें दे ही दिया था.

सो साहिबान.. फिर इस कहानी में और तमाम किरदार कूदे. और किरदारों का तो क्या है कि वे जहाँ कूदते हैं अपनी जहनियत (फिर जिसमे अच्छाई हो या कुंठाओं से उपजा कमीनापन) ले कर ही कूदते हैं. सो कहने का यह हिस्सा (जो मैं पेश कर रहा हूँ) यह सब हो जाने के बाद का हिस्सा है.

मैने पहले ही शर्त रख दी थी कि मैं आपसे सिर्फ महिला लेखिकाओं और सेक्स व क्रिएटिविटी के बीच के धागों पर बात करना चाहता हूं. वे राजी थे  और जरा खुश भी. (अनिल यादव… राजेन्द्र यादव विरुद्ध ज्योति कुमारी मामले में बोलते हुए)

सिर्फ महिला लेखिकाओं (खाली लेखिकाओं भी पर्याप्त होता पर फिर) और सेक्स व क्रिएटिविटी के बीच के धागों पर बातचीत… इससे धमाकेदार विषय प्रवर्तन हो भी सकता है. बाकी समझ नहीं आया कि अनिल बाबू कहना क्या चाहते हैं.. यह कि उनके मुताबिक राजेन्द्र यादव की क्रिएटिविटी  सेक्स पर निर्भर है या महिलाओं के पास अपनी क्रिएटिविटी को व्यक्त करने का कोई जरिया नहीं है. आपको आ गया हो तो समझा जरुर दीजियेगा. अब आगे बढ़ते हैं..

और साहिबान.. विषय प्रवर्तन इतना शानदार हो, अंडे की भुजिया से उठ रही भाप हो, हाथ में पहला पेग हो तो साहित्यकारों की चर्चा में नई सनसनी का चला आना स्वाभाविक ही होगा. बाकी सनसनी? ज्योति कुमारी तो लेखिका हैं न, अनिल यादव के लिए वह सनसनी में कबसे और कैसे बदल गयीं पता ही नहीं चला. आपको पता चले, तो यह भी बताइयेगा. खैर.. अनिल जी (जो पहले कुछ ‘पुरानी लेखिकाओं के बारे में’ सुनना चाहते थे) को राजेन्द्र यादव ने ज्योति कुमारी की  ‘पैतृक पृष्ठभूमि, कलही दाम्पत्य, अलगाव, बीमार विचार का डिक्टेशन, बेस्ट सेलर लेखिका, नामवर सिंह की समीक्षा, महत्वाकांक्षा वगैरा से ऊबा डालने की सीमा पर ले जाकर कहा था “अच्छी लड़की है’…उन्होंने गर्व से कहा. उसके बिना मैं अब कुछ नहीं कर पाता.”

अनिल बाबू ने लेकिन सुना कुछ और. क्या सुना? यह कि “मैने सुना…मेरे अनुकूल लड़की है. इन दिनों जीवन में जो अच्छा है उसी की वजह से है.” और फिर वे खुद को कहाँ रोक सके? पूछ ही लिया- “अब तो शरीर निष्क्रिय हो चुका होगा. आप क्या कर पाते होंगे’.” अच्छी लड़की है, उसके बिना मैं कुछ नहीं कर पाता वाली राजेन्द्र यादव की बात अनिल यादव के लिए उसके साथ कुछ कर पाने की बात में कैसे और क्यों बदल गयी मुझे समझ नहीं आया. आपको आया हो तो यह भी समझाइएगा. आपको कोई भ्रम हो रहा हो तो खातिर जमा रखिये… अनिल यादव ने अगले सवाल में सब कुछ साफ़ कर दिया है.. ‘‘ये तो कोई चमत्कार ही होगा कि आप इस उम्र में भी सेक्सुअली एक्टिव होंगे.” पर रवायत तो बदनाम, बदचलन लड़कियों की बातों को सेक्स तक पंहुचाने की थी, अनिल बाबू ने राजेन्द्र यादव की ‘अच्छी लड़की’ को वहाँ तक कैसे पंहुचा दिया?

जी, यही वह सवाल है जिसके जवाब में अनिल यादव की मानसिकता के ही नहीं बल्कि यौन कुंठा, जातीय दंभ, धार्मिक घृणा और स्त्रीद्वेश के मूल चरित्र वाली हिंदी पट्टी की जहनियत को समझने के सूत्र मिलते हैं.

