इस विकास से आम आदमी का क्‍या लेना-देना है?

यह रास्ता जंगल की तरफ जाता जरुर है लेकिन जंगल का मतलब सिर्फ जानवर नहीं होता। जानवर तो आपके आधुनिक शहर में हैं, जहां ताकत का एहसास होता है। जो ताकतवर है उसके सामने समूची व्यवस्था नतमस्तक है। लेकिन जंगल में तो ऐसा नहीं है। यहां जीने का एहसास है। सामूहिक संघर्ष है। एक-दूसरे के मुश्किल हालात को समझने का संयम है। फिर न्याय से लेकर मुश्किल हालात से निपटने की एक पूरी व्यवस्था है। जिसका विरोध भी होता है और विरोध के बाद सुधार की गुंजाइश भी बनती है। लेकिन आपके शहर में तो जो तय हो गया चलना उसी लीक पर है। और तय करने वाला कभी खुद को न्याय के कठघरे में खड़ा नहीं करता। चलते चलिये। यह अपना ही देश है। अपनी ही जमीन है। और यही जमीन पीढ़ियों से पूरे देश को अन्न देती आई है। और अब आने वाली पीढ़ियों की फिक्र छोड़ हम इसी जमीन के दोहन पर आ टिके है।

इस जमीन से कितना मुनाफा बटोरा जाता सकता है, इसे तय करने लगे है। उसके बाद जमीन बचे या ना बचे। लेकिन आप खुद ही सोचिये जो व्यवस्था पहले आपको आपके पेट से अलग कर दें। फिर आपके भूखे पेट के सामने आपकी ही जिन्दगी रख दें। और विकल्प यही रखे की पेट भरोगे तो जिन्दा बचोगे। तो जिन्दगी खत्म कर पेट कैसे भरा जाता है, यह आपकी शहरी व्यवस्था ने जंगलो को सिखाया है। यहां के ग्रामीण-आदिवासियों को बताया है। आप इस व्यवस्था को जंगली नहीं मानते। लेकिन हम इसे शहरी जंगलीपन मानते है। लेकिन जंगल के भीतर भी जंगली व्यवस्था से लड़ना पडेगा यह हमने कभी सोचा नहीं था। लेकिन अब हम चाहते हैं जंगल तो किसी तरह महफूज रहे। इसलिये संघर्ष के ऐसे रास्ते बनाने में लगे है जहां जिन्दगी और पेट एक हो। लेकिन पहली बार समझ में यह भी आ रहा है कि जो व्यवस्था बनाने वाले चेहरे हैं, उनकी भी इस व्यवस्था के सामने नहीं चलती ।

यहां सरकारी बाबुओं या नेताओं की नहीं कंपनियो के पेंट-शर्ट वाले बाबूओं की चलती है। जो गोरे भी है और काले भी। लेकिन हर किसी ने सिर्फ एक ही पाठ पढ़ा है कि यहां की जमीन से खनिज निकालकर। पहाड़ों को खोखला बनाकर। हरी भरी जमीन को बंजर बनाकर आगे बढ़ जाना है। और इन सब को करने के लिये, इन जमीन तक पहुंचने के लिये जो हवाई पट्टी चाहिये। चिकनी -चौड़ी शानदार सड़कें चाहियें। जो पुल चाहिये। जमीन के नीचे से पानी खींचने के लिये जो बड़े बड़े मोटर पंप चाहिये। खनिज को ट्रक में भर कर ले जाने के लिये जो कटर और कन्वेयर बेल्ट चाहिये। अगर उसमें रुकावट आती है तो यह विकास को रोकने की साजिश है। जिन 42 से ज्यादा गांव के साढे नौ हजार से ज्यादा ग्रामीण आदिवासी परिवार को जमीन से उखाड़कर अभी मजदूर बना दिया गया है और खनन लूट के बाद वह मजदूर भी नहीं रहेंगे, अगर वही ग्रामीण अपने परिवार के भविष्य का सवाल उठाता है तो वह विकास विरोधी कैसे हो सकता है।

