इस खबर में काफी तथ्‍य अनछुए और अधूरे हैं

आदरणीय यशवंत जी, नमस्कार। मैंने आपके न्यूज पोर्टल पर "पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों पर उखड़ गए अंबाला के डीसी" नामक शीर्षक से प्रकाशित हुई एक खबर पढ़ी। जिसमें मुझे काफी तथ्य अनछुए हुए और अधूरे लगे। जिन पर प्रकाश डालने के लिए में पहली मर्तबा आपको मेल भेज रहा हूँ। वास्तव में आपके पोर्टल में प्रकाशित समाचार आपके सुप्रसिद्ध एवं निष्पक्ष पोर्टल की छवि को ग्रहण लगाने के प्रयास जैसा है।

१. सबसे पहली बात यह कि आपके पोर्टल में छपी हुई खबर में बतलाया गया कि प्रशासन ने पच्चीस हजार रुपए खर्च करके मलिक होटल में एक लंच रखा, जिसमें एक ट्रस्ट के बजुर्ग पत्रकार और उनके कुछ चेलों द्वारा खाना खाया गया। जबकि डीसी के ना आने से असंतुष्ट 90 प्रतिशत पत्रकार खाने को हाथ लगाए बिना ही वहां से चले गये। पहली बात यह कि डी.पी.आर.ओ द्वारा इस भोज का न्योता दिया गया था और ये भोज केवल सभी अख़बारों के ब्यूरोचीफों व इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों के लिए था। मेरी जानकारी के अनुसार प्रेस फोटोग्राफरों व इलेक्ट्रानिक मीडिया के कैमरामैनों को इस भोज कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया गया। जिसमें कहीं भी डीसी के आने का जिक्र नहीं किया गया था। 

आमंत्रण के अनुसार इस भोज में दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, हरीभूमि, आज समाज, दैनिक हिंदी व इंग्लिश ट्रिब्यून, पी.टी.आई, हरियाणा न्यूज, इंडिया न्यूज हरियाणा, इंडिया टी.वी व टोटल टी.वी, दूरदर्शन और प्रेस की आवाज व दिन – प्रतिदिन दो सांध्य अखबारों के मुख्य संपादक पहुंचे। लेकिन जैसी ही ये भोज कार्यक्रम की बात फोटोग्राफरों के बीच पहुंची तो वहां दबंग कहलाने वाले एक फोटोग्राफर ने पहुंच कर भोज पर ना आमंत्रित किये जाने को लेकर डी.पी.आर.ओ के सामने अपना रोष प्रकट किया, जिसके बाद वहां मौजूद उसके अख़बार के प्रमुख एवं बजुर्ग संवाददाता ने उसे फ़ोन पर गुस्सा छोड़ खाने पर बुला लिया। इसके बाद वह होटल में पहुंच तो गये पर कुछ ही देर बाद होटल पहुंचे अन्य फोटोग्राफरों से बात कर सभी वहां से वापिस चले गये व साथ ही दैनिक भास्कर, आज समाज के संवाददाताओं को भी अपने साथ ले गये और शोर ये मचाया गया कि डीसी के ना आने के कारण 90 प्रतिशत पत्रकारों ने भोज छोड़ दिया।

मेल के जरिये मेरा सभी भाइयों से सवाल यह है कि क्या पत्रकारों और फोटोग्राफरों में कोई अंतर नहीं होता…? दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, हरी भूमि, दैनिक हिंदी व इंग्लिश ट्रिब्यून, पी.टी.आई, हरियाणा न्यूज, इंडिया न्यूज हरियाणा, इंडिया टी.वी व टोटल टी.वी, दूरदर्शन और प्रेस की आवाज व दिन – प्रतिदिन दो सांध्य अखबारों के मुख्य संपादक द्वारा भोज लिया तो कैसे 90 प्रतिशत पत्रकार डीसी के ना आने के कारण सरकारी खाने को हाथ तक नहीं लगाए बिना वंहा से चले गये…? क्या केवल फोटोग्राफरों को भोज में नहीं बुलाये जाना इतने बड़े बवाल की वजह होना सही बात है…?

२. अब रही बात डीसी की बैठक में हंगामे की। जिस भी साथी ने आप तक संबंधित समाचार पहुंचाकर उसे एक सनसनी तो बनाने की कोशिश की, लेकिन उसने आपको यह नहीं बतलाया कि इस सारे हंगामे का जिम्मेदार कौन था और कैसे उसने डीसी के साथ बैठे अधिकारियों पर अपना रौब बनाने के लिए वह मीडिया के नाम पर डीसी से ही अभद्र व्यवहार करते हुए उलझ गया और नौबत खड़े होकर बैठक छोड़कर सभी के चले जाने की आ गई। मगर कुछ प्रशासनिक अधिकारियों और पत्रकारों के बीच बचाव के बाद इस बैठक को दुबारा शुरू किया जा सका। जिसमें हंगामे के जन्मदाता फिर साथ बैठे और उन्होंने फिर डीसी को खुश करने के लिए चिकड़ी चुपड़ी बातें भी बहुत की और असली मुद्दे को लेकर वरिष्‍ठ पत्रकारों द्वारा किये जा रहे अहम सवालों का भी दरकिनार करते हुए अपनी बात चालू रखने का प्रयास किया।

मेल के जरिये मेरा सभी भाइयों से यहां भी सवाल यह है कि क्या एक पत्रकार द्वारा जानबूझ कर उत्पन्‍न किए गये विवाद के लिए पूरे प्रशासन के साथ उलझ जाना कहां तक ठीक है और वो भी ऐसा पत्रकार जो अधिकारियों के सामने सिवाए पत्रकारों की यूनियन का नेता बनने के अलावा कोई काम ना करता हो व ख़बरों के नाम पर वो शून्य हो…? हां इतना जरुर है कि इस पूरे प्रकरण के दौरान जो पत्रकार बाढ़ को लेकर डीसी व प्रशासन से सवाल पूछ रहे थे, उसके मिले जवाबों से वह असंतुष्ट नजर आये और डीसी द्वारा दिए गई कई जवाबों पर उन्होंने बड़ी आपत्ति भी दर्ज करवाते हुए स्पष्टीकरण मांगा। किन्तु जिन्हें अपनी नेतागिरी चमकाने के अलावा पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं वो शायद तथाकथित रूप से पूरे अंबाला की मीडिया के नाम पर अक्सर बवाल खड़ा करने में कामयाब होते आ रहे हैं। आखिर बड़े संस्थानों के लिए काम करने वाले पत्रकार अपनी ड्यूटी कैसे निभा पाएंगे। इस पर आप स्वयं एक वरिष्‍ठ पत्रकार होने के नाते गंभीर विचार करें।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

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