इस मीडिया के लिये ‘नो’ आंसू : विनोद विप्लव

सवाल- यह मीडिया किसकी है… गांवों के गरीबों की?
-नहीं

शहरों के गरीबों की?
-नहीं

आदिवासियों की?
-नहीं

दलितों की?
-नहीं

गरीब किसानों की?
-नहीं

मजदूरों की?
-नहीं

निचले दर्जे के सरकारी कर्मचारियों की?
-नहीं

निजी क्षेत्रों में काम करने वाले कमचारियों की?
-नहीं

फैक्टरियों में काम करने वाले लोगों की?
-नहीं

गरीब औरतों की?
-नहीं

मीडिया में निचले और मध्यम दर्जे वाले पत्रकारों की?
-नहीं

-मीडिया में अलग-अलग काम करने वाले कर्मचारियों की?
-नहीं

अगर मीडिया केवल मुठ्ठी भर पूंजीपतियों, पूंजीपतियों के इशारों पर काम करने वाले नेताओं, मंत्रियों और और पूंजीपतियों तथा मीडिया मालिकों की दलाली करने वाले उंचे पदों पर बैठे 100—200 संपादकों और दलाल मीडिया ​कर्मियों की है तो ऐसी मीडिया का अगल कल नाश होना है तो आज ही नाश हो जाये। ऐसी मीडिया के नाश होने का फर्क कुछ दलालों और भ्रष्ट लोगों को छोड़कर किसी को नहीं पड़ेगा।

ऐसी मीडिया में काम करने वाले पत्रकार लोग एक कड़वी सच्चाई सुन कर क्यों बौखला रहे हो जबकि जिस मीडिया को तुम अपना समझते हो वही मीडिया तुम्हारे हितों, वेतन, मुश्किलों और संघषों से संबंधित एक लाइन की खबर देना गवारा नहीं करती। पत्रकारों के वेतन तय करने के लिये गठित आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं होने देने के लिये अखबार मालिकों ने क्या कुछ नहीं किया, यह किसी मीडियाकर्मी से छिपा है। इन अखबारों में मीडिया कर्मियों के फायदे या हित की खबर नहीं छपती लेकिन यह बताने के लिये कथित बड़े अखबार ने पन्ने के पन्ने रंग दियो कि पत्रकारों का वेतन अगर बढ़ गया तो मीडिया बर्बाद हो जायेगा। जाहिर है मीडिया मालिकों की नजर में मीडिया के आस्त्वि पर सबसे बड़ा हमला, केजरीवाल ने नहीं, पत्रकारों के वेतन की सिफारिश करने वाले मणिसाना आयोग ने किया था।

किसी मीडिया घराने में पत्रकारों को अपनी यूनियन बनाने की अनुमति नहीं है। अपने साझे हितों को लेकर आवाज उठाने का कोई मंच नहीं है। एक झटके में दर्जनों—सैकड़ों पत्रकारों की नौकरी छीन ली जाती है, लेकिन हटाये गये पत्रकार कहीं गुहार नहीं कर पाते। पत्रकारों के घरों में चूल्हे नहीं जले, कोई बीमार हो जाये तो दवाई के पैसे नहीं हैं लेकिन किसी मीडिया मालिका को कोई फर्क नहीं पड़ता। मीडिया मालिकों के लिये खबर से ज्यादा जरूरी विज्ञापन होता है। पत्रकार खबर नहीं लाये तो चलेगा, लेकिन अगर विज्ञापन नहीं लाये तो बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। सबसे बड़ा पत्रकार वही है जो लाखों का विज्ञापन ले आये, अखबार या चैनल मालिक की मंत्री से सेटिंग करा दे या कोई ठेका दिला दे।

अगर मर भी जाओ तो कोई तुम्हारी सुध लेने नहीं आयेगा। जिस चैनल या अखबार में काम करते हो उसी चैनल में तुम्हारी बदहाली या बदहाली के खिलाफ धरने—प्रदर्शन पर बैठे पत्रकारों की एक लाइन भी खबर प्रकाशित/प्रसारित नहीं होती। अगर कोई रहम करके पत्रकारों के हित से जुड़ी कोई खबर छाप भी दे तो उसकी नौकरी ले ली जाती है। कोई अपने वेतन, अपने साझे अधिकार और अपने साझे हित की आवाज उठाये तो उसे बाहर का दरवाजा दिखा दिया जाता है। मीडिया मालिक और बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों द्वारा महिला कर्मियों का शोषण किया जाता है और मामला वहीं दबा दिया जाता है। कोई आवाज उठाये तो नौकरी से निकाल दिया जाता है। यह मीडिया जब खुद मीडिया कर्मियों का नहीं हुयी तो समाज के 90 प्रतिशत गरीबों, दलितों, पिछडों और बंचित आबादी का क्या होगी। ऐसी मीडिया को अगर सुधार नहीं सकते हो तो उसे जेल भेजे जाने की बात पर आग—बबूला होने का कोई मतलब नहीं है — बल्कि मुझे तो खुशी है कि किसी ने इतनी हिम्मत दिखायी और कड़वे सच को उजागर किया।

लेखक विनोद विप्लव समाचार एजेंसी यूनीवार्ता के दिल्ली स्थित मुख्यालय में स्पेशल करेस्पांडेंट के बतौर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क 09868793203 के जरिए किया जा सकता है. विनोद विप्लव के ब्लाग तक http://vinodviplav.wordpress.com के जरिए पहुंचा जा सकता है.

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