इस सीएम को देखकर लगा कोई वीआईपी नहीं, आम आदमी चढ़ रहा है

बड़ी चुनौतियों का अगर बड़ा हल या बड़ा सपना या बड़ा रिस्पांस होगा, तो सभ्यता-संस्कृति शिखर पर पहुंच जायेगी. पर जो सभ्यताएं अपने अंदर की चुनौतियों का जवाब, अंदर से तलाश नहीं पातीं या उत्पन्न मुसीबतों-कठिनाइयों का सार्थक और जरूरी हल नहीं ढ़ूंढ़ पातीं, वे पीछे छूट जाती हैं. खत्म हो जाती हैं. इस कसौटी पर अगर आप-हम देखें, तो भारत के सामने आज बड़ी चुनौतियां हैं. बड़े सवाल हैं. संकट बड़ा है. भीतरी और बाहरी, दोनों मोरचों पर.

बोफोर्स में दोषी को बचाने में तत्कालीन केंद्र सरकार की भूमिका का खुलासा, घूस लेने में बंगारू लक्ष्मण की हुई सजा और झारखंड के एक सांसद (नक्सली पृष्ठभूमि) कामेश्वर बैठा द्वारा एक सरकारी मुलाजिम की सार्वजनिक पिटाई से, देश और क्षेत्रीय राजनीति का चरित्र उजागर होता है. सीना ठोक कर भ्रष्टाचार, फिर सत्ता के बल कानूनी संरक्षण, यह भारत में ही संभव है. इस सड़ती और दुर्गंध देती राजनीति के लिए सबसे अधिक जवाबदेही, उस कांग्रेस पार्टी की है, जो सबसे लंबे अरसे तक देश चलाती रही है. उसी ने यह राजनीतिक संस्कृति विकसित की है. बाद की सभी पार्टियां, कांग्रेस द्वारा विकसित राजनीतिक संस्कृति की घटिया कार्बन कॉपी साबित हुई हैं.

भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति का आवाहन करनेवाली पार्टी के पूर्व अध्यक्ष घूस लेने के दोषी पाये जाते हैं, फिर भी उस पार्टी में आत्मनिरीक्षण की कोई झलक -एहसास नहीं. न पश्चाताप है. देश की सर्वोच्च न्याय संस्था में प्रैक्टिस करनेवाले शासक पार्टी के सबसे प्रखर, प्रामाणिक और अधिकृत वक्ता व सांसद की सीडी जारी होती है. आरोप है कि देश की सबसे पवित्र संस्था परिसर में वह अपनी राजनीतिक हैसियत और रुतबे से एक महिला को ब्लैकमेल कर रहे थे. इसे वह निजी मामला कहते हैं. चर्चा है कि वह महिला क्यों ब्लैकमेल हो रही थी, यह कारण अगर सही है, तो देश सन्न रह जायेगा. कहां पहुंच गया यह मुल्क? जो नक्सली पृष्ठभूमि से आये, उनसे उम्मीद थी कि वे एक नैतिक, आदर्श और प्रामाणिक वैकल्पिक ढांचा बनायेंगे. पर वे भी उसी संस्कृति के राही निकले.

क्या ऐसे माहौल में कहीं आस्था के बिंदु झलकते हैं? 26 अप्रैल को द पायनियर अखबार में एक पाठक की चिट्ठी छपी है. उक्त पाठक ने अपने नाम की जगह ‘एक भारतीय’ लिखा है. अंगरेजी के पूरे पत्र का हिंदी भाव है. ‘हाल ही में जब मैं गोवा से दिल्ली लौट रहा था, तब मुझे यह देख कर आश्चर्यजनक खुशी हुई कि गोवा के मुख्यमंत्री भी उसी विमान से यात्र कर रहे थे. ऐसा नहीं है कि यह पहला मौका था, जब मैं उस विमान में सफर कर रहा था, जिसमें मुख्यमंत्री, मंत्री या कोई राजनीतिज्ञ हों. लेकिन गोवा से उड़ान भरने से दिल्ली एयरपोर्ट तक उतरने के दौरान उन्होंने मुझे बेहद प्रभावित किया. वह अनुभव आज भी मेरे जेहन में कैद है. मैं यह याद करने की कोशिश करता हूं कि पिछली बार मैंने कब किसी मुख्यमंत्री या मंत्री को फ्लाइट पकड़ने के लिए आम आदमी की तरह लाइन में लगते देखा है? कोई कार्यकर्ता, सुरक्षा गार्ड या कोई परिजन नहीं. वह अपना सामान खुद ढो रहे थे. वह कम किराये वाले इकोनॉमी क्लास में सफर कर रहे थे. जबकि वह फर्स्‍ट क्लास में सफर कर सकते थे. वह विमान पर चढ़ने वाले अंतिम व्यक्ति नहीं थे और न ही उनके लिए विमान रोक कर रखा गया था.

वह गो एयर के विमान में वैसे ही चढ़े, जैसे कि साधारण यात्री चढ़ते हैं. ऐसा लगा, जैसे कोई वीआईपी नहीं, साधारण आदमी विमान में चढ़ रहा है. बिल्कुल समय पर. अन्य लोगों की तरह, वह भी गेट पर लाइन में लगे और जब उनकी बारी आयी, तभी विमान में चढ़े. वह आगे की पंक्ति में नहीं बैठे थे, जबकि जिन विमानों में फर्स्‍ट क्लास सीट नहीं होती, उनमें आगे की सीटें बड़े और प्रभावशाली लोगों के लिए सुरक्षित रहती हैं. वह चुपचाप तीसरी या शायद चौथी कतार की सीट पर बैठ गये. कोई तामझाम नहीं. मुझे ऐसा लगा कि विमान में सवार अधिकतर लोगों को यह नहीं पता था कि वह कौन हैं? इसलिए उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं था.

विमान परिचारकों ने उन पर उतना ही समय दिया, जितना दूसरे यात्रियों पर. जब मैंने अपने बगल के साथी को यह बताया, जो मेरे साथ ही यात्र कर रहा था, तो उसने कहा कि मुख्यमंत्री के बगल की सीट जरूर खाली होगी या फिर उनके कार्यालय की तरफ से ही दो सीट बुक करायी गयी होगी, ताकि उन्हें कोई डिस्टर्ब न करे. लेकिन जब मैं वाशरूम से लौट रहा था, तो देखा कि उनके बगल की सीट पर भी कोई यात्री बैठा है. उनकी कतार की सारी सीटें भरी हुई थीं. कोई विशेष सुविधा नहीं. विशेष सुविधा की मांग भी नहीं.

जब विमान दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरा, तो वह उतरने वाले पहले व्यक्ति नहीं थे. जबकि आमतौर पर यही होता है कि कोई वीआईपी अन्य यात्रियों से पहले उतरता है. उसके लिए पहले से विशेष कार तैयार रहती है, इसके बाद ही अन्य यात्रियों को उतरने की अनुमति दी जाती है. इस मामले में वह न तो उतरने वाले पहले व्यक्ति थे और न ही उनके लिए कोई कार इंतजार कर रही थी. न ही उन्हें कोई रिसीव करने आया. अन्य यात्रियों की तरह वह भी एक ही बस से एयरपोर्ट टर्मिनल पहुंचे. फिर से उन्होंने अपना सामान ट्राली पर उठाया और बाहर खड़ी कार तक आये, जो उन्हें लेने आयी थी. बस में कुछ यात्रियों ने उन्हें पहचान लिया था और उन्होंने उनसे बातचीत भी की. बातचीत से एक बात स्पष्ट थी कि वह न सिर्फ जेंटलमैन हैं, बल्कि बिल्कुल सहज भी हैं. अपने पद का कोई गुमान नहीं. बिल्कुल सरल आचरण. शर्ट-पैंट और काले जूते पहने. बेहद साधारण लिबास. आम राजनीतिज्ञों की वेश-भूषा से अलग. मैं यह जानता था कि वह आईआईटी से पासआउट होने वाले भारत के किसी राज्य के पहले मुख्यमंत्री हैं. मैंने यह भी सुना था कि वह गोवा की गंदी राजनीति को साफ करने का प्रयास कर रहे थे. मैंने जो पहली नजर में पाया, वह आश्चर्यचकित करने वाला था.

मैं गोवा का निवासी नहीं हूं और इस कारण मैं श्री परिकर को वोट नहीं डाल सकता. लेकिन मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि जिस तरह का उनका व्यक्तित्व है, मेरा वोट उन जैसे लोगों को ही मिलता. मैं लीडरशिप पर हो रही एक कांफ्रेंस को अटेंड करने गोवा गया था. पर मैंने लीडरशिप का अंतिम पाठ श्री परिकर को कुछ दूरी से देख कर सीखा. गोवा के मुख्यमंत्री का आचरण आज भीड़ में किसी पाठक को अलग लगता है, तो वह अखबार में पत्र लिखता है. पर वह दौर भी था, जब इसी तरह के व्यक्तित्ववाले लोगों की संख्या राजनीति में अधिक थी. कैसे नेतृत्व ने भारत को बदला? आज उन्हें याद करने की जरूरत है. आर एम लाला ने अपनी पुस्तक महानता की छाप में राजगोपालाचारी के बारे में लिखा है कि जब मैं राजाजी से उनकी आत्मकथा लिखवाने के लिए मिला, वे तब नब्बे साल की ओर बढ़ रहे थे. मद्रास के मुख्यमंत्री और भारत के गवर्नर-जनरल के वर्षों को काफी पीछे छोड़ चुके थे.

वे मुझसे विनम्रता से बोले, भारत के संतों ने जब अपनी जीवनी नहीं लिखी, तो मैं अपनी जीवनी लिखवाने वाला कौन होता हूं? एस एम मुब्बुलक्ष्मी के पति सदाशिवम ने, जो उनके निष्ठावान शिष्य थे, उनसे (राजाजी से) अपनी जीवनी लिखने का आग्रह किया, तो राजाजी ने यही उत्तर दिया, पर द्रवित होकर यह भी कह दिया ‘सदाशिवम, हमारा काम है, अपना फर्ज पूरा करना और संसार से विदा लेना.’ इतने बड़े पदों पर रहे और राजनीतिक संस्कृति को श्रेष्ठ बनानेवाले ऐसे लोग कितने निस्संग थे. उसी पुस्तक में आर एम लाला ने कामराज पर लिखा है. कामराज ने उन्हें कहा. टूटी-फूटी अंगरेजी में.

रिजनलिजम इज गोइंग अप, नेशनलिजम इज गोइंग डाउन (क्षेत्रवाद बढ़ रहा है, राष्ट्रवाद घट रहा है). 1975 में अपनी मौत के पहले कामराज ने यह बात कही थी. आज की स्थिति में इस बयान को आंकिए. एक भविष्यद्रष्टा और मनीषी का बयान. राजनीति में किस ऊंचाई के लोग थे? उस कामराज की पृष्ठभूमि क्या थी? आर एम लाला की पुस्तक से ही, ‘कामराज का संबंध उस युग से था, जब कांग्रेस वालंटियर एक सूरमा होता था, एकनिष्ठ समर्पण भाव के साथ आदर्शोवाला व्यक्ति होता था.. उन्होंने एक मामूली कांग्रेसी कार्यकर्ता के रूप में काम शुरू किया, जिसके पास ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति से लड़ने के लिए सत्याग्रह के गांधीवादी हथियार से अधिक कुछ भी नहीं था. चौथाई सदी के संघर्ष के दौरान उन्होंने 3000 से अधिक दिन जेल में गुजारे. उस व्यक्ति ने कई लोगों को प्रधानमंत्री बनाया. अपने चरित्र के कारण किंग मेकर कहे गये.

तब एक सामान्य कांग्रेसी कार्यकर्ता का यह चरित्र था. आज बड़े-बड़े दलों के सबसे बड़े नेताओं के चरित्र की, तब के एक मामूली कांग्रेसी से तुलना कर लीजिए. पासंग में भी ये नहीं ठहरेंगे. भ्रष्टाचार की अकड़, अहंकार, हेकड़ी, हिंसात्मक आक्रामकता जैसे गुण आज बड़े-बड़े नेताओं के आभूषण हैं. दरअसल, किसी भी मुल्क या समाज को राजनीतिक नेतृत्व ही श्रेष्ठता प्रदान करता है. अमर बनाता है. दीर्घायु बनाता है. या अल्पायु बनाता है. प्रो आर्नाल्ड टायनबी ने बहुत पहले कहा था, कोई भी सभ्यता अपनी चुनौतियों के बरक्स ही आगे बढ़ती है. बड़ी चुनौतियों का अगर बड़ा हल या बड़ा सपना या बड़ा रिस्पांस होगा, तो सभ्यता-संस्कृति शिखर पर पहुंच जायेगी. पर जो सभ्यताएं अपने अंदर की चुनौतियों का जवाब, अंदर से तलाश नहीं पातीं या उत्पन्न मुसीबतों-कठिनाइयों का सार्थक और जरूरी हल नहीं ढ़ूंढ़ पातीं, वे पीछे छूट जाती हैं.

खत्म हो जाती हैं. इस कसौटी पर अगर आप-हम देखें, तो भारत के सामने आज बड़ी चुनौतियां हैं. बड़े सवाल हैं. संकट बड़ा है. भीतरी और बाहरी, दोनो मोरचों पर. पर इन चुनौतियों के मुकाबले थर्ड रेट नेतृत्व सामने है, जो बात-बात पर देह के धंधे का शिकार बने, घूस ले, बड़े पदों पर बैठ कर देश के लुटेरों को बचाये, वे कैसे देश की रहनुमाई कर पायेंगे?

ब्रिटेन के मशहूर अखबार द डेली टेलीग्राफ के प्रख्यात स्तंभकार पेरीग्रीन ने एक बार लिखा था. ब्रिटेन के संदर्भ में. हमारे नेता आज अभूतपूर्व लगते हैं. अपनी महानता के कारण नहीं, अपने ओछेपन, गिरावट और पतन के कारण. इस कारण वे अपवाद नहीं लगते कि उनमें मुल्क या देश को प्रेरित कर सकने की क्षमता है, बल्कि देश के मनोबल को तोड़ने, हतोत्साहित करने और डिप्रेस (तनावपूर्ण) करने के लिए वे प्रख्यात हैं. उन्होंने आगे लिखा, आज के सार्वजनिक जीवन में बड़ा और दिग्गज नेता होना लगभग असंभव है. यहां तक की जो ओछे, ठीक-ठाक दिखते हैं, शुरू में संकीर्ण नहीं लगते.

अंतत: वे भी बड़े संकीर्ण और छोटे ही बन जाते हैं. आज भारत के संदर्भ में यह कथन शत-प्रतिशत सही है. कभी नेहरू ने महात्मा गांधी को लिखा कि इस देश में जो अप्रसन्न, गरीब और वंचित हैं, वे रात में ही नहीं, लगतार मेरी स्मृति-मानस को बेचैन करते हैं. मेरी सारी चिंता उनके इर्द-गिर्द घूम रही है. गांधी ने भी कहा था, हर आंख से एक -एक आंसू पोछना ही मेरी आकांक्षा है. इस एक पंक्ति की गहराई और ऊंचाई से उन दिनों के नेतृत्व का कद मापा जा सकता है. आज इस कसौटी पर हमारा नेतृत्व वर्ग कहां खड़ा है?

चीनी कहावत है. अगर आप एक वर्ष के लिए कोई पौधा लगाना चाहते हैं, तो मक्का रोपें. अगर तीस वर्षो के लिए आप कुछ करना चाहते हैं, तो पेड़ रोपें. पर यदि सौ वर्षो के लिए कुछ करना है, तो मनुष्य को रोपें. साफ है कि नये मानस का समाज और इंसान गढ़ना होगा, तब भारत बनेगा. आजादी की लड़ाई में दशकों तक लोगों ने नये इंसान गढ़े, तब हम नयी ऊंचाई पर गये. अब हम लोभ और लालच की दुनिया में फंसे हैं. उपभोक्तावाद और बाजार हमारे प्रेरक तत्व हैं, तो हमारी राजनीति भी ऐसी ही होगी. जो भारत के लिए चिंतित हैं, उन्हें अब स्कूलों से नये भारतीय गढ़ने-बनाने होंगे, जो भारत के गौरव को लौटा सकें.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. यह खबर प्रभात खबर में छप चुका है वहीं से साभार लिया गया है.

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