इस कांग्रेसी काटजू पर अब बात हो ही जानी चाहिए (भाग दो)

Yashwant Singh : इस कांग्रेसी काटजू पर अब बात हो ही जानी चाहिए…. संभव है नीचे जो लिंक दिया है, उस लेखन से आप सहमत नहीं हों लेकिन उम्मीद करता हूं कि बहस को आप आगे बढ़ाएंगे. आखिर कैसे एक आदमी की उन साजिशों पर चुप रहा जा सकता है जहां वह सोशल व न्यू मीडिया माध्यमों को कानून द्वारा नियंत्रित कराने की कोशिश रहा हो. पहले से ही आईटी एक्ट के तहत तमाम कानून हैं. फिर भी यह शख्स केंद्रीय मंत्रियों से गुहार लगाता फिर रहा है कि सोशल मीडिया पर थोड़ी पाबंदी लगा दो… पूरे प्रकरण पर मैंने अपना विचार रखा है, कुछ चिट्ठियां पेश की हैं.. इन चिट्ठियों को काटजू ने मंत्रियों को भेजा है. आप इसे पढ़ें, पढ़वाएं और जहां भी संभव हो प्रकाशित कराएं ताकि कारपोरेट मीडिया का कुछ न उखाड़ सकने वाले काटजू की अब सोशल मीडिया पर डंडा बरसाने की कोशिशों का पर्दाफाश किया जा सके. पूरे लेख का लिंक नीचे है.

http://bhadas4media.com/print/4010-abhishek-manu-singhvi-sex-cd-8.html

        Vikas Kumar : no case of disagreement!!! 100% correct and most needed comment!!! well begun!!!
 
        Tarun Kumar Tarun : काटजू का एजेंडा अबूझ और हास्यास्पद है. उनका अस्थिर चित्त उन्हें मुहम्मद बिन तुगलग की तरह अविश्वनीय और अप्रत्याशित शख्सियत बनाता है. एक तरफ वे मीडिया की आजादी की परोकारी करते हुए नीतीश सरकार को दिन-दहाड़े बिहार जाकर कोस आते है तो दूसरी सोशल मीडिया का गला घोंटवाने का घातक जुगाड़ करने में लगे है. क्या चाहते हैं वे ? क्या यह कुंठित व्यक्ति मूर्खाना और हास्यास्पद बयानों के बूते सुर्खियां बटोरकर मीडिया इतिहास का तुगलक बनने की राह पर नहीं है ? क्या वे कांग्रेस के जनविरोधी एजेण्डे पर कम कर रहे हैं ?
 
        Abhinav Shankar : यशवंत साहब!!!बचपन में हम लोगो ने संस्कृत का एक श्लोक पढ़ा था की गलत निति और गलत नियत में किसी एक का चुनाव करना हो तो बेझिझक गलत निति का चुनाव कर लो…क्यूंकि अगर नियत सही हो तो आगे निति बदली जा सकती है,लेकिन यदि नियत ही खोटी हो तो सही निति भी अंत में खोते परिणाम ही लाती है ..अन्ना और काटजू का अंतर इसी निति और नियत का है…मैं भी मानता हु की इन्टरनेट पर कुछ चीज़े आपत्तिजनक हो सकती है…और अगर इन्हें हतोत्साहित किया जा सके तो ये बहुत अच्छी बात होगी…नीतिगत ये सही होगा….लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं इनकी आड़ में खोटे नियत से आम आदमी की ताकत कम करने की चाल चली जाये…काटजू की निति इसी गलत नियत का शिकार है…और जहा तक अन्ना की बात है तो उनके लिए कहा जा सकता है की उनकी सही नियत गलत नीतियों का शिकार हो गयी है….लेकिन अन्ना और काटजू में एक को तय करते समय एक बुद्धिमान भारतीय संस्कृत के इस श्लोक को जरुर याद रखेगा!!!
    
