इस देश में कुछ भी नहीं बदला भगत सिंह

भगत सिंह तुम्हारी कुर्बानी को लाख-लाख सलाम। लेकिन तुम इस बात पर गर्वित और हर्षित मत होना कि तुम्हारे बाद कुछ बदला है। अपनी शहादत के समय ही तुमने भविष्यवाणी कर दी थी कि अगले 15 सालों में देश आजाद हो जाएगा, और तुम्हारी भविष्यवाणी सही साबित हुई और अंग्रेज देश छोड़कर चले गये। लेकिन जिन गरीब, पिछड़े और भूखे-नंगें भारतवासियों के अधिकार और आजादी की बात तुम उस समय करते थे वो आज भी पहले से बदतर स्थितियों में जीवन बसर करने का विवश हैं। शहादत का सिलसिला आज भी जारी है हां वो अलग बात है कि अब जवान और देशभक्त अंग्रेजी हुकूमत की गोली की बजाय अपनी पुलिस की गोलियों एवं भ्रष्ट, निकम्मी, सफेदपोश राजनीतिक षडयंत्र के शिकार हो रहे हैं।

आज भी जो व्यवस्था का विरोध करने की जरा सी भी हिम्मत और हिमाकत करता है उसका नाम शहीदों की श्रेणी में शामिल हो जाता है। खतरे आज भी उतने हैं जितने उस जमाने में हुआ करते थे। हां वो अलग बात है कि अब मोर्चे और दुश्मन बदल गए हैं। जिस मकसद के लिए तुम सूली चढ़े थे वो तो सरकारी फाइलों में तो 66 साल पहले पूरा हो गया था लेकिन आधी अधूरी आजादी का झुनझुना थमाकर सफेदपोश नेता और सरकारी अमला आज भी उसी तरह राजकाज और मनमानी कर रहा है जैसे तुमने सही, देखी और भुगती थी। रोटी, कपड़ा और मकान आज भी उतनी ही बड़ी जरूरत और समस्या है जितनी उस जमाने में थी। व्यवस्था के साथ कदमताल न करने वाले को आज भी वहीं प्रताड़ना सहनी ओर झेलनी होती है जितने अंग्रेजों के राज में थी, क्योंकि आज भी अंग्रेजों के गुलामों का शोषण करने वाले अत्याचारी, अनाचारी और प्राकृतिक न्याय की अवधारणा के विपरित रचे-गढ़े कानून अमल में लाये जा रहे हैं। खास परिवर्तन नहीं आया है बीते कल और आज में।

बचपन से सुना था कि शहादत किसी तगमे का नहीं जज्बे का नाम है। मेरे ख्याल से अपने संवैधानिक और प्राकृतिक अधिकारों को हासिल करने के दौरान प्राण गंवाना शहादत से कम नहीं है, हां ऐसे संघर्षों का मकसद कौम और देश की बेहतरी होना चाहिए। लेकिन आज शहादत की कीमत रुपये-पैसे, नौकरी, पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी या पेंशन से तौली जाती है। वहीं शहादत को भी भ्रष्ट व्यवस्था ने जात-पात का कफन ओढ़ा दिया है। जलाये जाने वाले और दफनाये जाने वाले शहीद के परिजनों को मुआवजा भी अलग-अलग मिलता है। भगत सिंह तुम तो सोचते थे कि सपनों का भारत बनेगा जिसमें जात-पात, धर्म, भाषा को भेद नहीं होगा लेकिन ठीक इसके उलट देश के कर्णधारों ने वोट बैंक की गंदी राजनीति और सत्ता प्राप्ति के लिए आदमी-आदमी का बांट दिया है। भगत सिंह ये मत सोचना कि तुम्हारी पीठ पर पुलिस की लाठियां और चाबुक टूटा था कमोबेश आज भी हालात वैसे हीं हैं। किसान, मजदूर और आम आदमी आज भी अपने हिस्से के अधिकारों और सुविधाओं से वंचित है। देश के किसी न किसी कोने में व्यवस्था से खिन्न लोग पुलिस, प्रशासन की प्रताडना और षडयंत्र के शिकार होते हैं।

भगत सिंह किसान आज भी दुखी और परेशान हैं। भू-माफियाओं, नेताओं और नौकरशाहों का गठजोड़ सरकारी योजनाओं के नाम पर किसानों से उनकी खेती की जमीन हड़पने का कुचक्र दिन रात रचता है। साहूकारों के जुल्म बदस्तूर जारी हैं और किसानों को सस्ते ऋणों का लालच देने के लिए सरकारी बैंक भी खुल चुके हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का फैलता जाल, मंहगे बीज, खाद, पानी और ऋणों के बढ़ता बोझ किसानों को आत्महत्या के लिए विवश कर रहा है। सरकार भोले-भाले किसानों की वोट हासिल करने के लुभावनी योजनाओं और ऋण माफी की घोषणाएं करती हैं लेकिन उससे किसका भला होता है वो सबको मालूम है। किसान पहले भी अभावग्रस्त था आज भी उसके सिर पर बैंक, साहूकार, सरकार, विदेशी कंपनियों की वक्र दृष्टि कायम है। भगत सिंह मजदूर भी घुट-घुटकर जीवन जी रहे हैं। विदेशी कंपनियों को राहत देने के लिए उनके अधिकारों में लगातार कटौती की जा रही है। विदेशी दलालों के समक्ष नतमस्तक सरकार श्रम कानूनों में उनके मनमाफिक बनाने में प्रयासरत है। कभी कभार जब मजदूर अपने अधिकारों के लिए हुंकार भरते हैं तो व्यवस्था जड़ का इलाज करने की बजाय पत्ते झाड़ती और सेटिंग करने में लग जाती है। मजदूरों के हिस्से का पैसा उद्योगपति, नेता और दलाल टाइप के मजदूर नेता आपस में मिल बांट रहे हैं और मजदूर गरीबी के दुष्चक्र में पहले की भांति पिस और घूम रहा है।

सरकार और व्यवस्था के पास अपनी उपलब्धियों गिनाने के सैंकड़ों तर्क और लंबी चौड़ी सूची है। औद्योगिक, हरित, श्वेत, नील, आईटी क्रांति, परमाणु बम और चंद्रमा तक की लंबी छलांग माने  व्यवस्था के पास इतराने के काफी सामान मौजूद हैं, लेकिन अहम् सवाल यह है कि विकास, योजनाओं, बजट और नीतियों के बीच आम आदमी कहां खड़ा होता है, अगर दो टूक ये कहा जाए कि व्यवस्था की कमान थामने वाले हाथ और चेहरे बदले हैं तो कोई बुराई नहीं होगी। देश की 64 फीसद आबादी खुले में शौच करने को विवश है, लेकिन सरकार का ध्यान देशवासियों को मोबाइल थमाने में लगा हुआ है। महिलाएं आज भी असुरक्षित है। आम आदमी बुनियादी सुविधाओं से पहले भी वंचित था आज आजादी के लंबे समय के बाद भी रोटी, कपड़ा और मकान आम आदमी की उम्मीदों से मीलों दूर हैं। गांव पहले भी अभावग्रस्त थे आज भी उनकी हालत सुधरी नहीं है।

तुम्हारे जमाने में भी अपनी बात कहने की आजादी नहीं थी तो आज भी कमोबेश स्थितियां वैसे ही हैं। सोशल साइटस का एक लाइक और कमेंटस आपको जेल की सींखचों के पीछे पहुंचा सकता है। सरकारी सुरक्षा एजेंसियां जनता को सुरक्षा प्रदान करने की बजाय आम आदमी को डराने, धमकाने और कुचलने का साधन बनी हुई हैं। ओछी राजनीति और भ्रष्टाचार की उपज आंतकवाद और नक्सलवाद के शिंकजे में आज पूरा देश है। आंतकवाद और आंतकी चश्मे की नजर से देखा जाता है। नक्सलवाद की जड़ों और पैदा होने की स्थितियों पर ध्यान देने की बजाय सरकार का पूरा ध्यान नक्सलियों को मारने में लगा है, असल में सरकार जान बूझकर ऐसी नीतियों का निर्माण और निर्णय ले रही जिसमें आम आदमी की भलाई और कल्याण की बजाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित सधते हैं। सरकार का ध्यान आम आदमी को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने की बजाय कोका कोला, पेप्सी को स्थापित करने में ज्यादा है। भगत सिंह तुम तो पांच दरियाओं के निवासी थे, क्या बताऊं तुम्हें तुम्हारे पांच नहीं देश के सारे दरिया अत्यधिक प्रदूषण के शिकार हो चुके हैं। सरकार की निकम्मी नीतियों ने नदियों में बांध बनाकर उद्योगपतियों की तिजोरियां बनने का काम किया है, जगह जगह बांधी गई नदियां तिल-तिलकर मर रही हैं और सरकार मिनरल वाटर के प्लांट लगाने के लिए सब्सिडी देने में लगी है।

भगत सिंह सरकारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, विकास के आंकड़ें आसमान को छू रहे हैं। आर्थिक मोर्चे पर नित नए झण्डे गाड़े जा रहे हैं। सत्ता का ध्यान जनता की बजाय दल और वोट बैंक के कल्याण में ज्यादा लगा है। सत्ता नित नए षडयंत्र रच रही है। और अपनी सुविधा और सहूलियत के हिसाब से न्याय, अधिकार और आजादी निर्धारित कर रही है। तुम्हारे साथ भी तो सत्ता ने ऐसा ही किया था और राष्ट्रद्रोही, आंतकी पता नहीं क्या-क्या बताकर सूली पर लटका दिया था। आज भी आम आदमी सत्ता के तानाशाही रवैये, षडयंत्र और कुनीतियों की सूली पर चढ़ने का मजबूर है। इस मौके पर लोकप्रिय जनवादी कवि अदम गोंडवी का शेर बरबस याद आता है-

कैसे काफिर हुई जम्हूरियत जवां होकर,
सर पे संगीन के साये हैं और होंठ सिले।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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