इस पूरे इलाके में जब भारत के टाप-मोस्ट उघोगपति और कारपोरेट, खनन और बिजली संयत्र लगाने में लगे हैं और अपनी परियोजनाओं को देखने के लिये जब यह हेलीकाप्टर और अपने निजी जेट से यहां पहुंचते है। दुनिया की सबसे बेहतरीन गाड़ियों से यहां पहुंचते हैं, तो हमारे सामने तो यही सवाल होता है कि इससे देश को क्या फायदा होने वाला है। यहां मजदूरों को दिनभर के काम की एवज में 22 से 56 रुपये तक मिलता है। जो हुनरमंद होता है उसे 85 से 125 रुपये तक मिलते हैं। और कोयला खादान हो या फिर बाक्साइट या जिंक या फिर बिजली संयत्र लगाने में लगे यहीं के गांव वाले हैं। उन्हे हर दिन सुबह छह से नौ किलोमीटर पैदल चलकर यहां पहुंचना पड़ता है। जबकि इनके गांव में धूल झोंकती कारपोरेट घरानों की एसी गाड़ियां दिनभर में औसतन पांच हजार रुपये का तेल फूंक देती हैं। हेलिकाप्टर या निजी जेट के खर्चे तो पूछिये नहीं। और इन्हें कोई असुविधा ना हो इसके लिये पुलिस और प्रशासन के सबसे बड़े अधिकारी इनके पीछे हाथ जोड़कर खडे रहते है। तो आप ही बताइये इस विकास से देश का क्या लेना-देना है।

देश का मतलब अगर देश के नागरिको को ही खत्म कर उघोगपति या कारपोरेट विकास की परिभाषा को अपने मुनाफे से जोड़ दें तो फिर सरकार का मतलब क्या है जिसे जनता चुनती है। क्योंकि इस पूरे इलाके में ग्रामीण आदिवासियों के लिये एक स्कूल नहीं है। पानी के लिये हैंड पंप नहीं है। बाजार के नाम पर अभी भी हर गुरुवार और रविवार हाट लगता है। जिसमें ज्यादा से ज्यादा गांव के लोग अन्न और पशु लेकर आते हैं। एक दूसरे की जरुरत के मद्देनजर सामानों की अदला-बदली होती है। लेकिन अब हाट वाली जगह को भी हड़पने के लिये विकास का पाठ सरकारी बाबू पढ़ाने लगे हैं। धीरे-धीरे खादानों में काम शुरु होने लगा है। बिजली संयत्रों का माल-असबाब उतरने लगा है तो कंपनियों के कर्मचारी-अफसर भी यहीं रहने लगे हैं। उनको रहने के दौरान कोई असुविधा ना हो इसके लिये बंगले और बच्चों के स्कूल से लेकर खेलने का मैदान तक बनाने के लिये मशक्कत शुरु हो रही है। गांव के गांव को यह कहकर जमीन से उजाड़ा जा रहा है कि यह जमीन तो सरकार की है। और सरकार ने इस पूरे इलाके की गरीबी दूर करने के लिये पूरे इलाके की तस्वीर बदलने की ही ठान ली है। चिलका दाद, डिबूलगंज, बिलवडा, खुलडुमरी सरीखे दर्जनों गांव हैं, जहां के लोगों ने अपनी जमीन पावर प्लांट के लिये दे दी। लेकिन अब अपनी दी हुई जमीन पर ही गांव वाले नहीं जा सकते। खुलडुमरी के 2205 लोगों की जमीन लेकर रोजगार देने का वादा किया गया।

लेकिन रोजगार मिला सिर्फ 234 लोगों को। आदिवासियों के जंगल को तबाह कर दिया गया है। जिन फारेस्ट ब्लाक को लेकर पर्यवरण मंत्रालय ने अंगुली उठायी और वन ना काटने की बात कही। उन्हीं जंगलों को अब खत्म किया जा रहा है क्योंकि अब निर्णय पर्यावरण मंत्रालय नहीं बल्कि ग्रुप आफ मिनिस्‍टर यानी जीओएम लेते हैं। ऐसे में माहान, छत्रसाल, अमेलिया और डोगरी टल-11 जंगल ब्लाक पूरी तरह खत्म किये जा रहे हैं। करीब 5872.18 हेक्टेयर जंगल पिछले साल खत्म किया गया। और इस बरस 3229 हेक्टेयर जंगल खत्म होगा। अब आप बताइये यहां के ग्रामीण-आदिवासी क्या करें। कुछ दिन रुक जाइए, जैसे ही यह ग्रामीण आदिवासी अपने हक का सवाल खड़ा करेंगे वैसे ही दिल्ली से यह आवाज आयेगी कि यहां माओवादी विकास नहीं चाहते हैं। और इसकी जमीन अभी से कैसे तैयार कर ली गई है यह आप सिंगरैली के बारे में सरकारी रिपोर्ट से लेकर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंचों से सिंगरैली के लिये मिलती कारपोरेट की मदद के दौरान खिंची जा रही रिपोर्ट से समझ सकते हैं। जिसमें लिखा गया है कि खनिज संसाधन से भरपूर इस इलाके की पहचान पावर के क्षेत्र में भारतीय क्रांति की तरह है। जहां खादान और पावर सेक्टर में काम पूरी तरह शुरु हो जाये तो अमेरिका और यूरोप को मंदी से निपटने का हथियार मिल सकता है। इसलिये यहां की जमीन का दोहन किस स्तर पर हो रहा है और किस तरीके से यहा के कारपोरेट के लिये अमेरिकी सरकार तक भारत की नीतियों को प्रभावित कर रही है, इसके लिये पर्यावरण मंत्रालय और कोयला मंत्रालयों की नीतियों में आये परिवर्तन से भी समझा जा सकता है। जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री रहते हुये चालीस किलोमीटर के क्षेत्र के जंगल का सवाल उठाया।

पर्यावरण के अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ ग्रीन पीस ने यहा के ग्रामीण आदिवासियों पर पड़ने वाले असर का समूचा खाका रखा। लेकिन आधे दर्जन कारपोरेट की योजना के लिये जिस तरह अमेरिका, आस्ट्रेलिया से लेकर चीन तक का मुनाफा जुड़ा हुआ है। उसमें हर वह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई जिनके सामने आने से योजनाओ में रुकावट आती। इस पूरे इलाके में चीन के कामगार और आस्ट्रेलियाई अफसरों की फौज देखी जा सकती है। अमेरिकी बैंक के नुमाइन्दे और अमेरिकी कंपनी बुसायरस के कर्मचारियों की पहल देखी जा सकती है। आधे दर्जन पावर प्लांट के लिये 70 फीसदी तकनीक अमेरिका से आ रही है। ज्यादातर योजनाओं के लिये अमेरिकी बैंक ने पूंजी कर्ज पर दी है। करीब 9 हजार करोड से ज्यादा सिर्फ अमेरिका के सरकारी बैंक यानी  बैक आफ अमेरिका का लगा है। कोयले का संकट ना हो इसके लिये कोयला खादान के ऱाष्ट्रीयकरण की नीतियों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। खुले बाजार में कोयला पहुंच भी रहा है और ठेकेदारी से कोयला खादान से कोयले की उगाही भी हो रही है। कोयला मंत्रालय ने ही कोल इंडिया की जगह हिंडालको और एस्सार को कोयला खादान का लाइसेंस दे दिया है। जो अगले 14 बरस में 144 मिलियन टन कोयला खादान से निकालकर अपने पावर प्लांट में लगायेंगे। तमाम कही बातों के दस्तावेजों को बताते दिखाते हुये हमने खदान और गांव के चक्कर पूरे किये तो लगा पेट में सिर्फ कोयले का चूरा है। सांसों में भी भी कोयले के बुरादे की धमक थी। और संयोग से ढलती शाम या डूबते हुये सूरज के बीच सिंगरौली में ही आसमान में चक्कर लगाता एक विमान भी जमीन पर उतरा। पूछने पर पता चला कि सिगरौली में अमेरिकी तर्ज पर हिंडालको की निजी हवाई पट्टी है जहां रिलायस, टाटा, जिदंल, एस्सार, जेपी समेत एक दर्जन से ज्यादा कारपोरेट के निजी हेलीकाप्टर और चार्टेड विमान हर दिन उतरते रहते हैं। और आने वाले दिनों में सिंगरौली की पहचान 35 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने वाले क्षेत्र के तौर पर होगी। जिस पर भारत रश्क करेगा।

लेखक पुण्‍य प्रसून बाजपेयी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा जी न्‍यूज से जुड़े हुए हैं. उनका लेख उनके ब्‍लॉग से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

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