        Vikash Mishra : यशवंत भाई, इन कांग्रेसियों का समय आ गया है, सोशल मीडिया पर लगाम लगाना इनके बस की बात नहीं , इन सब की कब्र खुदी पड़ी है बस दफ़न करना है l ये दहशत फ़ैलाने का काम करते है इनकी पतलून में नाडा ही नहीं है किसी को बांधेंगे कैसे अपनी पतलून बांध ले पहले l
      
        Mahendra Singh Gaharwar : पहले काटजू यह बताये कि जब वो और उनके लोग कहते है कि क़ानून तो बहुत है फिर जनलोकपाल जैसे कानून की क्या जरूरत है ? जो कानून मौजूद है उसीसे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगाया जा सकता है …..फिर मिडिया के मुद्दे पर इन्हें कानून बनाने का बड़ा शौक चढ़ रहा है…..काटजू सोशल मिडिया का नहीं इस देश की गरीबी का दुश्मन है ,भ्रष्टाचारियो का पोषक और पीड़ित जनता का दुश्मन.इस आदमी को यह भी नहीं पता कि कमसे कम अपनी नहीं तो उस पद कि अस्मिता को बरकरार रखे जिसकी वजह से आज उसका अस्तित्व है …..आखिर काटजू ने भी दबे मुह से ही सही स्वीकार कर ही लिया कि क्यों न जजों को भई जनलोकपाल के अंतर्गत आना चाहिए …..पहले राजा महराजाओं को खुश करने के लिए भाड़ हुआ करते थे,काटजू आखिर इतनी खूबसूरती से कैसे खुश कर रहे है……
         
Haresh Kumar सोशल मीडिया पर हंगामा क्यों? पुराने जमाने में राजाओं-महाराजाओं के यहां कुछ ऐसे सेवक/ चारण होते थे जो सदा उनके गुण गाते रहते थे और बदले में राजा उन्हें उचित इनाम दिया करते थे। ऐसे लोग राजा के गुणगान के लिए हर समय प्रयासरत रहते थे। आज के जमाने में भी ऐसे प्राणी/तत्व पाए जाते हैं, जो शासक वर्ग का गुणगान करने में ही अपनी सारी उर्जा लगा देता है। बस अंतर यह हो गया है कि राजे-रजवाड़ों का जमाना अब नहीं रहा और उनके बदले में भारत सहित अधिकांश देशों (कुछ देशों को छोड़कर) प्रजातंत्र आ गया। लोगों ने अपने मतों का प्रयोग करके नेताओं को गद्दी सौंपी और वे राज्य के नए मालिक हो गए। ना उन्हें जनता के हितों की फिक्र है और ना ही कोई चिंता। पांच बरस के बाद, फिर से वोट मांगने जब उन्हें हर दरवाजे पर दस्तक देनी होती है तो वे तरह-तरह के बहाने बनाते हैं और फिर अपने पुराने संबंधों की दुहाई देते हैं।

भारत के लोग बड़े ही दयालु किस्म के हैं और वे पुराने गिले-शिकवे भूलकर फिर से उन्हें अपना नुमाइंदा बना देते हैं। कुछ लोगों का तो मानना है – कोउ नृप होए, हमें का हानि। और ऐसे ही लोग देश को अंधकार की ओर ले जाने में अपनी महती भूमिका निभाते हैं। आज देश में हमारी नुमाइंदगी करने वाले नेता, लूट-खसोट में व्यस्त हैं। कई तो ऐसे नेता हैं जिन पर हत्या, बलत्कार, लूट-अपहरण, भ्रष्टाचार के अलावा डराने-धमाकाने व जमीन हड़पने के आरोप हैं और वे कभी सत्य नहीं हो पाते क्योंकि पुलिस, अपराधी, व्यवसायी का गठजोड़ देश में कार्य कर रहा है जो अपने तरह से कानूनों को परिभाषित करता रहता है। अगर किसी ने भी इस गठजोड़ पर उंगली उठाने की कोशिश की तो वे उंगली उठाने वालों की सारी जन्मपत्री खोल कर रख देते हैं या दूसरे तरीके से इतना परेशान करते हैं कि फिर से कोई उन्हें आखें दिखाने की जुर्रत ना कर सके।

लेख में, ऊपर मैंने राजा-महराजाओं के चारण की चर्चा इसलिए की है कि आज प्रजातंत्र होने के बावजूद कुछ नेताओं को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं हो रही है। उन्हें यह पसंद नहीं है कि ऐसा कोई साधन आम लोगों की पहुंच में हो जिस पर वो उनके गलत कार्यों पर टीका-टिप्पणी कर सके और इसलिए ही सारे के सारे तथाकथित नेता वर्ग के लोग सोशल मीडिया के पीछे पड़ गए हैं क्योंकि राज्य समर्थित मीडिया व निजी मीडिया को एक हद तक तो वो साध लेते हैं लेकिन ये मुआ सोशल मीडिया नाम का हथियार जबसे आम-आदमी की पहुंच में आ गया है कि कोई भी ख़बर हो तुरंत उस पर प्रतिक्रिया होनी शुरू हो जाती है। औऱ यही नेताओं की परेशानी का कारण भी है। सो, वे हर हाल में इस पर प्रतिबंध लगाने की सोच रहे हैं।