सोचिये तो, एक सद्यप्रसिद्द साहित्यकार की हिंदी के सबसे बड़े मठाधीशों में से एक से मिलने पर दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, मार्क्सवाद या ऐसा ही कुछ और नहीं बल्कि महिला लेखिकाओं (जी, दोनों एक साथ) सेक्स और क्रिएटिविटी के रिश्तों पर बात करने की ख्वाहिश रखता है. बल्कि यह कहें कि सिर्फ ख्वाहिश नहीं बल्कि यही उसकी शर्त भी होती है. (और साथ में यह मान लें कि राजेंद्र यादव ने मज़बूरी में यह शर्त मान ली नहीं तो इन जनाब से न मिल पाने पर उनका कितना बड़ा नुक्सान हो जाता). इस इंटरव्यू को पढ़ने के बाद से ही विश्व साहित्य ऐसा कोई और उदाहरण ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ जिसमे एक बड़े खूंटे ने नए बछड़े की शर्तों पर उसे बाँधा हो, मुझे तो मिला नहीं आपको मिले तो मुझे भी बता दीजियेगा.

खैर, इसके बाद जो हुआ वह हिंदी साहित्य के सबसे ज्यादा बिकने और पढ़े जाने वाले लेखक श्री मस्तराम के भदेस, लगभग जुगुप्साजनक विवरणों के ठीक उलट लगभग आध्य्तामिक निस्सारता लिए हुए है. फल की चिंता से मुक्त कर्मयोगी का उत्तर देते हुए बकौल अनिल, राजेंद्र यादव कहते हैं कि.. ‘मन नहीं मानता’… ‘कभी सीने से चिपका विपका लिया, सहला दिया. और क्या होना है.’  ध्यान रखियेगा कि राजेन्द्र यादव का यह बयान ‘बकौल अनिल’ है.  यह भी याद रखियेगा कि जाने कब हुई इस बातचीत के बारे में अनिल यादव साहब को सब कुछ याद है. यहाँ तक कि यह भी कि यह कहते हुए राजेन्द्र यादव ‘कुर्ते के गले के ऊपर ऊपर बेचैनी से पंजा हिला’ रहे थे. (रहम शराब पाक का कि न उन्होंने दूसरे पंजे का जिक्र नहीं किया न यह बताया कि राजेन्द्र यादव की बेचैनी उन्हें और कहाँ कहाँ ले जा सकती थी.  ऐसी याददाश्त की दाद मगर बनती है जिसे पंजों की पोजीशन तक ठीक ठीक याद हो).

हाँ इसके बाद जो है वह शाहकार है. अपनी कुंठा भरी इस भड़ास को ऐसे विमर्शकारी स्वर में तब्दील कर देना  इतना आसान थोड़े है महाराज! माने लगभग पागलपन की हद तक शुचिता (पढ़ें यौन इच्छाओं के दमन) के आग्रही इस समाज में एक पुरुष मठाधीश द्वारा संबंधों की अंतरंगता के स्वीकार और उन्हीं संबंधों को ज्योति कुमारी द्वारा पिता पुत्री का सम्बन्ध बताये जाने की पेंचीदगी को अनिल बाबू बरास्ते कामसूत्र, नियोग और न जाने क्या क्या सेक्सुआलिटी के विमर्श की जरूरत तक ले पंहुचते हैं. (कैसे यह हिमांशु पांड्या भाई ने अपने लेख में विस्तार से बताया है सो उस पर समय और ऊर्जा क्या लगाना. यहाँ पढ़ लें वह हिस्सा).

एक बात कमाल है. किसी भी पुरबिया गाँव की ट्यूबवेल (या नहर) की पुलिया पर बैठ दहेज़ की लालसा पूरी न हो पाने की वजह से विवाह में हो रही देर से कुंठित युवाओं की बातचीत के मूल स्वर वाली (अमे सुनबो, फलाने कै बिटियवा बहुत लाइन देत रही यार.. एक दिन लय गयेन भगान वाली अरहरिया में- कैशोर्य के एक मित्र की वीरगाथा है यह) इस बातचीत से स्त्री पक्ष वैसे ही गायब है जैसे उन तमाम बातचीतों से होता था. माने अनिल बाबू क्या मानते हैं कि राजेन्द्र यादव जैसे लोगों ने जो बोल दिया वही अंतिम सत्य है? या यह कि ज्योति कुमारी का सनसनी होना उनके द्वारा “खुद को धूमधड़ाके से प्रचारित करने के लिए” किये गए ऐसे ही किसी और “मैन्यूपुलेशन” से हुआ होगा? माने अनिल यादव पुरुष हैं तो अपनी प्रतिभा की वजह से लेखक हुए और ज्योति कुमारी स्त्री हैं तो अपनी यौनिकता को हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाली सनसनी जिसे कुछ लोग लेखिका मान भी सकते हैं?

हो सकता है कि अनिल बाबू वाली उस हसीन शाम से उलट  आपके कान बिना शराब पिए ही गरम हो जाएँ अगर मैं यह पूछूं कि ऐसा क्यों न मान लिया जाय कि अनिल यादव की हालिया सारी प्रसिद्धि उनके पुरुष संपादकों, समीक्षकों और आलोचकों से बनाए यौन संबंधों की बदौलत है? (स्त्री कहता पर अभी तक हिंदी साहित्य की इन चुनिन्दा जगहों पर पुरुष ही भरे पड़े हैं न). अरे.. स्तब्ध क्यों हो गए आप? पुरुषों के लिए भी कास्टिंग काउच कोई ऐसी अनसुनी बात तो है नहीं. अब फैशन इंडस्ट्री में हो सकती है तो हिंदी साहित्य में क्यों नहीं? (वैसे भी हिन्दुस्तानी साहित्य में ऐसे प्रसंग मिलते रहे हैं). यही नहीं, राजेंद्र यादव और तमाम पुरुष मठाधीशों से उपकृत ऐसे तमाम सनसनी पुरुषों की सफलता की वजह यही हो?

जी, यह असहजता है जो इस पूरे मामले का अगला पहलू खोलता है. स्त्री है तो अयोग्य है, बाकी जो है किसी की वजह से है. और फिर तो कितना आसान हो जाता है उस स्त्री की देह पर मुक्ति का विमर्श रचना.. उसे ज्ञान देना. और दुनिया को बताना कि वह लड़की राजेन्द्र यादव को पिता समान सिर्फ ‘एक कल्पित नायिका स्टेटस और शुचिता की उछाल पाने के लिए’ कर रही है. निष्कर्ष का आधार? दो पुरुषों की ऐसी बातचीत जिसमे वह स्त्री शामिल ही नहीं है. वह बातचीत जिसमे उसका पक्ष तक नहीं है? वह बातचीत भी जिसमे अनिल यादव का स्वयंभू नैतिक तेज है?
यहाँ एक बात साफ़ कर देना लाजमी है, यह कि न तो मैं राजेन्द्र यादव और ज्योति कुमारी के संबंधों पर कोई टिप्पणी कर रहा हूँ, न ही मैं समझता हूँ कि किसी को भी उस पर टिप्पणी करने का कोई हक है. दो बालिग़ लोग (उम्र का अंतर कितना भी बड़ा हो तमाम स्वयंभू नैतिकता दरोगाओं की कुंठा से कम ही लग रहा है) अपनी मर्जी से क्या सम्बन्ध बनाते हैं और क्यों बनाते हैं उस पर राय देने का किसी का कोई हक नहीं है.) आपको ज्योति कुमारी के सनसनी बन जाने से दिक्कत है तो उनके लेखन पर राय दीजिये, उसपर किताबों से लेकर इंटरनेट तक सब कुछ काला कर दीजिये पर यह जो आप कर रहे हैं अक्षम्य है.

अब दूसरी बात, कि आप अगर नैतिकता के संघियों से भी बड़े झंडाबरदार हैं, वामपंथ के प्रमोद मुथालिक हैं, प्रलेस/जलेस/जसम या किसी भी और संगठन के अन्दर मौजूद शिवसेना हैं तो भी इस मामले में दो मामले हैं और आपको दोनों अलग करके देखने होंगे. पहला मामला है राजेन्द्र यादव-ज्योति कुमारी के संबंधों का, जो आपकी नैतिकता को जितनी भी चोट पंहुचाये, आपराधिक मामला नहीं है. यहीं दूसरा मामला है ज्योति कुमारी का अश्लील (वहाँ भी ज्यादा दिमाग, या जो कुछ भी आप लगा सकते हैं मत लगाइए, अश्लील को बस अश्लील ही मानिए) वीडिओ बनाये जाने का या कम से कम उसकी धमकी दिए जाने का. यह आपराधिक मामला है और आपको ‘बेचारे प्रमोद’ से जितनी भी हमदर्दी उमड़ पड़ रही हो, वीडिओ बनाये जाने का जिक्र उसी ने किया है (तहलका की ‘स्टोरी’ के मुताबिक़ किशन भैया ने उसे बताया था) और फिर उस वीडिओ का जिक्र कर ज्योति कुमारी को राजेंद्र यादव के घर आने से मना करने का शाहकार कारनामा भी उसी शख्स ने अंजाम दिया है.

कमाल है कि तमाम लोगों को यह नुक्ता न दिख रहा है न समझ आ रहा है. ‘तहलका’ जैसी गंभीर पत्रिका भी ‘अनकहा पक्ष’ लेते हुए प्रमोद के वीडिओ वाले बयान को तो नजरअंदाज करती ही है, यह तक नहीं पूछती कि ज्योति कुमारी को राजेन्द्र यादव के घर आने से रोकने वाला प्रमोद कौन होता है? माने राजेन्द्र यादव ने मना किया नहीं, उनकी बेटी (जिनके नाम उस फ़्लैट के होने की खबर है उसने किया नहीं और यह साहब फोन करके उसे आने से मना कर रहे हैं और तहलका को दोनों बातें बड़ी नहीं लगतीं.  तहलका को तो खैर यह पूछने की जरूरत भी महसूस नहीं हुई कि वीडिओ बनाया किसने, और किस इरादे से? किसी स्त्री का अश्लील वीडिओ बना लेना कोई आपराधिक कृत्य थोड़े है आखिर, कलात्मकता है).

दिखा तो यह पक्ष अनिल यादव को भी नहीं, साहब ने प्रमोद को एक पंक्ति में निपटा दिया. वैसे साहिबान, पितृसत्तात्मक समाजों की ख़ास पहचान मरदाना कुंठा और असहज कर देने वाली महत्वाकांक्षाओं के बीच की तंग गली में अक्सर मिलने वाली यह जगह वही जगह है जहाँ अक्सर 'निष्पक्ष' संघी अपनी कुंठाओं के ठेले लगा लेते हैं.. पर फिर इसमें उनका क्या कसूर?

कसूर हमारा है, हमारी नारीवादी साथियों का है जिन्हें इस मसले का सबसे बड़ा नुक्ता या दिख ही नहीं रहा या उस नुक्ते को उन्होंने उस लड़की की निजी जिंदगी के निर्णयों से इस कदर जोड़ दिया है जिसके बाद उन्हें और कुछ दिख ही नहीं रहा.. मैं सिर्फ यह करूँगा कि उन नुक्तों को एक बार फिर साफ़ साफ़ रख दूं…

१. ज्योति को महत्वाकांक्षी कह उनके आरोप को ख़ारिज करने की कोशिश क्या हमारे अन्दर बच गयी पितृसत्ता का सबूत नहीं है? महत्वाकांक्षी होना अपराध कब से हो गया? आप महत्वाकांक्षी नहीं हैं? मैं नहीं हूँ? क्या बहुत बड़ा पत्रकार, नेता, या जो भी हमारा चुनाव है बन जाना हमारे सपनों में नहीं आता? फिर एक महिला की महत्वाकांक्षा को जो किसी और को नुक्सान नहीं पँहुचा रही उसी के खिलाफ हथियार बना देना सीधे सीधे सीधे अपनी प्रगतिशीलता के खिलाफ नहीं खड़ा हो जाता?

२. किसी स्त्री की महत्वाकांक्षा या उसकी निजी जिंदगी के निर्णय क्या किसी पुरुष को यह अधिकार डे देते हैं कि वह उसका अश्लील वीडियो बना ले/बना लेने की धमकी दे (तहलका के मुताबिक भी प्रमोद ने माना है कि वीडियो बनाने की जानकारी ज्योति कुमारी को उसने खुद दी थी, बाकी तहलका ने इसके आगे कुछ पूछा ही नहीं) और उसको किसी और के घर में आने से रोकने के लिए फोन करे? और फिर ऐसे आदमी को पीड़ित मानना, उसके लिए सहानुभूति से भर भर जाना, यह किस किस्म की समझ है?

३. और अंत में.. क्या आपराधिक मामलों में सामाजिक नैतिकता का घालमेल करना दक्षिणपंथी रवायत नहीं है? और लगे तो मथुरा बलात्कार मामले (तुकाराम विरुद्ध महाराष्ट्र सरकार, एआईआर 1979 सुप्रीम कोर्ट 185) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया मिसोजायनिस्ट यानी स्त्रीद्वेषी और जातीय पूर्वाग्रहपूर्ण फैसला हो (जिसमे उसने बॉम्बे उच्च न्यायालय का दो पुलिसकर्मियों को मथुरा नाम की नाबालिग के बलात्कार का दोषी ठहराते हुए सजा देने का फैसला यह तर्क देकर उलट दिया था कि पीडिता 'एक अनपढ़ और अनाथ आदिवासी लड़की' है और इसी कारण चरित्रहीन होगी याद करिये और इस फैसले का नारीवादी प्रतिकार भी. और हाँ… स्त्री मुक्ति के विमर्श किसी स्त्री की देह पर नहीं किये जा सकते साथी.

लेखक अविनाश पांडेय 'समर' अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी हैं और इन दिनों हांगकांग में पदस्थ हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


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