नहीं तो क्या कारण है कि जो ममता बनर्जी, वामदलों के शासन के खिलाफ सड़कों पर हर तरह के आंदोलन और मां, मानुष और माटी का नारा दिया करती थीं वही गद्दी मिलने के कुछ दिनों के बाद ही बदल गई। उन्हें अपनी आलोचना पसंद नहीं है। उनके खिलाफ एक शब्द बोलने वाला भी विरोधी की श्रेणी में आता है और वे उसे तुरंत जेल में डालने का आदेश दे डालती हैं।

अब राज्य के निवासियों को ममता बनर्जी से पूछना पड़ेगा कि क्या खाना, क्या पहनना और यहां तक कि किससे संबंध स्थापित करना है। हद हो गई है। शायद ममता बनर्जी को धोखा हो गया है। उसे मालूम नहीं है कि उससे पहले इस गद्दी पर कोई और शख्स भी था जिसे राज्य की जनता ने गद्दी से उतार दिया। पूर्व प्रधानमंत्री, दिवंगत राजीव गांधी को भी इस देश की जनता ने प्रचंड बहुमत दिया था लेकिन जब वे जनता की उम्मीदों पर ख़रे नहीं उतर सके तो अगले चुनाव में जनता ने उन्हें नकार दिया। ये और बात है कि वे चुनावों के दौरान ही आतंकवादी गतिविधियों के शिकार हो गए। देश को उन्होंने कंप्यूटर क्रांति का अमूल्य उपहार दिया था और आज देश उनके सपनों को पूरा कर रहा है और विश्व भर में कंप्यूटर क्रांति का अगुआ देश बन गया है।

हम बात कर रहे हैं कि कुछ राज्यों के नेता अपना गुणगान करने के लिए राज्य के पैसों पर चैनल, समाचारपत्र और पत्रिका लॉन्च करना चाहते हैं जिससे जनता को दिग्भ्रमित किया जा सके। जनता को वही दिखाया जाए जो शासक वर्ग दिखाना चाहता है। यानी कि राज्य सरकार की जय-जयकार। आज के इंटरनेट के युग में शायद ऐसी कोई घटना हो जिस पर आप रोक लगाने की सोच सकते हैं। अगर आपने कोई एक रास्ता बनाया तो लोग तुरंत ही दूसरा रास्ता अख्र्तियार कर लेते हैं। सो, शासक वर्ग को यह चाहिए कि वो विकास के कार्यों पर ध्यान दे। राज्य की जनत इतनी मूर्ख नहीं है कि वो बहकावे में आकर कोई भी खबर पर विश्वास कर लेगी, अगर जनता ऐसा कभी करती है तो वो अपने ही पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारती है।

Mushi Kahn : बहुत अच्छे भाई साहब, यह दुनिया का दस्तुर है कि जो मेरी मरजी व हित के खिलाफ बोले, उस पर कोई ठप्पा लगा कर उसे दुनिया भर में बदनाम करने की कोशिश करो. न्यू मीडया के खिलाफ बोलने वाले काटजू साहेब पर लगाया गया आपका ठप्पा उसी दस्तुर की याद दिला रहा है.
 
Sudhir Dandotiya : इंटरनेट एक स्वतंत्र माध्यम है इस पर तो किसी तरह का की विवाद नहीं होना चाहिए ………इसकी स्वतंत्रता बरकारा रहनी चाहिए
 
Sanjay Awasthi : people at top position in a regulating body of media should remain neutral and the same is applicable to Mr. Katzu also. He must not show his biasedness in statements regarding the issues.


यशवंत के फेसबुक वॉल से. इस पूरे मसले पर अगर आप भी कुछ कहना-बताना-समझाना चाहते हैं तो bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें या फिर सीधे भड़ास के एडिटर यशवंत तक yashwant@bhadas4media.com के जरिए पहुंचा दें.

tag-  katju ki kitkit

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *